राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक और लोक परंपराओं में कई ऐसे लोकदेवता हैं जिनकी कहानियां सामान्य धारणाओं से बिल्कुल अलग हैं। राजस्थान के पाली जिले में एक ऐसे ही अनोखे लोकदेवता पूजे जाते हैं, जिनका जीवन प्रेम, वियोग और गहरे वैराग्य की अनूठी गाथा समेटे हुए है। इन्हें इलोजी महाराज के नाम से जाना जाता है। आमतौर पर देवताओं की मूर्तियां ध्यानमग्न या युद्ध मुद्रा में दिखाई देती हैं, लेकिन इलोजी महाराज की विशेषता यह है कि उनकी प्रतिमा आज भी एक सजे-धजे दूल्हे के रूप में स्थापित है। उनकी यह अधूरी प्रेम कहानी और अनोखा स्वरूप आज भी हर आने-जाने वाले श्रद्धालु को अपनी ओर आकर्षित करता है।
होलिका के साथ अटूट प्रेम और अधूरी शादी की कहानी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, लोकदेवता इलोजी महाराज का संबंध त्रेतायुग और हिरण्यकश्यप के काल से माना जाता है। इलोजी महाराज और दैत्यराज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका के बीच गहरा प्रेम संबंध था। दोनों का विवाह तय हो चुका था और पूरे राज्य में खुशियों का माहौल था। इलोजी बड़े ही उत्साह के साथ अपनी बारात लेकर विवाह के लिए रवाना हुए थे। लेकिन दूसरी ओर, हिरण्यकश्यप अपने ही पुत्र प्रह्लाद को मारने की साजिश रच रहा था क्योंकि प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। इस साजिश के तहत होलिका को अपने भतीजे प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठने का आदेश दिया गया, क्योंकि उसे वरदान में एक ऐसी चादर मिली थी जो आग में नहीं जलती थी। भगवान की लीला के कारण वह चादर प्रह्लाद के ऊपर आ गई, जिससे प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका आग में जलकर भस्म हो गई।
खुशियों का मातम में बदलना और धुलंडी की शुरुआत
जब इलोजी महाराज गाजे-बाजे और बारातियों के साथ विवाह स्थल पर पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। चारों तरफ शादी की शहनाइयों की जगह मातम छाया हुआ था। अपनी होने वाली पत्नी होलिका का जला हुआ शरीर देखकर इलोजी गहरे सदमे में चले गए। वे पागलों की तरह रोने लगे और उन्होंने अत्यंत दुख में आकर होलिका की चिता की गर्म भस्म को अपने पूरे शरीर पर लपेट लिया। अपने जीवन के सच्चे प्रेम के खो जाने के गम में उन्होंने कभी दूसरा विवाह न करने का संकल्प लिया और जीवनभर ब्रह्मचारी रहे। माना जाता है कि इसी घटना के बाद से होलिका दहन के अगले दिन राख और रंगों से धुलंडी खेलने की परंपरा की शुरुआत हुई, जो आज भी पूरे देश में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है।
पाली में 150 साल पुरानी पूजा पद्धति और परंपराएं
राजस्थान के पाली शहर में इलोजी महाराज का एक बहुत ही प्रसिद्ध और ऐतिहासिक मंदिर स्थापित है। धानमंडी और सर्राफा बाजार के बीच स्थित यह मंदिर करीब 150 साल पुराना माना जाता है। यहां पर हर साल एक अनूठी परंपरा का निर्वहन किया जाता है। आमली एकादशी के पावन अवसर पर धानमंडी इलाके में पवित्र तणी बांधी जाती है, जिसके बाद लोकदेवता इलोजी महाराज की भव्य प्रतिमा को काठ के पाटे पर सम्मानपूर्वक बिठाने की धार्मिक रस्म पूरी की जाती है। मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा भगवान को विशेष रूप से ठंडाई और पेठे का स्वादिष्ट भोग लगाया जाता है।
बादशाह का मेला और बाजार खुलने की रस्म
धुलंडी के ठीक अगले दिन पाली शहर में प्रसिद्ध और पारंपरिक बादशाह का मेला आयोजित किया जाता है। इस मेले के दौरान एक युवा बीरबल का स्वांग रचता है और वह पूरे सम्मान के साथ लोकदेवता इलोजी महाराज के दर्शन करने मंदिर पहुंचता है। दर्शन करने के बाद वह युवक वहां बंधी हुई तणी को खोलता है। पाली शहर की यह परंपरा इतनी मजबूत है कि इस रस्म के पूरा होने के बाद ही शहर के मुख्य बाजारों को औपचारिक रूप से व्यापार के लिए खोला जाता है। स्थानीय व्यापारियों के लिए यह रस्म बेहद महत्वपूर्ण और शुभ मानी जाती है।
दूल्हे के भेष में स्थापित भव्य प्रतिमा का रूप
इलोजी महाराज की मूर्ति का शारीरिक स्वरूप बहुत ही भव्य और प्रभावशाली है। उनकी प्रतिमा को एक बलवान और भारी-भरकम काया के रूप में दर्शाया गया है, जिसकी आंखें बहुत बड़ी और चमकीली हैं। मूर्ति के सिर पर कलंगी लगा हुआ सुंदर दूल्हे का साफा सजाया गया है। इसके अलावा, प्रतिमा के हाथों और पैरों में सुंदर कंगन पहनाए गए हैं और उनके गले में फूलों के बड़े-बड़े हार सुशोभित रहते हैं। इलोजी महाराज का यह आकर्षक दूल्हा स्वरूप श्रद्धालुओं को उनके जीवन के उस सबसे दर्दनाक और अधूरे क्षण की याद दिलाता है जब वे बारात लेकर आए थे।
संतान प्राप्ति और व्यापारिक समृद्धि की अटूट आस्था
राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र समेत कई गांवों और शहरों में इलोजी महाराज को एक बेहद मिलनसार, मजाकिया और मस्तमौला लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है। स्थानीय लोगों में उनके प्रति गहरी आस्था है। विशेष रूप से वे महिलाएं जो निसंतान हैं, वे संतान सुख की प्राप्ति की कामना लेकर इलोजी महाराज के दरबार में विशेष पूजा-अर्चन और मन्नतें मांगती हैं। इसके साथ ही, देश-विदेश के बड़े-बड़े कारोबारी और स्थानीय व्यवसायी अपने व्यापार में निरंतर प्रगति और समृद्धि के लिए लोकदेवता के चरणों में सिर झुकाते हैं। माना जाता है कि इलोजी महाराज के दर से कोई भी भक्त खाली हाथ वापस नहीं लौटता।



















