इस समय राजस्थान के भीतर मानसूनी सीजन अपने सबसे नाजुक पड़ाव से गुजर रहा है, फिर भी आसमान से बरसने वाली बूंदों ने किसानों को निराश ही किया है। बीस जुलाई की तारीख तक, पूरे राज्य के आंकड़ों को देखा जाए तो औसत के मुकाबले 28 प्रतिशत कम पानी बरसा है। मौसम विज्ञान की गणना के अनुसार इस समय अंतराल में 143.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज होनी चाहिए थी, जिसके एवज में महज 103.9 मिलीमीटर पानी ही जमीन तक पहुंच सका है। सीधे शब्दों में समझें तो राज्य के हिस्से में आने वाली हर चौथी बूंद बादलों में ही सूख गई। यह कमी महज एक साधारण आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर खेती-किसानी, पीने के पानी की आपूर्ति, जलाशयों के जलस्तर, अंडरग्राउंड वॉटर रिचार्ज और पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। राहत की एक छोटी सी किरण यह है कि राज्य के पूर्वी हिस्से में मौसम फिर से करवट ले रहा है, परंतु वर्तमान में ऐसा कोई शक्तिशाली वेदर सिस्टम नहीं बना है जो पूरे सूबे के सूखेपन को एक झटके में खत्म कर सके।
पश्चिमी और दक्षिणी इलाकों में गहराता संकट
सबसे ज्यादा खौफनाक स्थिति उन जगहों पर पैदा हो गई है, जहां पानी की एक-एक बूंद को अमृत माना जाता है। इस बार बारिश का सबसे बड़ा अकाल राज्य के दक्षिणी और पश्चिमी अंचलों में देखने को मिल रहा है। हैरानी की बात यह है कि मेवाड़ का इलाका, जिसे आम तौर पर बेहतरीन बारिश और हरियाली के लिए पहचाना जाता है, वह भी इस साल भयानक सूखे की चपेट में आ गया है। इसके समानांतर, मारवाड़ और उससे सटे पश्चिमी रेगिस्तानी क्षेत्रों में, जहां पहले से ही पानी की भारी किल्लत रहती है, हालात और भी ज्यादा खौफनाक होते जा रहे हैं। इन इलाकों में जल संकट तेजी से गहरा रहा है।
सूखे जिलों की लिस्ट में पाली सबसे आगे
अगर हम सबसे ज्यादा प्यासे जिलों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो पाली की हालत सबसे ज्यादा खराब है, जहां औसत से 58 प्रतिशत कम बदरा बरसे हैं। इसके ठीक पीछे सिरोही का नंबर आता है, जिसने 56 प्रतिशत का नुकसान झेला है। बांसवाड़ा, जालौर और जैसलमेर तीनों ही जिलों में बारिश का यह घाटा 55 प्रतिशत पर अटका हुआ है। इसी तरह हनुमानगढ़ में आधी यानी 50 प्रतिशत बारिश ही हुई है, जबकि सवाई माधोपुर 49 प्रतिशत और प्रतापगढ़ 47 प्रतिशत की कमी के साथ रेड जोन में शामिल हो चुके हैं। करौली और बाड़मेर जिलों में 44 प्रतिशत सूखा है, वहीं जोधपुर में यह आंकड़ा 43 प्रतिशत दर्ज किया गया है। अगर जुलाई के बचे हुए दिनों में इन क्षेत्रों में मूसलाधार बारिश नहीं हुई, तो खेतों में खड़ी खरीफ की फसलों का विकास रुक जाएगा, मवेशियों के चरागाह सूख जाएंगे और बांधों के खाली रहने का सीधा असर सर्दियों तक दिखाई देगा।
मेवाड़ और मारवाड़ की दोहरी मुसीबत
इस साल के मौसम का सबसे अजीबोगरीब पहलू यह है कि मेवाड़ के जिले जैसे प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर और सिरोही अपने सामान्य बारिश के लक्ष्य से बहुत पीछे छूट गए हैं। यह इसलिए भी हैरान करने वाला है क्योंकि इसी बेल्ट को प्रदेश में सबसे ज्यादा पानी हासिल करने वाले इलाके के तौर पर जाना जाता है। दूसरी तरफ, मारवाड़ के शुष्क जिलों जैसे पाली, जालौर, बाड़मेर और जोधपुर में मानसूनी बादलों की इस दगाबाजी ने वहां के सीमित जल स्रोतों पर बहुत भयानक दबाव डाल दिया है।
राजधानी और पूर्वी जिलों का भी बुरा हाल
बारिश की इस मार से प्रदेश की राजधानी भी खुद को बचा नहीं पाई है। जयपुर शहर में अभी तक सिर्फ 121.9 मिलीमीटर पानी बरसा है, जबकि मौसम के पुराने रिकॉर्ड के अनुसार यह आंकड़ा 184.3 मिलीमीटर होना चाहिए था। इसका सीधा मतलब है कि राजधानी में भी करीब 34 प्रतिशत बारिश का सूखा पड़ा है। पूर्वी राजस्थान की बात करें तो दौसा में 23 प्रतिशत, करौली में 44 प्रतिशत और सवाई माधोपुर में 49 प्रतिशत का घाटा यह साबित करता है कि वहां भी चैन की सांस लेने जैसी कोई स्थिति नहीं है। हालांकि, कुछ जिलों ने लाज बचा ली है। टोंक और सीकर में स्थिति लगभग सामान्य बनी हुई है। चित्तौड़गढ़ में महज 6 प्रतिशत और भीलवाड़ा में 13 प्रतिशत की कमी है। वहीं अजमेर, श्रीगंगानगर और बारां में लगभग 21 प्रतिशत का घाटा है, और धौलपुर में 23 प्रतिशत पानी कम बरसा है।
उत्तरी जिलों ने बचाया राज्य का औसत
यह भी एक दिलचस्प आंकड़ा है कि अगर प्रदेश के उत्तर-पूर्वी हिस्से के कुछ जिलों में मेहरबानी नहीं होती, तो पूरे राजस्थान का औसत घाटा 28 प्रतिशत से कहीं ज्यादा डरावना होता। झुंझुनूं जिले ने अपने कोटे से 16 प्रतिशत ज्यादा बारिश हासिल की है। इसी तरह बीकानेर में 13 प्रतिशत और चूरू में 12 प्रतिशत अधिक पानी बरसा है। भरतपुर का हाल भी अपने पुराने रिकॉर्ड से थोड़ा बेहतर है। इन इलाकों की अतिरिक्त बारिश ने ही राज्य के कुल घाटे को थोड़ा छिपा लिया है।
इस भारी घाटे के असल मायने क्या हैं?
राजस्थानी खेती के कैलेंडर में जुलाई और अगस्त को मानसून की रीढ़ माना जाता है। जुलाई के तीसरे हफ्ते में 28 प्रतिशत का यह घाटा सीधे तौर पर यह बता रहा है कि खेतों में बोई गई खरीफ की फसलें अपनी पूरी लंबाई नहीं ले पाएंगी। गांव-देहात के छोटे तालाबों, एनीकटों और जोहड़ों में पानी भरने की स्पीड बहुत कम हो गई है। इसका नतीजा यह होगा कि जमीन के भीतर पानी रिसने की प्रक्रिया ठप पड़ जाएगी। आने वाले समय में ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी का भारी संकट फूट सकता है। अगर अगस्त के महीने में बादलों की कोई बड़ी और मजबूत प्रणाली विकसित नहीं हुई, तो सूबे के बहुत बड़े हिस्से को अकाल जैसी भयानक स्थिति का सामना करना पड़ेगा।
अब सारी उम्मीदें अगस्त और सितंबर पर
भले ही अभी तक हालात चिंताजनक हैं, लेकिन मानसून के सीजन का एक बड़ा हिस्सा अभी भी हमारे सामने है। यदि अगस्त और सितंबर के महीनों में लगातार और मजबूत मानसूनी सिस्टम बनते हैं, तो इस भारी-भरकम घाटे की भरपाई काफी हद तक संभव है। मगर यदि आने वाले कुछ हफ्ते भी ऐसे ही सूखे निकल गए, तो पूरे सीजन की तस्वीर हमेशा के लिए बिगड़ जाएगी। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार, पूर्वी राजस्थान के ऊपर मानसूनी गतिविधियां फिर से जोर पकड़ने लगी हैं और 22 जुलाई के बाद से पश्चिमी इलाकों में भी अच्छी फुहारें पड़ने की उम्मीद जगी है। हालांकि, इस भारी कमी को पाटने के लिए अब राज्य को केवल सामान्य बारिश नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाली जोरदार बारिश की जरूरत है।




















