धौलपुर जिले समेत पूरे ब्रज क्षेत्र में शारदीय नवरात्र और विजयदशमी का पर्व पूरा होते ही टेसू-झांझी महोत्सव की रौनक हर तरफ दिखाई देने लगी है। शहर के मुख्य बाजारों से लेकर दूर-दराज के गांवों तक में सजी दुकानों और ठेलों पर मिट्टी से निर्मित टेसू और झांझी की मूर्तियां बिक रही हैं, जिन्हें खरीदने के लिए लोग पहुंच रहे हैं। कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाला यह पांच दिवसीय सांस्कृतिक आयोजन प्राचीन ब्रज संस्कृति, लोक विश्वास और चिरंजीवी प्रेम की गाथाओं की याद दिलाता है।
परंपरा का बदलता स्वरूप और बच्चों का उत्साह
बीते समय में इस अनोखे महोत्सव को हर घर में बड़े ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता था। हालांकि आज के डिजिटल दौर में बच्चों के बीच स्मार्टफोन के बढ़ते आकर्षण के कारण इस लोक पर्व का दायरा पहले की अपेक्षा थोड़ा सिमट जरूर गया है। इसके बावजूद सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़े परिवारों और छोटे बच्चों में इस परंपरा को लेकर खासा उत्साह आज भी देखा जा सकता है। बच्चे मिट्टी के इन प्रतीकों को लेकर मोहल्लों में घर-घर जाते हैं और पारंपरिक गीत गाकर इस पुरानी संस्कृति को संजोए रखते हैं।
महाभारत काल के वीर बर्बरीक से जुड़ी कथा
क्षेत्र के इतिहासकार कबीर शरण का कहना है कि टेसू-झांझी का यह पर्व ब्रज अंचल की सबसे पुरानी और गौरवशाली लोक परंपराओं में गिना जाता है। इस आयोजन का सीधा जुड़ाव महाभारत के प्रसिद्ध योद्धा बर्बरीक के साथ माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार बर्बरीक पांडव राजकुमार भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। वे बेहद साहसी थे और उन्होंने यह प्रण लिया था कि वे हमेशा युद्ध में उस पक्ष का साथ देंगे जो हार रहा होगा।
भगवान श्रीकृष्ण को दिया गया था शीश दान
पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब महाभारत का महासंग्राम चल रहा था, तब युद्ध के परिणामों को संतुलित करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने एक साधारण ब्राह्मण का रूप धारण किया। उन्होंने वीर बर्बरीक के पास पहुंचकर उनका शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक ने बिना किसी संकोच के अपना सिर काटकर अर्पित कर दिया, लेकिन साथ ही उन्होंने पूरा युद्ध अपनी आंखों से देखने की इच्छा जताई। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उनके शीश को एक ऊंचे स्थान पर स्थापित कर दिया ताकि वे वहां से पूरे युद्ध का सजीव नजारा देख सकें।
प्रेम और विरह की अमर दास्तान
लोक मान्यताओं के अनुसार रणभूमि में जाने से पहले बर्बरीक ने अपनी प्रेमिका झांझी को विवाह का वचन दिया था। लेकिन युद्ध की परिस्थितियों और शीशदान की घटना के चलते उनका यह मिलन कभी पूरा नहीं हो सका। बर्बरीक के बलिदान के बाद झांझी के हिस्से में केवल विरह और प्रेम की अनकही दास्तान आई जो आगे चलकर ब्रज की लोक गाथा बन गई। इसी पौराणिक प्रसंग के आधार पर हर साल कार्तिक मास में टेसू और झांझी के प्रतीकों को गढ़कर इस उत्सव को मनाया जाता है, जो आज भी प्रेम और त्याग की स्मृतियों को जीवंत रखता है।



















