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यूपी और उत्तराखंड में खुली मिठाइयों पर एक्सपायरी डेट लिखने का नियम, हलवाइयों की बढ़ी चिंताभारत
22 अक्तू॰ 2026, 10:50 am (1 घंटे पहले)· 3

यूपी और उत्तराखंड में खुली मिठाइयों पर एक्सपायरी डेट लिखने का नियम, हलवाइयों की बढ़ी चिंता

त्योहारी सीजन से ठीक पहले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के खाद्य सुरक्षा विभागों ने खुली मिठाइयों और बेकरी उत्पादों पर एक्सपायरी की तारीख लिखना अनिवार्य कर दिया है, जिससे हलवाई संगठनों में हड़कंप मच गया है।

त्योहारों के मौसम में चारों तरफ बाजार सजे हुए हैं और बाजारों में सबसे ज्यादा रौनक पारंपरिक हलवाइयों और मिष्ठान भंडारों पर दिखाई दे रही है। दिवाली के नजदीक आते ही खोया, छेना, बेसन और मेवे से बनी मिठाइयों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। आमतौर पर जब भी कोई ग्राहक दुकान पर मिठाई खरीदने पहुंचता है, तो उसका पहला और सबसे बुनियादी सवाल यही होता है कि यह बर्फी, रसगुल्ला या कलाकंद ताजा है या नहीं। अब तक दुकानों पर मौजूद कर्मचारी या मालिक बिना झिझके एक ही जवाब देते थे कि यह माल अभी कुछ ही देर पहले भट्टी से उतरकर आया है और आज ही तैयार किया गया है। त्योहारों की भारी बिक्री की आड़ में बासी मिठाइयों को ताजा बताकर खपा देने का खेल लंबे समय से चलता रहा है। लेकिन इस बार उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बाजारों में यह पुराना ढर्रा नहीं चल पाएगा। दोनों राज्यों के खाद्य संरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभागों ने खुली मिठाइयों की बिक्री को लेकर बेहद कड़े निर्देश जारी कर दिए हैं, जिसके चलते मिठाई कारोबारियों में भारी बेचैनी देखने को मिल रही है।

ट्रे और काउंटर पर एक्सपायरी तारीख दर्ज करने का नया फरमान

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के खाद्य सुरक्षा विभागों द्वारा जारी किए गए ताजा आदेश के मुताबिक अब मिठाई विक्रेताओं को केवल डिब्बाबंद उत्पादों पर ही नहीं, बल्कि शीशे के काउंटरों और ट्रे में खुली रखी गई मिठाइयों पर भी अनिवार्य रूप से एक्सपायरी तारीख प्रदर्शित करनी होगी। दुकानदारों को हर मिठाई की ट्रे के आगे साफ अक्षरों में यह लिखना होगा कि यह मिठाई किस तारीख को बनाई गई है और इसे किस तारीख तक इस्तेमाल किया जा सकता है। उत्तराखंड में इस नियम का दायरा और भी व्यापक करते हुए बेकरी उत्पादों को भी इसमें शामिल कर लिया गया है। पूरे देश में फैक्ट्रियों से पैक होकर आने वाले खाद्य पदार्थों पर निर्माण तिथि और उपयोग की अंतिम तारीख लिखना पहले से अनिवार्य है। लेकिन भारतीय पारंपरिक खानपान में अधिकांश मिठाइयां खुली ट्रे में रखकर बेची जाती हैं। इस नई व्यवस्था का सीधा मकसद ग्राहकों को यह स्पष्ट जानकारी देना है कि जो मिठाई वे अपने परिवार और रिश्तेदारों के लिए खरीद रहे हैं, वह स्वास्थ्य के लिहाज से सुरक्षित है या नहीं।

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मिठाई कारोबारियों की आपत्तियां और व्यावहारिक चुनौतियां

सरकारी फरमान सामने आते ही दोनों राज्यों के हलवाइयों और मिष्ठान विक्रेता संगठनों ने अपने हाथ खड़े करने शुरू कर दिए हैं। दुकानदारों का कहना है कि त्योहारों के चरम दिनों में इस नियम का पालन करना व्यावहारिक रूप से लगभग असंभव है। व्यापारियों की सबसे बड़ी दलील यह है कि दिवाली के मौके पर ग्राहकों की इतनी भारी भीड़ होती है कि काउंटरों पर रखी ट्रे हर दो से तीन घंटे में खाली हो जाती है। जैसे ही एक खेप बिकती है, भीतर कारखाने से ताजा बनी मिठाई लाकर ट्रे में भर दी जाती है। हलवाइयों का सवाल है कि जब दिन भर में एक ही ट्रे कई बार भरी और खाली होगी, तो वे हर बार नई तारीख का पर्चा या स्टिकर कैसे बदलते रहेंगे। छोटे और मझोले स्तर के हलवाइयों की परेशानी और भी गंभीर है। उनका कहना है कि उनके पास पहले से ही कारीगरों और सहायकों की भारी कमी है। ऐसे में एक कर्मचारी को केवल हर ट्रे पर तारीखें बदलने और स्टिकर चिपकाने के काम पर तैनात करना उनके बस की बात नहीं है। व्यापारियों के प्रतिनिधिमंडल अब खाद्य विभाग के आला अधिकारियों से मिलकर इस नियम को फिलहाल टालने और त्योहारों के बाद लागू करने की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन प्रशासन की तरफ से कोई ढील मिलने के आसार नजर नहीं आ रहे हैं।

छह साल पुराना विवाद और केंद्र सरकार का पिछला अनुभव

खुली मिठाइयों पर उपयोग की अंतिम तारीख लिखने की यह कवायद कोई बिल्कुल नई योजना नहीं है। इसके पीछे छह साल लंबा विवाद और नीतिगत खींचतान का इतिहास जुड़ा हुआ है। केंद्र सरकार की सर्वोच्च खाद्य नियामक संस्था भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण यानी एफएसएसएआई ने साल 2020 में देश भर में यह नियम लागू करने की अधिसूचना जारी की थी। उस समय एफएसएसएआई ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त आदेश दिए थे कि खुली ट्रे में बिकने वाली सभी मिठाइयों पर निर्माण तिथि और कब तक सेवन योग्य है, यह लिखना अनिवार्य किया जाए। हालांकि जैसे ही यह नियम सामने आया, पूरे देश के व्यापारिक संगठनों और कन्फेक्शनरी एसोसिएशनों ने इसका पुरजोर विरोध शुरू कर दिया था। भारी राजनीतिक दबाव, व्यापारियों की हड़तालों और व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते आखिरकार साल 2023 में केंद्र सरकार को अपने इस आदेश को वापस लेना पड़ा था। आम जनता को शायद इस बात की भनक भी नहीं लगी कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा के नाम पर बना एक महत्वपूर्ण नियम बिना लागू हुए फाइलों में ही सिमट कर समाप्त हो गया था। अब उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों ने अपने स्तर पर इसे दोबारा जिंदा करके एक बड़ा प्रशासनिक जोखिम उठाया है।

इंस्पेक्टर राज की वापसी की आशंका बनाम उपभोक्ता सुरक्षा

व्यापारियों के विरोध के पीछे एक बड़ा कारण खाद्य सुरक्षा विभाग के निरीक्षकों की मनमानी और अवैध वसूली का डर भी है। दुकानदार खुले तौर पर आशंका जता रहे हैं कि त्योहारी सीजन में इस नियम का इस्तेमाल मिठाई की गुणवत्ता सुधारने के बजाय दुकानदारों को डराने और अवैध उगाही करने के लिए किया जाएगा। छोटे कस्बों और बाजारों में पहले से ही खाद्य सुरक्षा निरीक्षकों की छवि बहुत अच्छी नहीं मानी जाती है। व्यापारियों का तर्क है कि अगर हर ट्रे पर तारीख की मामूली चूक पर भी भारी जुर्माना लगाया जाएगा, तो इससे इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिलेगा और कारोबार करना दूभर हो जाएगा। दूसरी तरफ, नीति निर्माताओं और उपभोक्ता अधिकारों के जानकारों का मानना है कि केवल प्रशासनिक भ्रष्टाचार के डर से जनता के स्वास्थ्य से जुड़े नियमों को तिलांजलि नहीं दी जा सकती। अगर नियम लागू रहेगा तो कम से कम दुकानदारों के मन में कानून का कुछ खौफ जरूर रहेगा, जिससे वे पुरानी या खराब हो चुकी मिठाइयों को बेचने से बचेंगे। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड द्वारा उठाए गए इस कदम से अब देश के अन्य बड़े राज्यों पर भी ऐसा ही सुरक्षात्मक ढांचा तैयार करने का नैतिक दबाव बनेगा।

दूध और छेने की मिठाइयों की सीमित शेल्फ लाइफ

इस पूरे मामले की वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी जड़ें मिठाइयों के खराब होने की प्रकृति में छिपी हैं। भारत में सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली मिठाइयां दूध, खोया, छेना और पनीर से तैयार की जाती हैं, जिनमें रसगुल्ला, रसमलाई, कलाकंद और मलाई चाप प्रमुख हैं। खाद्य विशेषज्ञों के अनुसार छेना और दूध से बनी मिठाइयों का जीवनकाल बेहद सीमित होता है और सामान्य तापमान में ये एक से दो दिन के भीतर ही खराब होने लगती हैं। इनमें बैक्टीरिया बहुत तेजी से पनपते हैं जो गंभीर फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकते हैं। इसके विपरीत, सूखे मेवों, शुद्ध घी और बेसन से बनने वाली मिठाइयां जैसे काजू कतली, बेसन के लड्डू या मैसूर पाक कई दिनों या हफ्तों तक सुरक्षित रह सकती हैं। अब तक आम खरीदार के पास दुकानदार की जबानी बात पर भरोसा करने के अलावा कोई वैज्ञानिक या कानूनी उपाय नहीं था। नए नियम से कम से कम काउंटर पर यह स्पष्ट संकेत दिखेगा कि कौन सी मिठाई कब तक खाने लायक है, जिससे लोग बासी उत्पाद खरीदने से बच सकेंगे।

मानक तय न होने का बड़ा झोल और ट्रैकिंग की पेचीदगियां

भले ही नियम जारी कर दिया गया हो, लेकिन इसमें एक बहुत बड़ी तकनीकी और कानूनी खामी भी मौजूद है जिसे दूर किए बिना इसका सफल क्रियान्वयन कठिन दिखता है। सरकार ने अभी तक आधिकारिक रूप से यह निर्धारित नहीं किया है कि किस विशेष मिठाई की शेल्फ लाइफ कितने दिन मानी जाएगी। इसका फैसला पूरी तरह से दुकानदार की मर्जी पर छोड़ दिया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि यदि कोई बेईमान दुकानदार दूध या मावे की ऐसी मिठाई पर भी सात से आठ दिन बाद की तारीख लिख दे जो वास्तव में दो दिन में सड़ने वाली है, तो मौके पर उसे गलत साबित करना खाद्य निरीक्षकों के लिए भी बेहद मुश्किल होगा। इसके अलावा, खुली मिठाइयों की ट्रैकिंग अपने आप में एक जटिल पहेली है। पैकेटबंद सामान में तो पैकेट पर छपा बैच नंबर और तारीख उपभोक्ता के पास पुख्ता सबूत होती है, लेकिन जब कोई ग्राहक अपनी आंखों के सामने ट्रे से मिठाई निकलवाकर सादे डिब्बे में पैक करवा लेता है, तो घर पहुंचने के बाद यह साबित करना नामुमकिन हो जाता है कि वह मिठाई किस विशिष्ट ट्रे से निकाली गई थी। यदि मिठाई खाने से परिवार में किसी की तबीयत बिगड़ भी जाए, तो डिब्बे पर कोई आधिकारिक मुहर न होने के कारण दुकानदार अपनी जिम्मेदारी से आसानी से पल्ला झाड़ सकता है।

ग्राहकों की जागरूकता ही बनेगी असली हथियार

दुनिया के अधिकांश विकसित देशों में खुले में बिना किसी तय मानक या तारीख के ताजे खाद्य पदार्थ बेचना लगभग असंभव है, लेकिन भारत की सामाजिक और व्यापारिक व्यवस्था अब तक व्यक्तिगत विश्वास पर ही टिकी रही है। विदेशी पर्यटक जब भारत आते हैं, तो वे अक्सर खुले में बिकने वाली खाने-पीने की चीजों और मिठाइयों से केवल इसलिए दूरी बनाए रखते हैं क्योंकि उनकी शुद्धता और ताजगी की कोई पुख्ता गारंटी नहीं होती। खाद्य सुरक्षा अधिकारियों का भी मानना है कि इस नियम का मुख्य उद्देश्य दुकानदारों पर ताबड़तोड़ छापे मारना या भारी दंड वसूलना नहीं, बल्कि आम जनता के भीतर अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता पैदा करना है। जब सामान्य उपभोक्ता दुकानों पर जाकर खुद यह मांग करने लगेंगे कि ट्रे पर एक्सपायरी तारीख क्यों नहीं लिखी है, तभी बाजार में एक वास्तविक सुधार देखने को मिलेगा। वर्षों से उपभोक्ता बासी मिठाइयों के चलते पेट की बीमारियों का शिकार बनते रहे हैं, लेकिन अब अगर यह व्यवस्था धरातल पर उतरती है, तो त्योहारी खरीदारी में पारदर्शिता और शुद्धता का एक नया दौर शुरू हो सकता है।

सवाल-जवाब

मिठाइयों पर एक्सपायरी डेट लिखने का नया नियम किन राज्यों में लागू हुआ है?
यह नया नियम फिलहाल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में लागू किया गया है, जहां उत्तराखंड में इसे बेकरी उत्पादों पर भी अनिवार्य किया गया है।
क्या यह नियम केवल पैकेट वाली मिठाइयों पर लागू है या खुली मिठाइयों पर भी?
यह नियम खुली ट्रे और कांच के काउंटरों में रखकर बेची जाने वाली सभी खुली मिठाइयों पर अनिवार्य रूप से लागू किया गया है।
दुकानदार इस नियम का विरोध क्यों कर रहे हैं?
दुकानदारों का कहना है कि त्योहारी सीजन में हर कुछ घंटे में ट्रे खाली होती है और बार-बार स्टिकर बदलना तथा तारीख दर्ज करना कर्मचारियों की कमी के कारण संभव नहीं है।
क्या केंद्र सरकार ने पहले ऐसा कोई नियम बनाया था?
हां, एफएसएसएआई ने 2020 में ऐसा राष्ट्रीय नियम बनाया था, लेकिन व्यापारियों के कड़े विरोध के बाद 2023 में इसे वापस ले लिया गया था।
क्या सरकार ने तय किया है कि कौन सी मिठाई कितने दिन चलेगी?
नहीं, सरकार ने किसी मिठाई की निश्चित शेल्फ लाइफ तय नहीं की है, इसका निर्धारण करने की जिम्मेदारी फिलहाल दुकानदारों पर ही छोड़ी गई है।
दूध और छेने से बनी मिठाइयां कितने समय में खराब हो जाती हैं?
दूध, खोया और छेने से बनी अधिकांश मिठाइयां सामान्य तापमान में एक से दो दिनों के भीतर खराब होने लगती हैं।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·22 मिनट पहले

दिवाली पर रसगुल्ला और बर्फी खरीदते वक्त अब सोचना पड़ेगा कि डिब्बे पर तारीख क्या पड़ी है। वैसे मिलावट और बासी माल रोकने के लिए यह कदम सही है, पर हलवाइयों के लिए भीड़भाड़ में हर दो घंटे पर पर्ची बदलना वाकई सिरदर्द बन जाएगा।

Ravikash Gupta@ravikash·46 मिनट पहले

पिछली दीपावली पर पुरानी बर्फी खाकर मेरी तबीयत बिगड़ गई थी। अब कम से कम दुकानदार को तारीख लिखनी पड़ेगी तो बासी माल बेचने से डरेगा।

Arjun Mehta@arjun-mehta·45 मिनट पहले

रविकेश जी, पिछली दिवाली वाली बात सुनकर बुरा लगा। उम्मीद है इस नए नियम से सचमुच फायदा होगा और सेहत से खिलवाड़ रुकेगा।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

दिवाली पर पुरानी मिठाई मिल जाना तो जैसे आम बात हो गई है। पिछले साल ही एक दुकान से बर्फी ली थी जो दो दिन बाद ही अजीब सी महकने लगी। त्योहार की भीड़ में दुकानदार सब बासी माल निकाल देते हैं। कम से कम अब काउंटर पर तारीख लिखी होगी तो ग्राहक को थोड़ा तो भरोसा रहेगा।

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

करन भाई, सच कहा आपने। पिछली बार हमारे यहाँ भी रसगुल्ले दो दिन में ही खट्टे हो गए थे।

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