उदयपुर के मेवाड़ राजघराने में गहरा शोक छा गया है, जहाँ राजमाता साहिबा श्रीमती विजयराज कुमारी मेवाड़ का निधन हो गया। वे श्रीजी लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ की माता थीं। उनके महाप्रयाण की सूचना मिलते ही न केवल राजपरिवार बल्कि उनसे जुड़े सामाजिक, शैक्षणिक और परोपकारी हलकों में भी दुःख का माहौल बन गया। राजमाता विजयराज कुमारी का संपूर्ण जीवन राजमहल की सीमाओं से परे जनसेवा, सांस्कृतिक संरक्षण, आध्यात्मिक साधना और शैक्षणिक उन्नति के लिए समर्पित रहा, जिससे उन्होंने जनमानस में एक आदरणीय स्थान बनाया।
कच्छ राजघराने से उदयपुर तक का सफर
राजमाता विजयराज कुमारी का पैतृक नाता गुजरात के ऐतिहासिक कच्छ शाही घराने से था। वे कच्छ के महाराज फतेहसिंह जी की कनिष्ठ पुत्री और कच्छ के महाराव साहब की पौत्री थीं। उनकी आरंभिक स्कूली शिक्षा तमिलनाडु के ऊटी स्थित प्रसिद्ध फ्रांसिस्कन कॉन्वेंट में संपन्न हुई थी। बचपन के दिनों से ही उनके व्यक्तित्व में अनुशासन और विद्या के प्रति विशेष निष्ठा देखने को मिली। आगे चलकर 1960 के दशक में उन्हें अमेरिका और यूरोप महाद्वीप के देशों की व्यापक यात्राएं करने का अवसर मिला। उन विदेशी दौरों के दौरान उन्होंने पश्चिमी देशों में घटित हो रहे गहरे सामाजिक और आर्थिक बदलावों का गहन अवलोकन किया, जिसने उनकी दूरदर्शिता को और समृद्ध बनाया।
महाराणा अरविन्द सिंह मेवाड़ के साथ परिणय सूत्र में बंधने के पश्चात वे उदयपुर आईं। यहाँ आकर उन्होंने मेवाड़ की समृद्ध ऐतिहासिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और लोक कल्याणकारी दायित्वों को पूरी निष्ठा से अंगीकार किया। राजमहल के माध्यम से संचालित होने वाली तमाम जनकल्याणकारी और दान-पुण्य की गतिविधियों को गति देने में उनका सक्रिय मार्गदर्शन रहा। वे अनेक प्रतिष्ठित निजी और सार्वजनिक धर्मार्थ न्यासों के संचालन से जुड़ी रहीं। इनमें विशेष रूप से श्री एकलिंगजी ट्रस्ट उल्लेखनीय है, जो मेवाड़ अंचल के प्राचीन देवालयों, धार्मिक धरोहरों के संरक्षण और विकास कार्यों का दायित्व संभालता है।
शिक्षा, आतिथ्य और अध्यात्म के क्षेत्र में विशिष्ट कार्य
शिक्षा जगत के उन्नयन में राजमाता विजयराज कुमारी का योगदान अत्यंत प्रभावशाली रहा। 1980 के दशक में उन्होंने महाराणा मेवाड़ पब्लिक स्कूल के विस्तार और आधारभूत ढांचे को मजबूत बनाने में केंद्रीय भूमिका निभाई। उनके कुशल नेतृत्व में इस शिक्षण संस्थान ने आधुनिक और पेशेवर दृष्टिकोण अपनाते हुए शैक्षणिक उत्कृष्टता के नए मानक स्थापित किए। उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान अर्जित करने का साधन नहीं है, बल्कि यह भावी पीढ़ियों को जीवन मूल्य सिखाने और समाज को सशक्त दिशा देने का माध्यम है।
इसके साथ ही वे व्यवसाय और आतिथ्य क्षेत्र में भी सक्रिय रहीं। वे हिस्टोरिकल रिसॉर्ट्स होटल्स प्राइवेट लिमिटेड की संयुक्त प्रबंध निदेशक के तौर पर व्यावसायिक दायित्वों का निर्वहन करती रहीं। व्यक्तिगत जीवन में उनका गहरा जुड़ाव आध्यात्मिकता से रहा। वे बिहार स्कूल ऑफ योग की समर्पित साधक और अनुयायी थीं। उन्होंने इस आध्यात्मिक संस्थान और उसके प्रबुद्ध गुरुओं के उपदेशों तथा योग पद्धतियों के प्रचार-प्रसार में निरंतर सहयोग दिया।
संस्कारों और परंपराओं की समृद्ध विरासत
पारिवारिक धरातल पर राजमाता विजयराज कुमारी ने अपनी संतानों को आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ पारंपरिक भारतीय संस्कारों, गहरी आध्यात्मिक चेतना और पारिवारिक मर्यादाओं से जोड़े रखा। उनके द्वारा दिए गए यही संस्कार और मूल्य आज उनके पुत्र श्रीजी लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ के कार्यों और व्यक्तित्व में स्पष्ट झलकते हैं। लक्ष्यराज सिंह मेवाड़ वर्तमान में समाज सेवा, जनहितैषी गतिविधियों, कला, संस्कृति और मेवाड़ की गौरवशाली विरासत को संजोए रखने के कार्यों में निरंतर अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।
















