उदयपुर संभाग और पूरे मेवाड़ क्षेत्र में भील समाज की प्राचीन लोकनाट्य परंपरा गवरी का उत्साह के साथ शुभारंभ हो चुका है। रक्षाबंधन के ठीक अगले दिन यानी भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकम तिथि से इस अनूठे लोकनाट्य का आगाज होता है, जो लगभग सवा महीने तक अनवरत जारी रहता है। इस पूरी अवधि के दौरान मेवाड़ के विभिन्न गांवों और कस्बों में गवरी के मंचन के जरिए स्थानीय संस्कृति, धार्मिक मान्यताओं और सदियों पुरानी परंपराओं का जीवंत प्रदर्शन किया जाता है, जिसे देखने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भारी भीड़ उमड़ती है।
भील समाज की अनूठी सांस्कृतिक विरासत
गवरी को विशेष तौर पर भील समाज की सबसे महत्वपूर्ण और प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर माना जाता है। इस लोक परंपरा की मान्यता इतनी गहरी है कि समाज के कई परिवारों से कम से कम एक सदस्य का इस नाट्य दल में शामिल होना अनिवार्य सा माना जाता है। गवरी में भाग लेने वाले कलाकार अपने पारंपरिक और सामान्य जीवन को छोड़कर सवा महीने तक पूरी तरह से इस कला साधना में लीन रहते हैं। इस दौरान उनकी दिनचर्या आम इंसान की दिनचर्या से बिल्कुल भिन्न होती है और वे पूरी निष्ठा के साथ इस जिम्मेदारी को निभाते हैं।
गांव-गांव गूंजती है ढोल की थाप
गवरी के मंचन के दौरान कलाकारों के दल लगातार एक गांव से दूसरे गांव का सफर तय करते हैं। इन यात्राओं के दौरान ये टोलियां विभिन्न गांवों में पहुंचकर धार्मिक कथाओं, लोकगाथाओं और समाज से जुड़े विभिन्न प्रसंगों का सुंदर मंचन करती हैं। इन प्रस्तुतियों में भगवान शिव और माता पार्वती के प्रसंगों को विशेष प्रमुखता दी जाती है, जिन्हें कलाकार अपने अनूठे नृत्य, संवाद अदायगी और प्रभावशाली अभिनय के जरिए दर्शकों के सामने जीवंत करते हैं। ढोल, थाली और अन्य पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों की गूंज के बीच होने वाले इन आयोजनों से ग्रामीण अंचलों का पूरा माहौल भक्तिमय और उत्सव जैसा हो जाता है।
कड़े नियमों का पालन करते हैं कलाकार
गवरी उत्सव से जुड़ा सबसे कड़ा और रोचक पहलू इसमें भाग लेने वाले कलाकारों के सख्त नियम हैं। सवा महीने तक चलने वाले इस अनुष्ठान के दौरान कलाकार अपने घर-परिवार से पूरी तरह दूर रहते हैं और अपने घरों की ओर लौटकर नहीं जाते। इस पूरी अवधि में वे बेहद अनुशासित जीवन जीते हैं, जिसके तहत हरी सब्जियां, मांसाहार और मदिरा के सेवन पर पूर्ण प्रतिबंध रहता है। कलाकार अलग-अलग स्थानों पर प्रवास करते हुए नियमित रूप से माता गौरी की आराधना करते हैं और अपनी अगाध धार्मिक आस्था के साथ गवरी की प्रस्तुतियां देते हैं।
ग्रामीण अंचलों में छा जाती है रौनक
उदयपुर और उसके आसपास के पूरे मेवाड़ अंचल में गवरी के शुरू होते ही गांवों की तस्वीर बदल जाती है और चहुंओर रौनक बढ़ जाती है। जिस भी गांव में गवरी की टोली का आगमन होता है, वहां उत्सव जैसा माहौल बन जाता है और बड़ी संख्या में ग्रामीण इस कला को देखने के लिए एकत्र होते हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, हर आयु वर्ग के लोगों के लिए यह आयोजन अत्यधिक आकर्षण और मनोरंजन का मुख्य केंद्र रहता है, जो आपसी मेलजोल को भी बढ़ावा देता है।
मेवाड़ की सांस्कृतिक शान का प्रतीक
गवरी केवल एक लोकनाट्य नहीं बल्कि मेवाड़ की एक ऐसी समृद्ध सांस्कृतिक पहचान है जिसमें धर्म, लोक नृत्य, संगीत, अभिनय और समाज सुधार के संदेशों का अनूठा संगम देखने को मिलता है। आधुनिकता के इस दौर और बदलते समय के बावजूद भील समाज और मेवाड़ के आम जनमानस ने अपनी इस गौरवशाली परंपरा को आज भी पूरी शिद्दत के साथ जीवित रखा है। यही कारण है कि गवरी को मेवाड़ की सांस्कृतिक शान और अमूल्य धरोहर माना जाता है, जो सवा महीने तक अपनी अनूठी कला के जरिए हर किसी को मंत्रमुग्ध करती रहती है।





















