झुंझुनूं से सामने आई एक प्रेरणादायक कहानी में, जमवारामगढ़ की रहने वाली आदिवासी बेटी तुलसी मीणा ने तमाम आर्थिक तंगियों को पीछे छोड़ते हुए इतिहास रच दिया है। बड़े सपने देखने के लिए भारी-भरकम बैंक बैलेंस या मजबूत वित्तीय पृष्ठभूमि की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि इसके लिए केवल दृढ़ इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और अपने लक्ष्य के प्रति अटूट समर्पण की जरूरत होती है। जब इरादे चट्टान जितने मजबूत हों, तो रास्ते में आने वाली हर बाधा खुद-ब-खुद छोटी पड़ जाती है। तुलसी ने साबित कर दिया है कि विपरीत परिस्थितियां कभी भी किसी की उड़ान को हमेशा के लिए रोक नहीं सकतीं।
हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड का मिला महत्वपूर्ण सहयोग
अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्वतारोहण अभियानों में हिस्सा लेना किसी भी साधारण परिवार के लिए एक बहुत बड़ा वित्तीय बोझ होता है। तुलसी के सामने भी यही सबसे बड़ी चुनौती थी क्योंकि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। ऊंचे पहाड़ों को नापने का सपना तो उनकी आंखों में पल रहा था, लेकिन धन का अभाव इस रास्ते का सबसे बड़ा कांटा बना हुआ था। ऐसे कठिन समय में हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड ने अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत आगे आकर उनकी मदद का बीड़ा उठाया। कंपनी के इस अहम सहयोग ने उनके सपनों को एक ठोस धरातल प्रदान किया और उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिल गया।
31 अक्टूबर को शिखर पर लहराया भारत का राष्ट्रीय ध्वज
तंजानिया के मोशी शहर से 27 अक्टूबर को इस कठिन पर्वतारोहण अभियान का आधिकारिक आगाज हुआ था। 360 एक्सप्लोरर के बैनर तले आयोजित इस ट्रैक के दौरान तुलसी को कई प्रकार की जलवायु और बेहद चुनौतीपूर्ण भौगोलिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जैसे-जैसे वे समुद्र तल से ऊपर की ओर बढ़ रही थीं, मौसम का मिजाज और अधिक कठोर होता जा रहा था। कड़ाके की ठंड, लगातार गिरता हुआ तापमान, शरीर को झकझोर देने वाली हवाएं और हवा में ऑक्सीजन की भारी कमी जैसी समस्याओं ने उनके धैर्य की कड़ी परीक्षा ली। इन तमाम शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों को मात देते हुए उन्होंने 31 अक्टूबर को 19,341 फीट की ऊंचाई पर स्थित माउंट किलिमंजारो के शिखर पर कदम रख दिया और वहां भारतीय तिरंगा शान से फहरा दिया।
पर्वत की चढ़ाई के दौरान आईं अनगिनत बाधाएं
पर्वतारोहण एक ऐसा साहसिक खेल है जिसमें उत्कृष्ट शारीरिक फिटनेस के साथ-साथ मानसिक तौर पर भी बेहद मजबूत होना पड़ता है। ऊंचाई वाले इलाकों में जाने पर आक्सीजन का स्तर काफी नीचे गिर जाता है, जिससे हर एक सांस लेना भी किसी जंग जीतने जैसा हो जाता है। इसके अलावा कम तापमान और पथरीले रास्ते शरीर की ऊर्जा को तेजी से चूस लेते हैं। तुलसी ने इन تمام विषम परिस्थितियों के बीच अपना पूरा ध्यान केवल अपनी मंजिल पर केंद्रित रखा। उन्होंने हार मानने के बजाय हर एक बाधा का डटकर मुकाबला किया और आखिरकार अफ्रीका महाद्वीप की इस सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा लहराने में कामयाबी हासिल कर ली।
बेटी बचाओ का संदेश देकर सामाजिक सरोकार निभाया
शिखर पर पहुंचने के बाद इस युवा पर्वतारोही ने अपनी इस ऐतिहासिक सफलता को समाज के एक बेहद महत्वपूर्ण मुद्दे से जोड़ा। उन्होंने किलिमंजारो की चोटी पर खड़े होकर 'सेव गर्ल चाइल्ड' का संदेश पूरी दुनिया तक पहुंचाया। उनकी यह अनूठी पहल इस बात का प्रमाण है कि यदि बालिकाओं को थोड़ा सा प्रोत्साहन और उचित अवसर मिले, तो वे दुनिया के किसी भी कोने में अपनी अनूठी पहचान बना सकती हैं। आर्थिक या सामाजिक बाधाएं कभी भी किसी होनहार बेटी की प्रतिभा का दायरा तय नहीं कर सकतीं। किलिमंजारो पर लहराता हुआ वह तिरंगा इस बात का सबसे बड़ा प्रतीक बन गया कि अगर हौसले बुलंद हों तो आसमान को भी छुआ जा सकता है।
अब अगली चुनौती के रूप में ऑस्ट्रेलिया की चोटी पर नजर
इस बड़ी अंतरराष्ट्रीय सफलता को हासिल करने के बाद अब तुलसी मीणा ने अपने सफर को यहीं रोकने का मन नहीं बनाया है। उन्होंने अपनी अगली बड़ी मंजिल की तैयारियां अभी से शुरू कर दी हैं। उनकी अगली योजना ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप की सबसे ऊंची चोटी माउंट कोसियुस्को पर तिरंगा फहराने की है। इस आगामी मिशन के लिए भी उन्हें हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड से सहयोग मिलने की पूरी उम्मीद है। किलिमंजारो पर मिली इस पहली बड़ी कामयाबी ने उनके आत्मविश्वास को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है और उनके लिए पर्वतारोहण की दुनिया में अनगिनत नए रास्ते खोल दिए हैं।



















