भीलवाड़ा में दिवाली के पावन पर्व पर एक अनोखा और विशेष बाजार आकर्षण का केंद्र बना हुआ है, जो साल भर में केवल सात दिनों के लिए संचालित होता है। इस विशेष बाजार में पारंपरिक खरीदारी के बजाय ग्रामीण इलाकों और खेती किसानी से जुड़े लोग पहुंचते हैं, जो अपने कृषि उपकरणों और वाहनों को सजाने के लिए सामान खरीदने आते हैं। शहर के अन्य बाजारों में जहां आधुनिक उपभोक्ता वस्तुओं की धूम रहती है, वहीं इस अस्थाई बाजार का पूरा फोकस किसानों और ग्रामीण संस्कृति पर केंद्रित होता है।
हाथों से तैयार होती हैं सजावट की वस्तुएं
ट्रैफिक थाने के निकट अस्थाई दुकानें सजाने वाले व्यापारी फारूक बताते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से वाहनों की सजावट का काम संभालता आ रहा है। वे हर साल केवल दिवाली के इस सात दिवसीय अवसर पर भीलवाड़ा आते हैं और अपनी दुकानें लगाते हैं। इस बाजार में कुल 20 से 25 दुकानें सजती हैं, जहां ट्रैक्टर, जेसीबी, ट्रक, बैलगाड़ी और मोटरसाइकिल को सजाने के लिए रंग-बिरंगे और आकर्षक सामान मिलते हैं। यहां बिकने वाली अधिकांश एसेसरीज कारीगरों द्वारा खुद अपने हाथों से तैयार की जाती हैं, जबकि कुछ खास सामान बाहर से भी मंगवाया जाता है।
साधनों की पूजा और ग्रामीण आस्था
तिलस्वां गांव से खरीदारी करने आए किसान गोविंद अहीर का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में साधनों का विशेष महत्व होता है। जिस प्रकार लोग दिवाली के खास दिन पर खुद नए वस्त्र पहनते हैं, उसी तरह ग्रामीण अपने काम आने वाले संसाधनों जैसे ट्रैक्टर, बैलगाड़ी, ट्रक और जेसीबी को भी सजाते-संवारते हैं। किसानों की आजीविका और आमदनी इन्हीं वाहनों और उपकरणों के जरिए चलती है, जिससे उनका घर परिवार संचालित होता है। दीपावली पर लक्ष्मी पूजन के बाद इन सभी संसाधनों की पूजा करने की पुरानी परंपरा है, जिसके चलते ग्रामीण इस अनूठे बाजार से खरीदारी करने पहुंचते हैं।



















