रात के सन्नाटे में जब नन्हा शिशु बारम्बार रोने लगता है, तब मां अपनी गहरी नींद छोड़कर उसे दुलारने और शांत कराने में जुट जाती है। आंखों में नींद का भारीपन, देह में टूटन और अगले दिन घर तथा शिशु की अनगिनत जिम्मेदारियों की चिंता मन पर हावी रहने लगती है। वहीं दूसरी ओर जब जीवनसाथी चैन की नींद सो रहा हो, तो मां के अंतर्मन में यह टीस उठना स्वाभाविक हो जाता है कि हर रात केवल उसी की नींद क्यों टूटे। यही दबी हुई शिकायत भोर होते ही घरेलू कामकाज अथवा देखभाल की छोटी-छोटी बातों पर तकरार बनकर फूट पड़ती है। अक्सर पत्नी को यह बात गहराई से चुभने लगती है कि उसका हमसफर उसकी अथाह थकान और मानसिक दबाव को महसूस क्यों नहीं कर पा रहा है।
शिशु के आगमन के पश्चात यह भावनात्मक उथल-पुथल अनगिनत घरों में देखने को मिलती है। जिन दांपत्य साथियों के बीच पहले घंटों स्नेहभरी बातें हुआ करती थीं, वही जीवनसाथी कुछ ही हफ्तों में खटकने लगता है। पति की मामूली सी आदत या अनसुनी बातें भी भीतर एक भारी खीझ पैदा करने लगती हैं। कई बार यह गुस्सा इतना विकराल रूप ले लेता है कि आपसी प्रेम की जगह अलगाव अथवा नफरत जैसी कड़वाहट महसूस होने लगती है। हालांकि, मनोचिकित्सा और संबंधों के नजरिए से देखें तो इसका अर्थ यह कतई नहीं होता कि दांपत्य में सच्चा अनुराग समाप्त हो गया है। इसके मूल में दरअसल नींद की निरंतर कमी, विश्राम का अभाव, निजी अस्तित्व का खोना और संबल की गैरमौजूदगी छिपी होती है। इन अंतर्निहित कारणों की पड़ताल करने पर छह प्रमुख बिंदु स्पष्ट रूप से सामने आते हैं।
शिशु की समूची देखभाल का बोझ अकेले ढोने की विवशता
जब शिशु के रोने पर चुप कराने, दूध पिलाने, नहलाने, सुलाने से लेकर बाल रोग विशेषज्ञ के पास ले जाने की सारी जिम्मेदारियां केवल मां के कंधों पर आ टिकती हैं, तब मन में अलगाव का भाव घर करने लगता है। महिला को यह प्रतीत होने लगता है कि संतान के पालन-पोषण का जिम्मा सिर्फ और सिर्फ उसी का है। इसके विपरीत, जब वह देखती है कि पति का दैनिक जीवन, दफ्तर और सामाजिक दिनचर्या बिना किसी खास व्यवधान के पहले की तरह सामान्य गति से चल रही है, तो दोनों के बीच यह असमानता गहरी नाराजगी में तब्दील हो जाती है। अधिकांश मामलों में मां को काम की अधिकता से उतना कष्ट नहीं होता, जितना इस बात से होता है कि उसका जीवनसाथी उसके समर्पण और श्रम को अनदेखा कर रहा है।
अनवरत अनिद्रा और देह तोड़ देने वाली शारीरिक थकान
नन्हे शिशु के जन्म के बाद किसी भी मां के लिए निर्बाध और पर्याप्त नींद लेना एक अत्यंत दुर्लभ बात हो जाती है। शिशु रात भर में कई बार जागता है और दिन के पहर में भी मां को तनिक आराम करने की फुर्सत नहीं मिल पाती। निरंतर नींद का अभाव सीधे तौर पर मस्तिष्क के रासायनिक संतुलन, भावनात्मक स्थिरता, धैर्य और स्वभाव को प्रभावित करता है। मस्तिष्क के अति-संवेदनशील होने के कारण जीवनसाथी की एक छोटी सी असावधानी या देर से की गई प्रतिक्रिया भी पहाड़ जैसी प्रतीत होने लगती है। जब शारीरिक ऊर्जा का स्तर शून्य हो जाता है, तो महिला के मन में यह निराशा घर कर जाती है कि परिवार में उसकी पीड़ा को कोई समझ नहीं पा रहा है।
अपनी पहचान और निजी स्वतंत्रता के छूट जाने का संताप
मातृत्व के प्रारंभिक चरण में अनगिनत महिलाएं यह अनुभव करती हैं कि उनकी अपनी आकांक्षाएं, शौक और जीवन जैसे कहीं पीछे छूट गए हैं। गर्भावस्था से पूर्व सहेलियों से मिलना-जुलना, खरीदारी करना, पुस्तकें पढ़ना, बाहर टहलना या बस कुछ पल शांत एकांत बिताना बेहद सहज हुआ करता था। शिशु के आने के बाद दिन का प्रत्येक क्षण बच्चे के रोने, भूख और सोने के चक्र के अनुसार तय होने लगता है। ऐसी स्थिति में जब पति अपने दफ्तर के मित्रों के साथ बाहर जाने या अपने शौक पूरे करने के लिए सहजता से समय निकाल लेता है, तो पत्नी के भीतर असमान व्यवहार और उपेक्षा का गहरा बोध जन्म लेने लगता है।
संवेदनशील एवं भावनात्मक संबल का सर्वथा अभाव
गृहस्थी में केवल भौतिक सहयोग या शिशु के सामान की व्यवस्था कर देना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि हर मां को आंतरिक भावनात्मक संबल की सर्वाधिक आवश्यकता होती है। कई बार पुरुष यह मान लेते हैं कि घर का वित्तीय खर्च उठाना, दवाइयां लाना और आवश्यक वस्तुएं जुटा देना ही उनका दायित्व है। इसके उलट, एक थकी हुई मां केवल इतना चाहती है कि उसका पति उसके पास बैठकर आत्मीयता से पूछे कि उसका स्वास्थ्य कैसा है या आज का दिन कितना थकावट भरा रहा। जब हफ्तों तक ऐसे सहानुभूतिपूर्ण दो शब्द भी सुनने को नहीं मिलते, तो मन की दबी हुई उदासी धीरे-धीरे पति के प्रति कठोर नाराजगी में ढल जाती है।
शारीरिक संरचना में बदलाव और गिरता आत्मसम्मान
गर्भावस्था और प्रसव के पश्चात स्त्री के शरीर में भारी जैविक और भौतिक परिवर्तन आते हैं। अनियंत्रित वजन, पेट पर खिंचाव के निशान, बालों का झड़ना और मांसपेशियों की कमजोरी जैसी बातें महिला के मन में अपनी शारीरिक छवि को लेकर असहजता पैदा कर देती हैं। इस नाजुक दौर में महिला को अपने जीवनसाथी की ओर से अतिरिक्त स्नेह, संवेदनशीलता और सराहना की दरकार होती है। यदि उसे यह जरा भी आभास हो कि उसका साथी उसके बदले हुए शरीर को लेकर असहज है या पहले जैसा आकर्षण व्यक्त नहीं कर रहा, तो दोनों के मध्य भावनात्मक और शारीरिक दूरी तीव्र गति से बढ़ने लगती है।
प्रेमियों से सिमटकर केवल माता-पिता की भूमिका में बंध जाना
शिशु के आगमन के साथ ही पति-पत्नी का सारा संवाद केवल घरेलू आवश्यकताओं तक सीमित होकर रह जाता है। दैनिक बातचीत में केवल डायपर की कमी, चिकित्सक का परामर्श, टीकाकरण का समय या आगामी जरूरतों जैसे विषय ही बाकी रह जाते हैं। वे मधुर, व्यक्तिगत और भविष्य को लेकर की जाने वाली गुफ्तगू पूरी तरह पृष्ठभूमि में चली जाती है जो कभी उनके रिश्ते की बुनियाद हुआ करती थी। इस निरंतर यंत्रवत दिनचर्या का परिणाम यह होता है कि दोनों स्वयं को एक-दूसरे का प्रेमी या साथी मानने के बजाय महज बच्चे की देखभाल करने वाली प्रबंधकीय इकाई समझने लगते हैं।
क्या यह दुर्भावना है अथवा भीतर दबी हुई सहायता की पुकार
मन में उठने वाले इस आक्रोश को यदि गहराई से परखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि पति के प्रति नफरत का यह भाव वास्तविक शत्रुता नहीं है। इसके पीछे छिपी हुई असली आवाज होती है कि मां अत्यधिक थक चुकी है, वह स्वयं को सर्वथा अकेला पा रही है, उसे मदद की तत्काल दरकार है और वह चाहती है कि उसकी आंतरिक व्यथा को सम्मान दिया जाए। क्रोध को समस्या मानने के स्थान पर उस अभाव को पहचानना अनिवार्य है जो इस क्रोध को जन्म दे रहा है।
इस जटिल दौर से बाहर निकलने के लिए पति-पत्नी दोनों को बिना एक-दूसरे पर दोषारोपण किए शांत मन से संवाद साधना चाहिए। बच्चे के पालन-पोषण की जिम्मेदारियों का स्पष्ट विभाजन, मां को प्रतिदिन निर्बाध आराम और स्वयं के लिए निजी समय उपलब्ध कराना तथा दांपत्य के लिए कुछ पल निकालना अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है। यदि इसके बावजूद मन में अवसाद, अत्यधिक चिड़चिड़ापन, निराशा, अनियंत्रित क्रोध या रिश्ते से पूरी तरह उदासीनता के लक्षण बने रहें, तो किसी योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ अथवा चिकित्सक से परामर्श लेना सर्वथा उचित कदम है। मातृत्व केवल शिशु के जीवन की शुरुआत नहीं है, बल्कि यह माता-पिता दोनों के साझे रिश्ते को पुनः परिपक्व और संवेदनशील बनाने की मांग करता है।



















