तिरुपति के प्रमुख बालाजी मंदिर से मात्र चार से पांच किलोमीटर की दूरी पर पापनाशनम मार्ग के सघन जंगलों के बीच श्री जापाली आंजनेय स्वामी हनुमान मंदिर स्थापित है। प्रकृति की गोद में बसे इस पावन स्थल की प्रसिद्धि यहाँ की एक अनूठी और प्राचीन आस्था के कारण दूर-दूर तक फैली हुई है।
पेड़ पर सिक्का चिपकाने की अनोखी परंपरा
इस पवित्र मंदिर परिसर में एक बेहद पुराना पेड़ मौजूद है, जिस पर वर्षों से निरंतर सिंदूर का लेप किया जाता रहा है। यहाँ दर्शन के लिए पहुँचने वाले श्रद्धालु अपनी कोई भी मनोकामना मन में रखकर सिंदूर की इस मोटी परत पर सिक्का चिपकाने का प्रयास करते हैं। जनश्रुति के अनुसार, यदि मन्नत मांगते वक्त सिक्का पेड़ पर सफलतापूर्वक टिक जाता है, तो पवनपुत्र हनुमान जी की असीम अनुकंपा प्राप्त होती है। भक्तों का ऐसा दृढ़ विश्वास है कि इस उपाय से गंभीर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां, लंबे समय से चली आ रही बीमारियां और जीवन के तमाम कष्ट दूर हो जाते हैं।
महर्षि जापाली की तपस्थली और पौराणिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं और कथाओं के पन्नों को पलटें तो प्राचीन काल में महर्षि जापाली ने इसी सुनसान और एकांत जंगल में भीषण तपस्या की थी। उनकी अटूट भक्ति से संतुष्ट होकर हनुमान जी ने इसी जगह पर उन्हें अपने साक्षात दर्शन दिए थे, जिसके बाद से इस पावन क्षेत्र का नाम जापाली तीर्थम पड़ गया। इसके अतिरिक्त, एक अन्य प्रचलित कथा यह भी कहती है कि लंका पर विजय पाने के उपरांत अयोध्या वापस लौटते समय भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी ने कुछ समय इसी पावन भूमि पर विश्राम किया था।
प्राकृतिक सौंदर्य और जल कुंड का महत्व
मंदिर के पास ही एक प्राकृतिक जल स्रोत या कुंड भी स्थित है, जिसके बारे में श्रद्धालुओं की मान्यता है कि इसके पवित्र जल का आचमन करने या स्नान करने से मन को शांति मिलती है और सारे मानसिक दोष मिट जाते हैं। शेषाचलम बायोस्फीयर रिजर्व का हिस्सा होने के कारण यहाँ का परिवेश अत्यधिक शांत और मनमोहक रहता है। मुख्य सड़क से करीब एक किलोमीटर तक सीढ़ियों का पैदल रास्ता पार करके मंदिर तक पहुँचा जाता है, जहाँ मार्ग में दुर्लभ मालाबार गिलहरियां और अन्य वन्यजीव भी सहज रूप से घूमते हुए दिख जाते हैं। हैदराबाद और तेलंगाना से तिरुपति की यात्रा पर आने वाले यात्रियों के लिए यह स्थल आध्यात्मिक ऊर्जा और दर्शन का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।



















