मानसून के आगमन के साथ ही राजस्थान के बीहड़ इलाकों में छिपे धार्मिक स्थल प्राकृतिक सुंदरता से सराबोर हो उठे हैं। पाली और उदयपुर जिले की सीमा पर अरावली की दुर्गम पर्वत शृंखलाओं के बीच बसा तिलकेश्वर महादेव मंदिर इन दिनों श्रद्धालुओं और रोमांच प्रेमियों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र बना हुआ है। घने जंगलों और ऊंची चोटियों से घिरे इस मंदिर का वातावरण बरसात के मौसम में अद्भुत रूप धारण कर लेता है, जहां चारों ओर बहते झरने और हरी-भरी वादियां किसी पर्वतीय पर्यटन स्थल जैसी अनुभूति कराती हैं। सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव के दर्शन के लिए यहाँ भक्तों का तांता लगा हुआ है।
अरावली की वादियों में स्थित प्राकृतिक शिवालय
पाली जिले की बाली तहसील की सीमा और उदयपुर जिले के मेवाड़ अंचल में स्थित 'मठ' गांव के समीप यह ऐतिहासिक मंदिर बना हुआ है। भीमाणा गांव से लगभग 20 किलोमीटर दूर एकांत में स्थित यह धार्मिक स्थान अपनी कठिन भौगोलिक बनावट के लिए जाना जाता है। मानसून के दौरान जब अरावली की पहाड़ियां हरियाली की चादर ओढ़ लेती हैं, तब यहाँ का विहंगम दृश्य कश्मीर की खूबसूरत वादियों का अहसास कराता है। शहर के शोर-शराब से दूर प्राकृतिक वातावरण में स्थित होने के कारण यहाँ आने वाले भक्तों को अध्यात्म के साथ-साथ प्राकृतिक शांति का भी अनुभव होता है।
यह स्थान उन लोगों के लिए विशेष रूप से रोमांचकारी है जो धार्मिक यात्रा के साथ साहसिक ट्रेकिंग का अनुभव लेना चाहते हैं। बारिश के दिनों में अरावली की पहाड़ियों से पानी नीचे गिरता है, जिससे मंदिर के आसपास कई छोटे-बड़े प्राकृतिक जलप्रपात बहने लगते हैं। इन जलप्रपातों की गर्जना और ठंडी हवाएं श्रद्धालुओं की थकान को दूर कर देती हैं।
लोहे की जंजीर और संकरी सीढ़ियों का जोखिम भरा सफर
तिलकेश्वर महादेव मंदिर की सबसे बड़ी खासियत और चुनौती इसका प्राकृतिक गर्भगृह है। यह गर्भगृह गहराई में स्थित है और इसे देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई पाताल लोक में प्रवेश कर रहा हो। मंदिर के मुख्य भाग तक पहुंचने के लिए कोई समतल या पक्का मार्ग उपलब्ध नहीं है। श्रद्धालुओं को प्राकृतिक चट्टानों को तराशकर बनाई गई बेहद संकरी सीढ़ियों के जरिए नीचे उतरना पड़ता है।
नीचे उतरते समय संतुलन बनाए रखना और फिसलने से बचना सबसे बड़ी चुनौती होती है। श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए यहाँ चट्टानों के किनारे मजबूत लोहे की जंजीरें बांधी गई हैं। गर्भगृह में उतरने वाले हर भक्त को इन जंजीरों को मजबूती से थामकर एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ता है। जरा सी चूक या असावधानी खतरनाक साबित हो सकती है। जो बुजुर्ग या अस्वस्थ श्रद्धालु नीचे उतरने का जोखिम नहीं उठा पाते, वे पहाड़ी के ऊपरी हिस्से से ही नतमस्तक होकर महादेव के दर्शन करते हैं और अपनी पूजा-अर्चना संपन्न करते हैं।
झरने से जलाभिषेक और सुरक्षा के कड़े नियम
जो श्रद्धालु साहस दिखाकर और लोहे की जंजीर के सहारे नीचे गर्भगृह तक पहुंचते हैं, उन्हें एक अद्भुत और अलौकिक अनुभव प्राप्त होता है। नीचे पहुँचते ही शीतल जलप्रपात की धाराएं भक्तों का स्वागत करती हैं। यह जलप्रपात प्राकृतिक रूप से शिवलिंग और महादेव की प्रतिमा के ऊपर निरंतर गिरता रहता है, जिससे भगवान शिव का स्वतः जलाभिषेक होता रहता है। इस दृश्य को देखकर श्रद्धालु अपनी सारी थकान भूल जाते हैं और भक्ति भाव में लीन हो जाते हैं।
सावन के सोमवार और पूरे महीने के दौरान यहाँ श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। न केवल पाली और उदयपुर, बल्कि आसपास के जिलों जैसे सिरोही, जालोर, जोधपुर, बीकानेर और पड़ोसी राज्य गुजरात से भी हजारों की संख्या में दर्शनार्थी अपनी मनोकामनाएं लेकर यहाँ पहुंचते हैं। हालांकि, मंदिर का रास्ता अत्यंत बीहड़ और खतरनाक होने के कारण सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है। स्थानीय परंपरा और सुरक्षा मानकों के तहत शाम 5 बजे के बाद पहाड़ियों और मंदिर क्षेत्र में आवाजाही पूरी तरह से बंद कर दी जाती है। शाम ढलने से पहले ही सभी श्रद्धालुओं को सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाता है ताकि किसी अप्रिय घटना से बचा जा सके।



















