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ब्रह्माजी के 108 हवन कुंडों से पवित्र हुई थी चित्रकूट की धारा, जानिए रामघाट स्थित यज्ञवेदी मंदिर का पौराणिक इतिहासधर्म
9 सित॰ 2026, 4:10 pm (21 दिन पहले)· 2

ब्रह्माजी के 108 हवन कुंडों से पवित्र हुई थी चित्रकूट की धारा, जानिए रामघाट स्थित यज्ञवेदी मंदिर का पौराणिक इतिहास

चित्रकूट के रामघाट पर बना यज्ञवेदी मंदिर सनातन आस्था का अद्भुत केंद्र है, जहाँ ब्रह्माजी ने 108 कुंड बनाकर यज्ञ किया था और त्रेता युग में भगवान श्रीराम ने ज्ञानसभा का आयोजन किया था।

चित्रकूट में पावन मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित रामघाट का यज्ञवेदी मंदिर धार्मिक आस्था और पौराणिक इतिहास का एक अनुपम केंद्र है। सनातन परंपराओं के अनुसार, इसी स्थान पर जगत्पिता ब्रह्माजी ने 108 हवन कुंडों का निर्माण कर एक महान यज्ञ का अनुष्ठान किया था। इसी पावन घटना के कारण इस धार्मिक स्थल को यज्ञवेदी मंदिर के नाम से जाना जाता है। आज भी मंदिर परिसर में आने वाले श्रद्धालु इन 108 ऐतिहासिक हवन कुंडों का दर्शन कर स्वयं को अत्यंत सौभाग्यशाली मानते हैं।

सतयुग की अपवित्रता और ब्रह्माजी का पावन संकल्प

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सतयुग के कालखंड में यह पवित्र भूमि असुरों के निवास और उनके निरंतर बढ़ते अत्याचारों के कारण अपवित्र हो गई थी। राक्षसों के कुकृत्यों से चित्रकूट की धरती की सात्विकता और पवित्रता समाप्त हो चुकी थी। इसी दौर में भगवान ब्रह्माजी को अपने दिव्य ज्ञान से यह ज्ञात हुआ कि आने वाले त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम अपने 14 वर्षों के लंबे वनवास का एक महत्वपूर्ण समय चित्रकूट के पावन वनों में व्यतीत करेंगे।

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प्रभु श्रीराम के पदार्पण से पूर्व इस पवित्र भूमि का शोधन करना अत्यंत आवश्यक था। इसी उद्देश्य से ब्रह्माजी ने चित्रकूट की धरती को पुनः सात्विक और शुद्ध बनाने का दृढ़ संकल्प लिया। उन्होंने यहां विधि-विधान पूर्वक 108 यज्ञ कुंड तैयार करवाए और ऋषियों-मुनियों की उपस्थिति में महायज्ञ संपन्न किया। इसी अलौकिक यज्ञ के पुण्य प्रभाव से चित्रकूट की भूमि पूर्णतः पवित्र हुई और कालांतर में यह भगवान श्रीराम की प्रमुख तपोस्थली के रूप में प्रतिष्ठित हुई। आज भी इन 108 हवन कुंडों की उपस्थिति श्रद्धालुओं की अपार श्रद्धा का केंद्र बनी हुई है।

श्रीराम की ज्ञानसभा और 16वीं सदी का ऐतिहासिक पुनरुद्धार

मंदिर प्रांगण के भीतर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी की अत्यंत मनमोहक झांकी स्थापित की गई है। यहां दर्शन के लिए आने वाले भक्त प्रभु राम और उनके परिवार के साथ-साथ ब्रह्माजी की दिव्य प्रतिमा के भी दर्शन प्राप्त करते हैं। मंदिर के पुजारी कृष्ण दत्त द्विवेदी बताते हैं कि चित्रकूट एक अनादि तीर्थ क्षेत्र है, जिसका विनाश महाप्रलय की स्थिति में भी संभव नहीं माना जाता। उनके अनुसार, वनवास काल में भगवान श्रीराम ने अपने नंगे पैरों से चित्रकूट की पावन रज पर विचरण किया था। धार्मिक मान्यता यह भी है कि त्रेता युग में प्रभु राम ने इसी यज्ञवेदी मंदिर परिसर में एक विशाल ज्ञानसभा का आयोजन किया था।

त्रेता युग की उस ऐतिहासिक ज्ञानसभा में भगवान श्रीराम के साथ उनके तीनों भाई, तीनों माताएं और अनेक देवी-देवता उपस्थित हुए थे। यही कारण है कि इस स्थान को केवल एक साधारण मंदिर न मानकर प्रभु श्रीराम के जीवन से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और पौराणिक केंद्र माना जाता है। समय बीतने के साथ श्रद्धालुओं की निरंतर बढ़ती आस्था को देखते हुए 16वीं शताब्दी में मध्य प्रदेश की पन्ना रियासत के राजा मान ने इस यज्ञवेदी मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण कराया था। वर्तमान समय में लगभग 5 बीघे के विस्तृत क्षेत्र में फैला यह मंदिर परिसर श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

सवाल-जवाब

चित्रकूट का यज्ञवेदी मंदिर कहाँ स्थित है?
यह पावन मंदिर मध्य प्रदेश के चित्रकूट में प्रसिद्ध रामघाट पर स्थित है।
यज्ञवेदी मंदिर में कितने हवन कुंड मौजूद हैं?
मंदिर परिसर के भीतर ब्रह्माजी द्वारा स्थापित 108 हवन कुंड आज भी सुरक्षित रूप से मौजूद हैं।
ब्रह्माजी ने चित्रकूट में यज्ञ क्यों किया था?
सतयुग में असुरों के कारण अपवित्र हुई भूमि को शुद्ध करने और त्रेता युग में प्रभु राम के आगमन हेतु इसे पवित्र बनाने के लिए ब्रह्माजी ने यज्ञ किया था।
यज्ञवेदी मंदिर का पुनर्निर्माण किस राजा ने करवाया था?
16वीं शताब्दी में पन्ना रियासत के राजा मान ने श्रद्धालुओं की आस्था को देखते हुए मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था।
ज्ञानसभा के दौरान प्रभु श्रीराम के साथ कौन-कौन मौजूद था?
ज्ञानसभा में भगवान श्रीराम के साथ उनके तीनों भाई, तीनों माताएं और विभिन्न देवी-देवता उपस्थित थे।
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