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गणेश चतुर्थी 2026: घर में क्यों वर्जित है दाईं सूंड वाले गणपति की स्थापना? जानें दिशा और रंग से जुड़े खास नियमधर्म
10 सित॰ 2026, 11:49 am (2 घंटे पहले)· 2

गणेश चतुर्थी 2026: घर में क्यों वर्जित है दाईं सूंड वाले गणपति की स्थापना? जानें दिशा और रंग से जुड़े खास नियम

गणेश चतुर्थी 2026 की शुरुआत 14 सितंबर को सोमवार से होने जा रही है। घर में गणपति स्थापना से पहले मूर्ति की सूंड, दिशा, रंग और स्वरूप से जुड़े वास्तु नियमों को जानना बेहद जरूरी है।

गणेश चतुर्थी 2026 के महापर्व की शुरुआत 14 सितंबर दिन सोमवार से होने जा रही है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर साल भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से इस पावन उत्सव का आरंभ होता है और दस दिनों तक पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश विसर्जन के साथ इसका समापन होता है। इन दस दिनों के दौरान देश भर के घरों और सार्वजनिक पंडालों में विघ्नहर्ता भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित की जाती है और भक्त पूरी श्रद्धा के साथ उनकी सेवा करते हैं। वास्तु शास्त्र और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि आप अपने घर या पंडाल में गणपति बप्पा को विराजमान करने की योजना बना रहे हैं, तो आपको कुछ खास बातों का विशेष ध्यान रखना होगा। मूर्ति का स्वरूप कैसा होना चाहिए, उसे किस दिशा में रखना उचित है और उसका रंग कैसा होना चाहिए, इन सभी पहलुओं को समझना आवश्यक है ताकि घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहे।

घर के लिए क्यों खास है बाईं सूंड वाले गणपति की प्रतिमा

गणेश चतुर्थी के अवसर पर जब आप गणपति बप्पा की मूर्ति खरीदने बाजार जाते हैं, तो आपको कई बातों पर गौर करना पड़ता है। धार्मिक मान्यताओं और वास्तु के सिद्धांतों के मुताबिक सामान्य घरों के लिए हमेशा बाईं ओर मुड़ी हुई सूंड वाले गणेश जी की प्रतिमा को सबसे उत्तम और शुभ माना जाता है। इस प्रकार के गणेश को वाममुखी गणपति कहा जाता है और इनकी मूर्ति में चंद्र तत्व का प्रभाव माना गया है। इनकी पूजा-आराधना करना काफी सरल होता है और इनके प्रभाव से घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का वास होता है। ऐसी मूर्ति को गृहस्थ जीवन के लिए अत्यंत सरल और सौम्य स्वरूप माना गया है, यही वजह है कि आम तौर पर पारिवारिक पूजा-पाठ के लिए बाईं सूंड वाली प्रतिमाओं को ही प्राथमिकता दी जाती है।

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दाईं सूंड वाले गणेशजी की पूजा के कड़े नियम

इसके विपरीत, दाईं ओर मुड़ी हुई सूंड वाले गणेशजी की प्रतिमा को दक्षिणामुखी कहा जाता है और इनमें सूर्य तत्व का विशेष प्रभाव माना जाता है। इस तरह के स्वरूप को सीधे तौर पर सिद्धिविनायक रूप से जोड़ा जाता है और इनकी पूजा-अर्चना में बहुत ही सख्त नियमों और कड़े अनुशासन का पालन करना अनिवार्य होता है। ऐसा माना जाता है कि दक्षिणामुखी गणेशजी की उपासना में अगर जरा सी भी चूक हो जाए, तो इसके परिणाम विपरीत भी आ सकते हैं। यही मुख्य कारण है कि ऐसी मूर्तियों को मुख्य रूप से मंदिरों में स्थापित किया जाता है, जबकि आम गृहस्थ जीवन में घर पर इनकी स्थापना करने से बचने की सलाह दी जाती है ताकि अनुशासन में किसी प्रकार की त्रुटि न हो।

बैठी हुई मुद्रा और शांत चेहरे का महत्व

घर में गणेश चतुर्थी के पर्व के दौरान हमेशा बैठी हुई मुद्रा में गणेशजी की मूर्ति लाना ही शुभ माना जाता है। भगवान की यह विराजमान मुद्रा जीवन में स्थिरता, सुख और शांति का प्रतीक मानी जाती है। इसके अलावा, मूर्ति का चेहरा शांत और प्रसन्न भाव वाला होना चाहिए ताकि घर में आते ही एक सकारात्मक माहौल का अनुभव हो। मूर्ति किसी भी प्रकार से खंडित या टूटी हुई नहीं होनी चाहिए, क्योंकि खंडित मूर्ति की पूजा करना वर्जित माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चार भुजाओं वाले गणेशजी के हाथों में पाश, अंकुश, मोदक और अभय मुद्रा का होना भी बेहद शुभ स्वरूप माना जाता है।

गणेशजी की मूर्ति के लिए कौन से रंग हैं शुभ

भगवान गणेश की प्रतिमा के रंग को लेकर भी शास्त्रों में अलग-अलग मान्यताएं और निर्देश दिए गए हैं। मुख्य रूप से सिंदूरी, सफेद और पीले रंग की गणेश प्रतिमा को अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके अलावा कुछ परंपराओं में हल्का पीला, सफेद, क्रीम और हरे रंग को भी सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इसलिए जब भी आप बाजार से मूर्ति खरीदें, तो बहुत ज्यादा गहरे या अजीबोगरीब रंगों के बजाय पारंपरिक, शांत और सौम्य रंगों वाली प्रतिमा का ही चुनाव करें ताकि पूजा का माहौल आध्यात्मिक बना रहे।

वाहन और प्रिय भोग से जुड़ी जरूरी बातें

गणेशजी की प्रतिमा खरीदते समय इस बात की भी जांच कर लें कि उनके साथ उनका वाहन यानी मूषक जरूर बना हुआ हो और उनके हाथ में उनका प्रिय भोग मोदक या लड्डू सुशोभित हो। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मूषक भगवान गणेश का आधिकारिक वाहन है और मोदक उन्हें सबसे अधिक प्रिय है। प्रतिमा का पूरा स्वरूप सुंदर, संतुलित और हर प्रकार से साफ-सुथरा होना चाहिए ताकि दर्शन मात्र से मन को प्रसन्नता मिल सके।

मूर्ति स्थापना की सही दिशा और पर्यावरण का ध्यान

वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार गणेशजी की प्रतिमा का मुख हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना सबसे अधिक शुभ माना जाता है। इसके अलावा घर के पूजा स्थल के लिए ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा को सबसे ज्यादा पवित्र और ऊर्जावान माना गया है। हालांकि घर की बनावट और पारिवारिक पूजा परंपराओं के मुताबिक स्थान का अंतिम चयन किया जा सकता है। मूर्ति खरीदते समय सबसे अहम बात यह है कि प्रतिमा अखंड, सुंदर, शांत स्वरूप वाली और आपकी श्रद्धा के अनुरूप हो। इसके साथ ही, प्लास्टर ऑफ पेरिस के बजाय मिट्टी या प्राकृतिक सामग्री से बनी पर्यावरण-अनुकूल मूर्ति चुनना इस गणेश उत्सव को प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए मनाने का एक बेहतरीन विकल्प है।

सवाल-जवाब

गणेश चतुर्थी 2026 की शुरुआत कब से होगी?
गणेश चतुर्थी की शुरुआत 14 सितंबर दिन सोमवार से होगी।
घर के लिए किस तरफ मुड़ी सूंड वाले गणेशजी शुभ माने जाते हैं?
घर के लिए बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेशजी यानी वाममुखी गणपति को शुभ माना जाता है।
दाईं सूंड वाले गणेशजी को क्या कहा जाता है?
दाईं सूंड वाले गणेशजी को दक्षिणामुखी कहा जाता है और इनकी पूजा के नियम काफी कठोर होते हैं।
गणेशजी की प्रतिमा का मुख किस दिशा में होना चाहिए?
मूर्ति का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना शुभ माना जाता है।
मूर्ति किस सामग्री से बनी होनी चाहिए?
पर्यावरण के अनुकूल मिट्टी या प्राकृतिक सामग्री से बनी मूर्तियां चुनना सबसे अच्छा विकल्प है।
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