सनातन परंपरा में पितृपक्ष का समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे पावन काल माना जाता है। हर वर्ष आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से श्राद्ध कर्म आरंभ होते हैं, जिनका समापन आश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या यानी सर्वपितृ अमावस्या पर होता है। आमतौर पर यह रस्म दिवंगत परिजनों की आत्मा की तृप्ति और सद्गति के लिए उनके वंशज निभाते हैं। इसके विपरीत, बिहार के पावन गया तीर्थ में एक ऐसा अद्वितीय देवालय भी मौजूद है, जहां इंसान अपनी सांसें चलते हुए ही स्वयं का पिंडदान संपन्न कर लेता है। सदियों से चली आ रही इस विलक्षण परंपरा को देखने और निभाने के लिए दूर-दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं।
भस्मकूट पर्वत पर स्थित जनार्दन स्वामी का धाम
बिहार के प्रसिद्ध तीर्थ स्थल गया में भस्मकूट पर्वत की तलहटी और मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर दिशा में जनार्दन मंदिर स्थापित है। इस पावन गर्भगृह में जगत के पालनहार भगवान विष्णु अपने जनार्दन स्वरूप में विराजमान हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संपूर्ण गया क्षेत्र में लगभग 54 पिंडवेदी और 53 अत्यंत पवित्र स्थल चिन्हित हैं, जहां लोग अपने पितरों के मोक्ष के लिए तर्पण करने आते हैं। पूरी दुनिया के भीतर जनार्दन मंदिर की वेदी एकमात्र ऐसा दुर्लभ स्थान है, जहां जीवित रहते हुए खुद का श्राद्ध करने का शास्त्रीय विधान मौजूद है। पितृपक्ष के पंद्रह दिनों के दौरान यहां अपने भविष्य की आध्यात्मिक शांति की कामना लेकर आने वाले भक्तों का भारी जमावड़ा देखने को मिलता है।
आखिर जीवित रहते क्यों कराया जाता है आत्मश्राद्ध?
इस अनूठी परंपरा के पीछे अत्यंत गहरा धार्मिक और सामाजिक कारण जुड़ा हुआ है। जिन व्यक्तियों की अपनी कोई संतान नहीं होती अथवा जिनके परिवार में उनकी मृत्यु के उपरांत पिंडदान करने वाला कोई सगा-संबंधी नहीं बचता, वे लोग अपने जीते-जी इस मंदिर में पहुंचकर आत्मश्राद्ध का संकल्प लेते हैं। इसके अतिरिक्त कई लोग परिवार होते हुए भी सांसारिक मोह-माया को त्यागकर वैराग्य धारण कर लेते हैं या संन्यास मार्ग चुन लेते हैं, वे भी स्वयं का पिंडदान करने यहां पहुंचते हैं।
गरुड़ पुराण और अन्य धर्मग्रंथों में यह मान्यता वर्णित है कि यदि किसी देहधारी का मरणोपरांत विधिपूर्वक पिंडदान और तर्पण न हो, तो उसकी जीवात्मा भटकाव की स्थिति में पड़ जाती है और उसे सद्गति नहीं मिल पाती। जनार्दन मंदिर को लेकर आस्था है कि यहां अर्पित किए गए पिंड को साक्षात भगवान विष्णु ग्रहण करते हैं। जब कोई व्यक्ति अपने जीवनकाल में ही यह अनुष्ठान पूरा कर लेता है, तो उसकी मृत्यु के पश्चात उसके परिजनों पर कोई कर्मकांड करने की बाध्यता नहीं रहती। इससे मनुष्य के समस्त पितृ दोष दूर हो जाते हैं और देहावसान के बाद आत्मा को यमलोक की यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता।
तीन दिनों तक चलने वाले विशेष अनुष्ठान का विधान
जनार्दन मंदिर में आत्मश्राद्ध की पूरी प्रक्रिया एक दिन में समाप्त नहीं होती, बल्कि इसे पूर्ण होने में कुल तीन दिनों की निर्धारित समयावधि लगती है। गयाजी तीर्थ पहुंचने पर सबसे पहले साधक वैष्णव सिद्धि का पावन संकल्प धारण करता है और अपने जाने-अनजाने में हुए समस्त पापों का प्रायश्चित करता है। इसके उपरांत भगवान जनार्दन स्वामी के सम्मुख वैदिक मंत्रोच्चार, विशेष पूजा-अर्चना और आराध्य के नाम का विधिवत जाप संपन्न किया जाता है।
इस अनुष्ठान के दौरान भगवान के चरणों में दही और पके हुए चावल से निर्मित तीन विशेष पिंड अर्पित किए जाते हैं। इस पूजा का सबसे निराला नियम यह है कि इसमें काले तिल का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता। सामान्य तौर पर जब किसी मृत पूर्वज के लिए श्राद्ध किया जाता है, तो उसमें तिल की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है, परंतु जीवित मनुष्य के आत्मश्राद्ध में तिल का उपयोग वर्जित रखा गया है। पिंड अर्पित करते समय श्रद्धालु परमपिता से यह विनय करता है कि हे प्रभु, मैं जीवित रहते हुए अपनी आत्मा की मुक्ति के लिए यह पिंड आपके श्रीचरणों में समर्पित कर रहा हूं। जब भी मेरी देह से प्राणों का त्याग हो, आपके परम आशीर्वाद से मेरी जीवात्मा को सीधे मोक्ष पद की प्राप्ति हो।



















