दीपावली का त्योहार अंधकार पर प्रकाश और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है, लेकिन बीकानेर में इस पर्व का एक ऐसा रूप भी देखने को मिलता है जो सभी प्रकार की धार्मिक दीवारों को लांघकर आपसी प्रेम और भाईचारे की अनूठी मिसाल पेश करता है। यहां हर साल दीपावली के आगमन से पहले मुस्लिम समाज के लोग उर्दू भाषा में रचित रामायण का पाठ करते हैं। पिछले लगभग 30 वर्षों से लगातार चली आ रही यह अनूठी परंपरा अब इस शहर की साझी संस्कृति और गंगा-जमुनी तहजीब की एक खास पहचान बन चुकी है। इस आयोजन में किसी एक वर्ग के बजाय हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग बड़ी संख्या में एक साथ शिरकत करते हैं और रामायण के छंदों को पूरी तल्लीनता के साथ सुनते हैं।
सांस्कृतिक संस्थाओं का साझा प्रयास
इस अनूठे सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन पर्यटन लेखक संघ और महफिल-ए-अदब नामक संस्थाओं द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। इस सिलसिले में डॉ. जिया-उल-हसन कादरी जानकारी देते हैं कि इस परंपरा की नींव लगभग 25 से 30 वर्ष पूर्व एडवोकेट उपध्यान चंद्र कोचर के मार्गदर्शन और प्रेरणा से पड़ी थी। तभी से यह सिलसिला लगातार हर साल दीपावली के पावन अवसर से ठीक पहले निभाया जा रहा है। इसके अलावा, वर्ष 2012 के बाद से इस आयोजन में नियमित रूप से उर्दू रामायण का पाठ करने की परंपरा और अधिक सुदृढ़ हुई है, जिसमें दोनों समुदायों के लोग पूरी श्रद्धा से भाग लेते हैं।
मौलवी बादशाह हुसैन राणा लखनवी का जुड़ाव
इस आयोजन का सबसे खास और रोचक पहलू यह है कि जिस उर्दू रामायण का पाठ किया जाता है, उसका गहरा इतिहास भी इसी बीकानेर की पावन धरती से जुड़ा हुआ है। बात वर्ष 1935 की है, जब लखनऊ के जाने-माने उर्दू शायर मौलवी बादशाह हुसैन राणा लखनवी बीकानेर में निवास कर रहे थे। उस कालखंड में वे बीकानेर रियासत के महाराजा गंगासिंह के दरबार में उर्दू और फारसी भाषा के अनुवादक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे थे। उन्होंने अपनी इसी कर्मभूमि पर रहते हुए इस अनूठी रचना को तैयार किया था जो आज भी लोगों को आपस में जोड़ने का काम कर रही है।
कड़ी मेहनत के बाद हुई थी रचना
डॉ. जिया-उल-हसन कादरी बताते हैं कि उस दौर में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की तरफ से विभिन्न मातृभाषाओं में कविता के रूप में रामायण लिखने के लिए एक विशेष प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। उसी दौरान राणा लखनवी के एक कश्मीरी पंडित मित्र और उनके शिष्य ने उनसे आग्रह किया कि वे उर्दू में रामायण की रचना करें। शुरुआत में मौलवी साहब को रामायण की कथा के बारे में पूरी जानकारी नहीं थी। ऐसी स्थिति में उनके मित्र ने उन्हें रामचरितमानस की पूरी कथा और तमाम प्रसंगों से विस्तार से अवगत कराया। इसके बाद उन्होंने रामचरितमानस का गहन अध्ययन किया, उसे पूरी तरह समझा और करीब तीन महीने तक लगातार कड़ी मेहनत करने के बाद उर्दू छंदों में रामायण का एक सुंदर काव्य रचा।
नौ पृष्ठों की रचना और प्रतिष्ठित गोल्ड मेडल
मौलवी बादशाह हुसैन राणा लखनवी की यह कृति अपनी संक्षिप्तता और उत्कृष्ट साहित्यिक सुंदरता के कारण बहुत खास मानी जाती है। मात्र नौ पृष्ठों में समेटी गई इस उर्दू रामायण में कुल 27 छंद शामिल हैं, और प्रत्येक छंद के भीतर छह-छह पंक्तियां दी गई हैं। इस रचना के पूरा होने के लगभग तीन महीने बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से यह सूचना प्राप्त हुई कि उनकी इस उर्दू रामायण को पूरे देश में इस प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है। इस बड़ी उपलब्धि के लिए उन्हें प्रतिष्ठित गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था। कहा जाता है कि तत्कालीन महाराजा गंगासिंह ने इस साहित्यिक रचना के महत्व को भली-भांति समझते हुए इसे आठवीं कक्षा के पाठ्यक्रम में भी शामिल करवाया था।
आज भी कायम है सौहार्द की यह मिसाल
आज लगभग एक सदी बीत जाने के बाद भी राणा लखनवी की यह अनूठी रचना लोगों को दिलों से जोड़ने का काम कर रही है। दीपावली के पर्व से पहले आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम में दोनों समुदायों के लोग समान श्रद्धा, उल्लास और गर्मजोशी के साथ हिस्सा लेते हैं। रामायण के पाठ का यह पूरा कार्यक्रम संपन्न होने के बाद वहां मौजूद सभी लोग एक साथ मिलकर प्रसाद ग्रहण करते हैं, जो आपसी भाईचारे की भावना को और अधिक प्रगाढ़ करता है।



















