श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व देशभर में पूरी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस मौके पर मंदिरों से लेकर घरों तक हर तरफ उत्सव का माहौल रहता है और भक्तजन मध्यरात्रि तक भगवान के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। सनातन संस्कृति में इस महापर्व से जुड़ी कई ऐसी अनूठी रस्में और परंपराएं हैं, जिनका गहरा धार्मिक अर्थ होता है। इन्हीं परंपराओं में एक अहम विधान पूजा के समय खीरे का इस्तेमाल करना है, जिसे कई क्षेत्रों में भगवान के जन्म से जुड़ी प्रक्रिया का रूप माना जाता है।
सनातन परंपरा के अनुसार, खीरे को माता देवकी के गर्भ का प्रतीक माना जाता है और इसके साथ जुड़े डंठल को गर्भनाल का रूप दिया जाता है। इस अनुष्ठान के लिए हमेशा एक सही और ताजा खीरा चुना जाता है। मध्यरात्रि ठीक बारह बजे के समय इस अनुष्ठान को पूरा किया जाता है, जहां एक पवित्र बर्तन में खीरे को रखकर उसके डंठल को चाकू की सहायता से अलग किया जाता है। डंठल अलग होने की इस प्रक्रिया को भगवान के प्राकट्य का पूर्ण होना माना जाता है। इसके तुरंत बाद लड्डू गोपाल को बाहर लाकर उन्हें गंगाजल, दूध और अन्य द्रव्यों से बने पंचामृत से स्नान कराया जाता है, जिसके बाद मुख्य पूजन की शुरुआत होती है।
धार्मिक मान्यताओं के आधार पर, भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आधी रात के वक्त हुआ था। उनका जन्म मथुरा नगरी में क्रूर राजा कंस की काल कोठरी में हुआ था। यह मान्यता है कि उन्होंने पृथ्वी पर से अधर्म का पूरी तरह नाश करने और धर्म की पुनर्स्थापना के उद्देश्य से अवतार लिया था। इस खास दिन पर श्रद्धालु व्रत रखते हैं और भगवान के बाल स्वरूप यानी लड्डू गोपाल की विशेष आराधना करते हैं। रात्रि के बारह बजते ही शंख ध्वनि और घंटियों के नाद के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है। देश के विभिन्न मंदिरों में सुंदर झांकियां सजाई जाती हैं और आराध्य को नए वस्त्र तथा माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है। ऐसी आस्था है कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने से घर-परिवार में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति का वास होता है।
खीरे का नाल छेदन कैसे किया जाता है
इस पूरी परंपरा के विधि-विधान की बात करें तो पूजा के लिए सबसे पहले एक ऐसा ताजा खीरा लाया जाता है जिसमें उसका डंठल सुरक्षित लगा हो। खीरे को अच्छी तरह साफ करने के बाद उसे पूजा स्थल पर भगवान की मूर्ति या बाल गोपाल के समीप रख दिया जाता है। इसके बाद भगवान का पंचामृत से अभिषेक किया जाता है और पूरी विधि से पूजन व आरती संपन्न होती है। मध्यरात्रि के वक्त, जब कन्हैया के जन्म का समय निर्धारित होता है, तब शंखों की गूंज, घंटियों की आवाज और जयकारों के बीच खीरे के डंठल को एक साफ चाकू या अन्य पूजा उपकरण से काटा जाता है।
कई परिवारों में इस खास क्रिया को नाल छेदन की संज्ञा दी जाती है। इस रस्म को पूरा करने के बाद खीरे को भगवान को अर्पित किया जाता है और बाद में इसे प्रसाद के रूप में परिवार के बीच बांटा जाता है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, इस अनुष्ठान को करने से भक्तगण भगवान के जन्मोत्सव में प्रत्यक्ष रूप से अपनी सहभागिता महसूस करते हैं। जब आधी रात को घरों और मंदिरों में कन्हैया के जन्म के उल्लास में जयकारे गूंजते हैं, तो यह छोटी सी पारंपरिक रस्म इस पूरे उत्सव के आनंद को और अधिक बढ़ा देती है।



















