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कोल्हापुर की बाबूजमाल दरगाह में अनोखी परंपरा, चौखट पर गणेश आरती और अंदर गूंजती है अज़ान व नमाज़धर्म
27 अग॰ 2026, 8:13 am (35 दिन पहले)· 2

कोल्हापुर की बाबूजमाल दरगाह में अनोखी परंपरा, चौखट पर गणेश आरती और अंदर गूंजती है अज़ान व नमाज़

महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित हज़रत पीर सैयद शाहजमाल कलंदर दरगाह में हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालु एक साथ अपनी धार्मिक आस्था पूरी करते हैं, जहाँ मुख्य द्वार पर गणेश जी की आरती और भीतर नमाज़ अदा की जाती है।

महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर में स्थित एक पवित्र स्थल आज पूरे देश के लिए धार्मिक सद्भाव और आपसी भाईचारे की अद्भुत मिसाल पेश कर रहा है। शहर के ताराबाई रोड पर स्थित हज़रत पीर सैयद शाहजमाल कलंदर दरगाह, जिसे स्थानीय लोग बाबूजमाल दरगाह के नाम से भी जानते हैं, एक ऐसा अनोखा स्थान है जहाँ हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग एक ही परिसर में एकत्र होकर अपनी अपनी धार्मिक परंपराओं का पालन करते हैं। यहाँ रोजाना सुबह का नज़ारा अत्यंत मनमोहक होता है, जहाँ एक तरफ़ भगवान की आरती और मंत्रोच्चार गूंजते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ इबादत, दुआ और नमाज़ का दौर चलता है।

दरगाह की मुख्य चौखट पर उकेरी गई ऐतिहासिक गणेश प्रतिमा

इस दरगाह की सबसे अनूठी और ऐतिहासिक विशेषता इसके प्रवेश द्वार की चौखट पर स्थापित भगवान गणेश जी की पाषाण प्रतिमा है। शिलालेख के रूप में उत्कीर्ण यह मूर्ति अत्यंत प्राचीन बताई जाती है। कई दशकों से यहाँ रोजाना सुबह के समय हिंदू श्रद्धालु बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं। वे प्रतिमा के समक्ष धूप और दीप जलाकर विधि विधान से आरती करते हैं, ताज़े पुष्प अर्पित करते हैं और शीश झुकाकर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। मुख्य द्वार पर होने वाली यह दैनिक पूजा अर्चना श्रद्धालुओं की अटूट श्रद्धा का प्रतीक है।

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भीतर मज़ार पर चादर और नमाज़ की पवित्र परंपरा

दरगाह के मुख्य प्रवेश द्वार को पार करते ही परिसर का धार्मिक परिवेश एक नए रूप में सामने आता है। भीतर बाबूजमाल की पवित्र मज़ार स्थित है, जहाँ मुस्लिम श्रद्धालु सिर पर टोपी धारण कर दोनों हाथ उठाकर ईश्वर से दुआ माँगते हैं। यहाँ नियमित रूप से नमाज़ अदा की जाती है, जियारत की जाती है और मज़ार पर अकीदत की चादर चढ़ाई जाती है। इस पूरे वातावरण में दोनों समुदायों के बीच परस्पर आदर की भावना बनी रहती है, जहाँ मुस्लिम श्रद्धालु भी द्वार पर विराजित भगवान गणेश के प्रति गहरी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

गंगा-जमुनी तहज़ीब का जीवंत केंद्र और दूर-दराज से पहुँचते लोग

यह धार्मिक स्थान केवल मुस्लिम समाज या स्थानीय निवासियों तक सीमित नहीं है, बल्कि हिंदू श्रद्धालु भी बाबूजमाल बाबा की मज़ार पर श्रद्धापूर्वक चादर चढ़ाते हैं और अपनी मन्नतें माँगते हैं। सदियों से चली आ रही यह पावन परंपरा कोल्हापुर में गंगा-जमुनी तहज़ीब और सामाजिक सौहार्द को सुदृढ़ करती आ रही है। इस अनूठी सांस्कृतिक एकता की चर्चा अब दूर-दराज के क्षेत्रों तक फैल चुकी है, जिसके चलते देश के विभिन्न हिस्सों से लोग इस अद्वितीय दृश्य का अवलोकन करने और यहाँ नतमस्तक होने आ रहे हैं।

सवाल-जवाब

यह अनोखी दरगाह कहाँ स्थित है?
यह दरगाह महाराष्ट्र के कोल्हापुर शहर में ताराबाई रोड पर स्थित है, जिसे हज़रत पीर सैयद शाहजमाल कलंदर दरगाह या बाबूजमाल दरगाह के नाम से जाना जाता है।
दरगाह की चौखट पर किस भगवान की मूर्ति स्थापित है?
दरगाह के मुख्य प्रवेश द्वार की चौखट पर भगवान गणेश की एक प्राचीन शिलालेख रूपी पाषाण प्रतिमा उत्कीर्ण है।
दरगाह में हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालु क्या धार्मिक कार्य करते हैं?
हिंदू श्रद्धालु चौखट पर भगवान गणेश की आरती करते हैं और मज़ार पर चादर चढ़ाते हैं, जबकि मुस्लिम श्रद्धालु भीतर बाबूजमाल की मज़ार पर नमाज़ अदा करते हैं और चादर चढ़ाते हैं।
क्या मुस्लिम श्रद्धालु भी चौखट पर स्थित गणेश मूर्ति के प्रति श्रद्धा रखते हैं?
हाँ, इस दरगाह में आने वाले मुस्लिम श्रद्धालु भी प्रवेश द्वार पर विराजित भगवान गणेश की प्रतिमा के प्रति पूरा आदर और श्रद्धा भाव व्यक्त करते हैं।
इस दरगाह को किस परंपरा का प्रतीक माना जाता है?
यह दरगाह भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब, सांप्रदायिक सौहार्द और हिंदू-मुस्लिम एकता का एक अनूठा उदाहरण मानी जाती है।
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