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विजयादशमी पर क्यों निभाई जाती है सिंदूर खेला की अनोखी परंपरा, जानिए इसका धार्मिक महत्व और इतिहासधर्म
20 अक्तू॰ 2026, 10:17 am (29 मिनट पहले)· 0

विजयादशमी पर क्यों निभाई जाती है सिंदूर खेला की अनोखी परंपरा, जानिए इसका धार्मिक महत्व और इतिहास

दुर्गा पूजा के समापन और विजयादशमी के अवसर पर पश्चिम बंगाल समेत देश के कई हिस्सों में सिंदूर खेला की रस्म बेहद उल्लास के साथ पूरी की जाती है। इस प्राचीन परंपरा में महिलाएं मां को विदाई देने से पहले एक-दूसरे को सिंदूर लगाती हैं।

शक्ति उपासना का पर्व नवमी तिथि के साथ पूरा हो चुका है और अब देशभर में 20 अक्टूबर को दशहरे का पर्व मनाने की तैयारियां जोरों पर चल रही हैं। इस साल पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का आयोजन काफी भव्य स्तर पर देखने को मिला है। विजयादशमी के दिन माता दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन से ठीक पहले बंगाल में प्रसिद्ध 'सिंदूर खेला' की रस्म अदा की जाती है। पौराणिक कथाओं और मान्यताओं के अनुसार, नवरात्र के पावन दिनों में मां दुर्गा अपने मायके यानी पृथ्वी लोक पर आती हैं और विजयादशमी के दिन भगवान शिव के धाम वापस लौट जाती हैं। इसी भावनात्मक विदाई के साथ दुर्गा पूजा के आखिरी दिन विशेष कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।

देवी बोरोन और सिंदूर लगाने की रस्म

इस अनूठी परंपरा के तहत विवाहित महिलाएं सबसे पहले मां दुर्गा की प्रतिमा के चरणों और मस्तक पर सिंदूर समर्पित करती हैं। इसके पश्चात वे आपस में एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की मंगल कामना करती हैं। इस खास अनुष्ठान के दौरान पान के पत्ते से देवी के मुख का स्पर्श किया जाता है और उन्हें भावभीनी विदाई दी जाती है। इस पूरी प्रक्रिया को 'देवी बोरोन' के नाम से जाना जाता है। मां को सिंदूर अर्पित करने के बाद महिलाओं का यह समूह एक-दूसरे के माथे, गालों और पूरे चेहरे पर सिंदूर लगाता है ताकि अखंड सुहाग का आशीर्वाद बना रहे।

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पोशाक और बंगाली संस्कृति का प्रतीक

इस उत्सव के दौरान महिलाओं के पहनावे का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिसमें वे पारंपरिक रूप से लाल बॉर्डर वाली सफेद साड़ी और हाथों में चूड़ियां पहनती हैं। बंगाल की संस्कृति में यह उत्सव 'स्त्री शक्ति', आपसी एकता और भारी उत्साह का एक बड़ा प्रतीक माना जाता है। इतिहास के पन्नों को पलटें तो 'सिंदूर खेला' की यह परंपरा लगभग 400 साल पुरानी है। समय के साथ यह प्राचीन रस्म अब केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं रही है, बल्कि देश के अन्य राज्यों के साथ-साथ विदेशों में बसे बंगाली समुदायों के बीच भी बेहद लोकप्रिय हो चुकी है।

सामाजिक बदलाव और धुनुची नृत्य का महत्व

पारंपरिक रूप से इस उत्सव में विधवा, किन्नर या तलाकशुदा महिलाओं के शामिल होने पर प्रतिबंध जैसी कुप्रथाएं थीं, लेकिन आधुनिक समाज में आए सकारात्मक बदलावों के कारण अब सभी महिलाएं इस उल्लास में खुलकर हिस्सा लेती हैं। इस मौके पर पारंपरिक धुनुची नृत्य भी किया जाता है, जिसकी गूंज अब देश के कोने-कोने में सुनाई देने लगी है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस विशेष नृत्य से मां दुर्गा बेहद प्रसन्न होती हैं। मां की विदाई के इस पावन अवसर पर मुंबई जैसे महानगरों में फिल्मी हस्तियां और सेलिब्रिटी भी बड़े पैमाने पर इस रस्म का हिस्सा बनते नजर आते हैं।

विभिन्न अनुष्ठानों का धार्मिक और सांस्कृतिक सार

दुर्गा पूजा के इन अंतिम पड़ावों पर सिंदूर खेला, धुनुची नृत्य और देवी बोरोन जैसी परंपराओं का गहरा महत्व होता है। विजयादशमी के दिन मां को सिंदूर चढ़ाने के बाद सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ यह पर्व संपन्न होता है। धुनुची नृत्य के दौरान भक्तगण धूप और नारियल की भूसी से भरे हुए धुनुची नामक पात्र को अपने हाथों में थामकर मां दुर्गा के सम्मुख अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। यह अनुष्ठान उनकी अगाध भक्ति और श्रद्धा का खुला इजहार है। वहीं दूसरी ओर, देवी बोरोन के तहत महिलाएं मां को मिठाई, पान और सिंदूर भेंट कर विदा करती हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि बेटी अपने मायके से ससुराल लौट रही है।

सवाल-जवाब

सिंदूर खेला की रस्म कब निभाई जाती है?
यह रस्म विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन से ठीक पहले पूरी की जाती है।
देवी बोरोन क्या है?
देवी बोरोन एक विदाई अनुष्ठान है जिसमें महिलाएं पान के पत्ते से देवी के मुख का स्पर्श कर उन्हें मिठाई और सिंदूर अर्पित करती हैं।
सिंदूर खेला की परंपरा कितनी पुरानी है?
बंगाली संस्कृति से जुड़ी सिंदूर खेला की यह परंपरा लगभग 400 वर्ष पुरानी मानी जाती है।
धुनुची नृत्य का क्या महत्व है?
भक्तगण धूप और नारियल की भूसी से भरे पात्र को लेकर मां दुर्गा के सामने नृत्य करते हैं जिसे भक्ति की अभिव्यक्ति माना जाता है।
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