समूचे देश में विजयादशमी का पावन उत्सव अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक आख्यानों के मुताबिक, इसी शुभ दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का संहार किया था। इसके साथ ही देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर के मर्दन का प्रसंग भी इसी पर्व के साथ श्रद्धापूर्वक जोड़ा जाता है। पारंपरिक रूप से इस दिन शाम के समय विभिन्न मैदानों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशालकाय पुतलों का दहन कर खुशियां मनाई जाती हैं। हालांकि, भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर कुछ ऐसे अनूठे स्थान भी मौजूद हैं जहां की रवायत आम धारणा से बिल्कुल उलट है। ऐसा ही एक अनोखा गांव महाराष्ट्र के अकोला जिले में मौजूद है, जहां विजयादशमी पर रावण को आग के हवाले करने के बजाय बड़ी श्रद्धा के साथ उसकी आरती उतारी जाती है।
सांगोला गांव में दस सिर वाले राजा की पूजा
अकोला जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर के फासले पर बसा सांगोला गांव अपनी एक अनूठी परंपरा के लिए विख्यात है। इस गांव में दशहरे की शाम पुतला दहन का कोई आयोजन नहीं होता, बल्कि यहां रावण की भव्य पूजा और विशेष महाआरती का आयोजन किया जाता है। गांव के मुख्य प्रवेश द्वार पर ही रावण की एक विशाल प्रतिमा स्थापित है। यह पूरी प्रतिमा एक ही काले पत्थर को तराश कर बनाई गई है। इस मूर्ति में रावण को दस सिरों वाले एक पराक्रमी राजा के स्वरूप में दिखाया गया है, जिसके हाथों में विभिन्न अस्त्र और शस्त्र सुसज्जित हैं। दूर-दराज से आने वाले लोग इस भव्य स्वरूप को देखकर आश्चर्यचकित रह जाते हैं, क्योंकि सामान्य तौर पर रावण को केवल खलनायक के रूप में ही याद किया जाता है।
अवगुणों को छोड़ सद्गुणों को अपनाने का फलसफा
गांव के बाशिंदों की इस पूजा के पीछे एक गहरा दार्शनिक दृष्टिकोण है। ग्रामीणों का मानना है कि रावण के जीवन में कुछ गंभीर अवगुण जरूर थे, जिनकी वजह से उसका अंत हुआ, लेकिन उसके पास अपार ज्ञान, तपस्या और प्रशासनिक कुशलता जैसे अनेक सद्गुण भी मौजूद थे। सांगोला के लोगों का कहना है कि किसी भी पात्र को केवल घृणा और तिरस्कार की नजर से देखने के बजाय उसके अच्छे गुणों को स्वीकार करना चाहिए। भारतीय दर्शन दुर्गुणों के त्याग और विद्वता के सम्मान की सीख देता है। इसी सोच के तहत यहां की पीढ़ियां रावण के दोषों को दरकिनार करते हुए उसके पांडित्य और सकारात्मक पक्षों का सम्मान करती आ रही हैं और इसी कारण यहां उसे पूजा जाता है।
चिखल गांव से आई प्रतिमा का दिलचस्प इतिहास
गांव के बुजुर्गों और स्थानीय युवाओं के अनुसार, इस प्रतिमा की स्थापना लगभग 200 से 300 वर्ष पूर्व हुई मानी जाती है। सांगोला के पास ही एक अन्य बस्ती चिखल स्थित है। इतिहास बताता है कि रावण की इस अनूठी पाषाण प्रतिमा का निर्माण उसी चिखल गांव में एक कुशल शिल्पकार द्वारा किया गया था। मूर्ति बनकर तैयार होने के बाद उसे किसी अन्य निर्धारित स्थान पर ले जाने की योजना थी। प्रतिमा को ले जाने के लिए उसे एक पारंपरिक बैलगाड़ी पर लादा गया था। जब यह बैलगाड़ी सांगोला के पास से बहने वाली नदी के समीप पहुंची, तो वहां पहुंचते ही गाड़ी के पहिए अचानक रुक गए। काफी प्रयासों के बावजूद प्रतिमा को सांगोला की सरहद से आगे नहीं ले जाया जा सका।
प्रवेश द्वार पर मंदिर और शनिवार की विशेष पूजा
जब मूर्ति को गांव की सीमा के पार ले जाना असंभव हो गया, तो इसे एक दैवीय संकेत मानकर ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से मूर्ति को गांव के मुख्य द्वार पर ही विधिवत स्थापित करने का निर्णय लिया। तभी से यह स्थान एक सिद्ध स्थल के रूप में विकसित हो गया। मंदिर के पुजारी बालकृष्ण जाधव बताते हैं कि यह पाषाण प्रतिमा सैकड़ों वर्ष पुरानी है और उनके गुरुजी ने उन्हें बैलगाड़ी से जुड़े इस ऐतिहासिक घटनाक्रम की जानकारी दी थी। पुजारी के अनुसार, मंदिर में रोज नियमित पूजा होती है, लेकिन शनिवार के दिन का विशेष महत्व है। प्रत्येक शनिवार को प्रतिमा की पूजा नारियल के तेल से की जाती है और सुगंधित धूप, दीप तथा अगरबत्ती जलाकर विशेष प्रार्थना संपन्न होती है। दशहरे पर होने वाली महाआरती में पूरा गांव एकजुट होकर शामिल होता है।



















