राजस्थान के अजमेर जिले में बसा पुष्कर तीर्थ पूरी दुनिया में भगवान ब्रह्मा की आराधना का सबसे प्रमुख और दुर्लभ केंद्र माना जाता है. सृष्टि के रचयिता होने के बावजूद पूरे भूमंडल पर भगवान ब्रह्मा के मंदिर और उनकी नियमित पूजा-अर्चना न के बराबर देखने को मिलती है. इस अनूठी धार्मिक परंपरा के पीछे एक अत्यंत प्राचीन और चर्चित पौराणिक गाथा जुड़ी हुई है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सावित्री के दिए एक गंभीर श्राप के कारण धरती पर ब्रह्मा जी के मंदिर निर्माण और पूजा पर रोक लग गई थी, जिसके बाद केवल पुष्कर की पावन धरती को ही इस पाबंदी से विशेष छूट प्राप्त हो सकी.
महायज्ञ की तैयारी और दुर्लभ शुभ मुहूर्त की चुनौती
पुष्कर के स्थानीय पुजारियों द्वारा बताई जाने वाली पौराणिक कथा के मुताबिक, एक बार देवर्षि नारद भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे और उन्हें पुष्कर क्षेत्र में एक विशाल महायज्ञ आयोजित करने का संदेश दिया. उस समय यज्ञ के आयोजन के लिए एक ऐसा दुर्लभ और कल्याणकारी शुभ मुहूर्त उपस्थित हुआ था, जो आने वाले 10 हजार वर्षों तक दोबारा नहीं मिलने वाला था. मुहूर्त के महत्व को समझते हुए भगवान ब्रह्मा ने बिना किसी विलंब के यज्ञ की प्रक्रिया तुरंत शुरू करने का संकल्प लिया. हालांकि, जब यज्ञ कराने पहुंचे प्रकांड विद्वान ब्राह्मणों ने विधि-विधान पर विचार किया, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि बिना धर्मपत्नी की उपस्थिति के कोई भी महायज्ञ विधिवत पूर्ण नहीं माना जा सकता.
गायत्री से विवाह और अनुष्ठान की शुरुआत
शुभ मुहूर्त का समय तेजी से निकला जा रहा था और माता सावित्री नियत समय पर यज्ञ स्थल पर उपस्थित नहीं हो सकी थीं. समय की भारी कमी को देखते हुए विद्वान ब्राह्मणों ने एक व्यावहारिक उपाय सुझाया. उनकी सलाह के आधार पर जंगल से गुर्जर जाति की गायत्री नाम की एक कन्या को यज्ञ मंडप में लाया गया. इसके बाद भगवान ब्रह्मा का विवाह विधिपूर्वक गायत्री के साथ संपन्न कराया गया और उन्हें अर्धांगिनी के रूप में साथ बैठाकर महायज्ञ की आहुतियां शुरू कर दी गईं.
माता सावित्री का भीषण क्रोध और भूमंडल को मिला श्राप
जब माता सावित्री को इस बात की सूचना मिली कि भगवान ब्रह्मा ने उनकी अनुपस्थिति में दूसरी पत्नी के साथ यज्ञ अनुष्ठान आरंभ कर दिया है, तो वे अत्यधिक कुपित हो उठीं. वे अत्यंत क्रोधित अवस्था में सीधे यज्ञ स्थल पर आ पहुंचीं. अपने स्थान पर किसी अन्य को बैठा देख उन्होंने भगवान ब्रह्मा को कठोर श्राप दे दिया कि पूरे भूमंडल पर किसी भी स्थान पर उनकी पूजा-अर्चना नहीं की जाएगी और न ही कहीं उनका कोई मंदिर स्थापित होगा. माता सावित्री के इस कठोर वचन से वहां मौजूद सभी देवी-देवताओं और तपस्वी ऋषियों में गहरा संकोच और भय व्याप्त हो गया.
देवताओं की गुहार पर शांत हुआ क्रोध
सृष्टि के संतुलन और ब्रह्मा जी के सम्मान की रक्षा के लिए सभी देवताओं और महर्षियों ने माता सावित्री से हाथ जोड़कर अनुनय-विनय किया. उन्होंने आग्रह किया कि इस कठोर श्राप के प्रभाव को सीमित किया जाए ताकि धर्म की मर्यादा बनी रहे. देवताओं की विनम्र प्रार्थना को स्वीकार करते हुए माता सावित्री ने अपने श्राप में रियायत दी. उन्होंने व्यवस्था दी कि पूरे संसार में कहीं भी ब्रह्मा जी की अर्चना नहीं होगी, लेकिन पुष्कर की पवित्र भूमि पर उनका मंदिर भी बन सकेगा और वहां उनकी नियमित उपासना भी की जा सकेगी.
इसी दिव्य छूट के कारण आज पुष्कर को विश्व भर में भगवान ब्रह्मा के आराध्य धाम के रूप में पूजा जाता है. इस घटना के पश्चात माता सावित्री पुष्कर की एक ऊंची पहाड़ी पर जाकर विराजमान हो गईं. वर्तमान समय में उसी पहाड़ी पर स्थित माता सावित्री का मंदिर भी लाखों श्रद्धालुओं की अगाध आस्था और दर्शन का प्रमुख केंद्र बना हुआ है.



















