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मेरठ के गगोल तीर्थ का रहस्य: जहां श्रीराम के बाण से बना कुंड और सैकड़ों स्वास्तिक शिवलिंग हैं मौजूदधर्म
23 जुल॰ 2026, 11:03 am (69 दिन पहले)· 0

मेरठ के गगोल तीर्थ का रहस्य: जहां श्रीराम के बाण से बना कुंड और सैकड़ों स्वास्तिक शिवलिंग हैं मौजूद

उत्तर प्रदेश के मेरठ से 25 किलोमीटर दूर स्थित गगोल तीर्थ अपने स्वास्तिक आकार वाले सैकड़ों शिवलिंगों के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध है। महर्षि विश्वामित्र की इस प्राचीन तपोस्थली में भगवान श्रीराम के बाण से निर्मित एक सरोवर भी मौजूद है, जहां विशेषकर सावन के महीने में भारी भीड़ उमड़ती है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला न केवल अपने समृद्ध इतिहास के लिए जाना जाता है, बल्कि यह एक प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र भी है। इसी कड़ी में शहर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर एक बेहद अद्भुत और चमत्कारी स्थान मौजूद है जिसे गगोल तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यह कोई सामान्य शिव मंदिर नहीं है। इस पवित्र परिसर के भीतर एक या दो नहीं, बल्कि सैकड़ों की तादाद में स्वास्तिक के आकार वाले शिवलिंग स्थापित हैं। इन खास शिवलिंगों के दर्शन और यहां की अनोखी ऊर्जा भक्तों को अपनी ओर खींच लाती है। पूरे राज्य में यह स्थान अपनी इसी दुर्लभ धार्मिक वास्तुकला के लिए पहचाना जाता है।

एक स्वप्न से हुई मोक्ष धाम की शुरुआत

इस भव्य परिसर के निर्माण के पीछे एक बेहद रोचक कहानी छिपी है। मंदिर के महंत शिवदास महाराज ने बताया कि एक रात उन्हें स्वप्न में एक विशेष मोक्ष धाम स्थापित करने का दैवीय संकेत मिला था। इस सपने ने उनके मन में कई सवाल खड़े कर दिए। इसके बाद उन्होंने इस ईश्वरीय निर्देश को मंदिर परिसर में ही रहने वाली साध्वी मधुदास के साथ साझा किया। दोनों ने मिलकर इस संकेत का अर्थ समझने के लिए विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और शास्त्रों का गहराई से अध्ययन करना शुरू किया। इसी शोध के दौरान उन्हें श्रीमद्भागवत कथा में स्वास्तिक आकार वाले शिवलिंग का स्पष्ट वर्णन मिला। शास्त्रों में दर्ज इस प्रमाण के आधार पर ही गगोल तीर्थ में इस अनूठे मोक्ष धाम की रूपरेखा तैयार की गई और फिर सैकड़ों शिवलिंगों की स्थापना का विशाल कार्य संपन्न हुआ।

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जलाभिषेक के लिए करनी होती है 21 परिक्रमाएं

गगोल तीर्थ में पूजा करने की विधि अन्य शिवालयों से काफी अलग और विशेष है। यहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को सीधे मुख्य शिवलिंग तक जाकर पूजा करने की अनुमति नहीं होती है। इस धाम के कड़े नियमों के अनुसार, सबसे पहले भक्तों को परिसर में मौजूद विभिन्न धार्मिक तत्वों की कुल 21 बार परिक्रमा करनी होती है। इस लंबी और भक्तिपूर्ण परिक्रमा को पूरा करने के बाद ही श्रद्धालु मुख्य शिवलिंग का पवित्र जलाभिषेक कर पाते हैं। यह अनूठी परंपरा इस स्थान को अन्य तीर्थों से बिल्कुल अलग बनाती है। विशेष रूप से सावन के पवित्र महीने में यहां का नजारा देखने लायक होता है। शिवभक्तों और कांवड़ियों की भारी भीड़ अपने आराध्य को जल चढ़ाने के लिए मीलों का सफर तय करके यहां पहुंचती है। ऐसी मान्यता है कि इतनी बड़ी संख्या में स्थापित शिवलिंगों के दर्शन मात्र से ही भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

महर्षि विश्वामित्र और त्रेता युग से जुड़ा इतिहास

इस पावन भूमि का महत्व केवल हाल ही में बने मोक्ष धाम तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें सीधे त्रेता युग तक जाती हैं। गगोल तीर्थ को प्राचीन काल में महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली माना जाता है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, इसी शांत और पवित्र स्थान पर महर्षि ने वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। सदियों से यह स्थान ऋषि-मुनियों की साधना का मुख्य केंद्र रहा है। इसके साथ ही, कई धार्मिक कथाओं में इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीराम और उनके अनुज लक्ष्मण अपनी यात्रा के दौरान इस पावन भूमि पर पधारे थे। उनके यहां आने की ऐतिहासिक कथाएं आज भी स्थानीय लोगों की आस्था का एक बड़ा आधार हैं।

श्रीराम के बाण से प्रकट हुआ रहस्यमयी सरोवर

गगोल तीर्थ के परिसर में स्थित एक अति प्राचीन सरोवर श्रद्धालुओं की अगाध श्रद्धा का एक और बड़ा कारण है। पीढ़ियों से यह मान्यता चली आ रही है कि जब भगवान श्रीराम यहां आए थे, तब उन्होंने अपने एक बाण से धरती को भेदकर इस विशाल जल स्रोत का निर्माण किया था। ईश्वरीय बाण के प्रहार से उत्पन्न होने के कारण यह सरोवर बेहद चमत्कारिक और पवित्र माना जाता है। दूर-दराज से आने वाले दर्शनार्थी इस कुंड के जल को नमन करते हैं और इसे आशीर्वाद के रूप में देखते हैं। इसी ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व को देखते हुए अब प्रदेश सरकार भी इस क्षेत्र के जीर्णोद्धार पर ध्यान दे रही है। शासन की तरफ से गगोल तीर्थ में लगातार विकास कार्य संचालित किए जा रहे हैं, ताकि इस प्राचीन तपोस्थली को राज्य के एक प्रमुख धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सके और यात्रियों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

सवाल-जवाब

गगोल तीर्थ मेरठ से कितनी दूर स्थित है?
यह स्थान मेरठ शहर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
गगोल तीर्थ की सबसे बड़ी धार्मिक विशेषता क्या है?
इस परिसर में एक-दो नहीं बल्कि सैकड़ों की संख्या में स्वास्तिक के आकार वाले शिवलिंग स्थापित हैं।
मंदिर में मुख्य शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का नियम क्या है?
श्रद्धालुओं को मुख्य शिवलिंग तक पहुंचने से पहले परिसर के विभिन्न तत्वों की 21 बार परिक्रमा करनी होती है।
गगोल तीर्थ परिसर में स्थित सरोवर का निर्माण कैसे हुआ था?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस प्राचीन सरोवर की उत्पत्ति भगवान श्रीराम द्वारा चलाए गए एक बाण से हुई थी।
इस भूमि का संबंध किस प्राचीन ऋषि से है?
इस पवित्र भूमि को प्राचीन काल में महर्षि विश्वामित्र की तपोस्थली माना जाता है।
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