दरभंगा समेत उत्तर बिहार के मिथिलांचल इलाके में मधुश्रावणी पर्व बेहद धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार नवविवाहित महिलाओं के लिए सबसे खास और महत्वपूर्ण उत्सव माना जाता है। इस दौरान व्रती महिलाओं को कई तरह के कड़े नियमों और कठिन तपस्या का पालन करना पड़ता है।
जमीन पर सोना और मायके के अन्न का त्याग
इस अनूठी परंपरा के तहत नवविवाहिताएं पूरे 10 दिनों तक पलंग या बिस्तर का इस्तेमाल नहीं करती हैं। वे इन दिनों में पूरी तरह से जमीन पर सोती हैं। इसके अलावा, भले ही यह पर्व लड़कियां अपने मायके में रहकर ही करती हैं, लेकिन इस दौरान वे अपने मायके के घर का एक दाना भी अन्न ग्रहण नहीं करती हैं।
ससुराल पक्ष से आती है सारी सामग्री
व्रत के इन 10 दिनों के दौरान नवविवाहिता के खानपान से लेकर पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली तमाम जरूरी सामग्री ससुराल पक्ष की तरफ से भेजी जाती है। यह इस पूरी परंपरा की एक बेहद अहम विशेषता है। दुल्हन जमीन पर विश्राम करती है और केवल ससुराल से आई हुई चीजों का ही उपयोग करती है।
तीन बार सिंदूर लगाने का विधान
मतौर पर यही माना जाता है कि विवाह के समय एक बार सिंदूर दान होने से पति-पत्नी का रिश्ता पूरा हो जाता है। हालांकि मिथिलांचल में एक या दो बार नहीं बल्कि कुल तीन बार सिंदूर लगाने की परंपरा है, जिसके बाद ही वैवाहिक जीवन को पूर्ण माना जाता है। पहली बार विवाह की रात को सिंदूर दान होता है, दूसरी बार चौथारी के दिन और तीसरी बार इस मधुश्रावणी व्रत के दौरान सिंदूर लगाया जाता है। इसके पूरा होने पर ही दांपत्य जीवन सफल और मंगलमय माना जाता है।



















