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मिथिलांचल में अनोखा मधुश्रावणी पर्व, 10 दिनों तक जमीन पर सोती हैं नवविवाहिताएंधर्म
26 अक्तू॰ 2026, 2:09 am (2 घंटे पहले)· 2

मिथिलांचल में अनोखा मधुश्रावणी पर्व, 10 दिनों तक जमीन पर सोती हैं नवविवाहिताएं

उत्तर बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में मधुश्रावणी पर्व का विशेष महत्व है। इस दौरान नवविवाहित महिलाएं 10 दिनों तक जमीन पर सोती हैं और ससुराल से भेजी गई सामग्री का ही सेवन करती हैं।

दरभंगा समेत उत्तर बिहार के मिथिलांचल इलाके में मधुश्रावणी पर्व बेहद धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह त्योहार नवविवाहित महिलाओं के लिए सबसे खास और महत्वपूर्ण उत्सव माना जाता है। इस दौरान व्रती महिलाओं को कई तरह के कड़े नियमों और कठिन तपस्या का पालन करना पड़ता है।

जमीन पर सोना और मायके के अन्न का त्याग

इस अनूठी परंपरा के तहत नवविवाहिताएं पूरे 10 दिनों तक पलंग या बिस्तर का इस्तेमाल नहीं करती हैं। वे इन दिनों में पूरी तरह से जमीन पर सोती हैं। इसके अलावा, भले ही यह पर्व लड़कियां अपने मायके में रहकर ही करती हैं, लेकिन इस दौरान वे अपने मायके के घर का एक दाना भी अन्न ग्रहण नहीं करती हैं।

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ससुराल पक्ष से आती है सारी सामग्री

व्रत के इन 10 दिनों के दौरान नवविवाहिता के खानपान से लेकर पूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली तमाम जरूरी सामग्री ससुराल पक्ष की तरफ से भेजी जाती है। यह इस पूरी परंपरा की एक बेहद अहम विशेषता है। दुल्हन जमीन पर विश्राम करती है और केवल ससुराल से आई हुई चीजों का ही उपयोग करती है।

तीन बार सिंदूर लगाने का विधान

मतौर पर यही माना जाता है कि विवाह के समय एक बार सिंदूर दान होने से पति-पत्नी का रिश्ता पूरा हो जाता है। हालांकि मिथिलांचल में एक या दो बार नहीं बल्कि कुल तीन बार सिंदूर लगाने की परंपरा है, जिसके बाद ही वैवाहिक जीवन को पूर्ण माना जाता है। पहली बार विवाह की रात को सिंदूर दान होता है, दूसरी बार चौथारी के दिन और तीसरी बार इस मधुश्रावणी व्रत के दौरान सिंदूर लगाया जाता है। इसके पूरा होने पर ही दांपत्य जीवन सफल और मंगलमय माना जाता है।

सवाल-जवाब

मधुश्रावणी पर्व मुख्य रूप से किस क्षेत्र में मनाया जाता है?
यह पर्व उत्तर बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र में मुख्य रूप से मनाया जाता है।
इस पर्व के दौरान नवविवाहिताएं कितने दिनों तक जमीन पर सोती हैं?
नवविवाहित महिलाएं इस पर्व के दौरान 10 दिनों तक जमीन पर सोती हैं।
क्या नवविवाहिताएं इस दौरान मायके का अन्न खाती हैं?
नहीं, वे मायके में रहकर भी वहां का अन्न ग्रहण नहीं करती हैं।
व्रत के दौरान खानपान की व्यवस्था कौन करता है?
इन 10 दिनों के लिए खाने-पीने और पूजा की तमाम व्यवस्था ससुराल पक्ष द्वारा की जाती है।
मिथिलांचल में कुल कितनी बार सिंदूर लगाने की परंपरा है?
यहां कुल तीन बार सिंदूर लगाने की परंपरा है, जो विवाह और व्रत के विभिन्न चरणों में पूरी होती है।
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टिप्पणियाँ 5

Priya Sharma@priya-sharma·23 मिनट पहले

मिथिलांचल की ये परंपराएं सच में अनोखी हैं। दस दिन ज़मीन पर सोना और ससुराल से आया खाना ही खाना, नए रिश्ते को समझने का कितना खूबसूरत तरीका है। संस्कृति की ऐसी जड़ें देखकर अच्छा लगा।

Arshdeep Ahluwalia@arshdeep-ahluwalia·43 मिनट पहले

मिथिलांचल की संस्कृति सचमुच निराली है, इतने कड़े नियमों के साथ परंपरा निभाना आसान नहीं होता।

Omar AL Mansoori@omar-mansoori·42 मिनट पहले

अर्शदीप भाई, बिलकुल सही कहा आपने! जब मैं कुछ साल पहले दरभंगा गया था, तो मैंने खुद वहां एक परिवार में इन कठिन नियमों को बहुत करीब से देखा था।

Ananya Iyer@ananya-iyer·1 घंटे पहले

मिथिलांचल की यह परंपरा सचमुच अनोखी है। क्या ससुराल से आने वाले इस सामान में सिर्फ राशन होता है या रोज का बना हुआ खाना भी आता है?

Li Wei@li-wei·1 घंटे पहले

अनान्या, जब मैं पिछले साल बिहार के एक गाँव में था, तब मैंने एक घर में ऐसा ही व्रत देखा था। सचमुच संस्कृति अनोखी है।

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