उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक शहर कन्नौज अपनी सदियों पुरानी इत्र निर्माण कला के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यहाँ तैयार किए जाने वाले प्राकृतिक इत्र केवल सजने-संवरने का साधन नहीं हैं, बल्कि हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-अर्चना में भी इनका अत्यंत पवित्र स्थान है। प्राकृतिक जड़ी-बूटियों और ताजे फूलों से तैयार किए जाने वाले ये पारंपरिक इत्र वातावरण को शुद्ध करते हैं और आध्यात्मिक अनुष्ठानों को पूर्णता प्रदान करते हैं।
विभिन्न देवी-देवताओं और प्रमुख त्योहारों के लिए इत्र का चयन
धार्मिक परंपराओं के अनुसार अलग-अलग देवी-देवताओं की उपासना में विशिष्ट सुगंध वाले इत्र अर्पित करने का नियम है। भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के समय चंदन से बना इत्र अर्पित किया जाता है। दूसरी ओर, श्री राधा और भगवान कृष्ण की भक्ति साधना में गुलाब के प्राकृतिक इत्र का उपयोग सर्वाधिक उत्तम माना गया है। इसके अलावा ग्रीष्मकालीन धार्मिक आयोजनों या शांति अनुष्ठानों में ख़स से तैयार इत्र का प्रयोग वातावरण में शीतलता घोलने के लिए किया जाता है।
रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, नवरात्रि और दीपावली जैसे बड़े हिंदू पर्वों पर पूजा की थाली में इत्र का होना अनिवार्य माना जाता है। इन विशेष अवसरों पर लोबान और प्राकृतिक धूप की खुशबू वाले इत्रों की माँग भी काफी अधिक बढ़ जाती है।
केमिकल वाले सेंट और प्राकृतिक इत्र में अंतर
बाजार में मिलने वाले सस्ते केमिकल युक्त सेंट और कन्नौज के पारंपरिक इत्र में बहुत बड़ा अंतर होता है। स्थानीय इत्र व्यापारी निशीष तिवारी के अनुसार, श्रद्धालु अब भगवान को अर्पित किए जाने वाले इत्र की शुद्धता को लेकर काफी जागरूक हो चुके हैं।
उन्होंने बताया कि छोटी दुकानों पर अक्सर कृत्रिम रसायनों से बने सेंट को इत्र बताकर बेच दिया जाता है, जो धार्मिक दृष्टिकोण से उपयुक्त नहीं होते। यद्यपि भाप-आसवन की पारंपरिक विधि से बने असली प्राकृतिक इत्र थोड़े महंगे होते हैं, परंतु धार्मिक अनुष्ठानों की पवित्रता बनाए रखने के लिए केवल शुद्ध अर्क का ही उपयोग किया जाना चाहिए।



















