राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित जावाल कस्बे के सांचीयाव माता मंदिर में इस साल का नवरात्रि उत्सव बेहद खास अंदाज में मनाया जा रहा है। यहां देवी की उपासना के लिए मिट्टी, प्लास्टर ऑफ पेरिस या धातु के स्थान पर शुद्ध रूप से घी का उपयोग करके विशाल प्रतिमाएं स्थापित करने की परंपरा निभाई जा रही है। इस अनूठी मूर्तिकला को देखने के लिए जावाल समेत आसपास के दर्जनों गांवों से भारी संख्या में श्रद्धालु मंदिर परिसर पहुंच रहे हैं। इस बार मंदिर प्रांगण में स्थापित मां लक्ष्मी का भव्य दरबार हर किसी को विस्मित कर रहा है, जहां कमल के पुष्प पर विराजी देवी और उनके अगल-बगल सूंड़ उठाए खड़े गजराज की अलौकिक छवि साकार की गई है।
गुजरात के आणंद से आए कारीगरों की सात दिन की साधना
इस अद्भुत दरबार को रूप देने का जिम्मा गुजरात के आणंद से पहुंचे कुशल मूर्तिकारों ने संभाला। कलाकारों की टोली ने नवरात्रि शुरू होने से एक सप्ताह पहले ही दिन-रात मेहनत करके ठीक सात दिनों में इस पूरे स्वरूप को अंतिम रूप दिया। इस निर्माण कार्य में कुल 251 किलोग्राम वनस्पति घी का उपयोग हुआ है। पूरी कलाकृति की ऊंचाई पांच फीट है, जिसमें मुख्य प्रतिमा के साथ-साथ कमल की विस्तृत पंखुड़ियां, देवी के बारीक गहने, मुकुट और दोनों तरफ खड़े ऐरावत स्वरूप हाथियों की नक्काशी बेहद संजीदगी से उकेरी गई है। सामान्य तौर पर पत्थर या मिट्टी में जो काम छेनी और सांचों से होता है, उसे यहां जमे हुए घी की परतों को तराशकर अंजाम दिया गया है।
घी को तराशने की विशेष तकनीक
पारंपरिक मूर्तिकला के मुकाबले घी से मूर्तियां गढ़ने का विज्ञान बिल्कुल अलग होता है। मूर्तिकारों ने सबसे पहले वनस्पति घी को निश्चित तापमान पर गर्म करके पूरी तरह पिघलाया। इसके बाद पिघले हुए घी को बर्फ के अत्यधिक ठंडे पानी के संपर्क में लाया गया ताकि वह तेजी से जमकर ठोस रूप ले सके। ठोस होने की प्रक्रिया के दौरान इसे महीन सूती कपड़े में बांधकर अतिरिक्त पानी और अशुद्धियों को छाना गया। जब घी एक खास घनत्व और लचीलेपन में आ गया, तब कलाकारों ने अपने हाथों और बारीक औजारों की मदद से मां लक्ष्मी के मुखमंडल, नयन, आभूषण और वस्त्रों की आकृतियां तैयार कीं। घी की चिकनाई के बीच इतनी सघन और सूक्ष्म नक्काशी उभारना शिल्प कौशल की कठिन परीक्षा मानी जाती है।
माइनस एक डिग्री तापमान में सुरक्षित रखने की चुनौती
प्रतिमा बनकर तैयार हो जाने के बाद सबसे कठिन चरण उसे पूरे नौ दिनों के उत्सव के दौरान सुरक्षित रखना होता है, क्योंकि थोड़ा भी तापमान बढ़ने पर घी पिघलने लगता है और आकृतियां अपनी बनावट खो सकती हैं। आयोजन समिति के सदस्य नारायण सुथार ने बताया कि प्रतिमा के चारों ओर का वातावरण लगभग माइनस एक डिग्री सेल्सियस बनाए रखने के लिए विशेष बंदोबस्त किए गए हैं। पंडाल के भीतर मुख्य मंच के चारों तरफ बर्फ की बड़ी-बड़ी सिल्लियां रखी गई हैं। इसके अलावा वहां लगाए गए कूलरों में लगातार बर्फ का पानी डाला जाता है ताकि ठंडी हवा का प्रवाह बना रहे। समिति के कार्यकर्ता चौबीसों घंटे बारी-बारी से सेवा दे रहे हैं और हर आधे घंटे में पांच फीट ऊंची इस प्रतिमा पर बर्फ के चिल्ड पानी का हल्का छिड़काव किया जाता है, जिससे प्रतिमा का आकार एकदम सुरक्षित बना रहे।
2003 में शुरू हुआ था यह अनोखा सिलसिला
जावाल में घी की मूर्तियां बनाने की इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 2003 में हुई थी। आयोजन समिति के सदस्यों को गुजरात के अहमदाबाद में बर्फ से बने शिवलिंग के दर्शन करने के बाद यह विचार सूझा था कि क्यों न देवी-देवताओं के विग्रह को घी जैसी पारंपरिक और पूज्य सामग्री से गढ़ा जाए। श्री चामुंडा गरबा मंडल और सांचीयाव माता मंदिर ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में पिछले 23 वर्षों से यह अनूठा आयोजन लगातार चल रहा है। इन 23 सालों में अब तक माता जगदम्बा, शिव शक्ति, नंदी, ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित 23 विभिन्न देव स्वरूपों की घी से बनी प्रतिमाएं स्थापित की जा चुकी हैं। इस वर्ष के पूरे आयोजन और आणंद के मूर्तिकारों की करीब 50 हजार रुपए की पारिश्रमिक राशि को मिलाकर लगभग 2 लाख रुपए का कुल खर्च आया है।























