शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान 19 अक्टूबर 2026 का दिन आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायी और दुर्लभ माना जा रहा है। इस विशेष सोमवार को आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी और नवमी तिथियों का एक साथ प्रभाव रहेगा। दिन की शुरुआत में मां महागौरी की आराधना के साथ महाअष्टमी का अनुष्ठान होगा, जबकि बाद में नवमी तिथि के आगमन पर मां सिद्धिदात्री की उपासना और कन्या पूजन किया जाएगा। इसके साथ ही सोमवार का दिन होने से भगवान शिव और चंद्रदेव की पूजा का दोहरा पुण्य भी भक्तों को प्राप्त होगा। पंचांग के समस्त ज्योतिषीय घटक इस दिन के आध्यात्मिक महत्व को कई गुना बढ़ा रहे हैं।
तिथि, नक्षत्र और ग्रहीय स्थिति का विस्तृत विवरण
पंचांग गणना के अनुसार, आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि प्रातःकाल 10 बजकर 51 मिनट तक प्रभावी रहेगी। इसके तुरंत बाद नवमी तिथि प्रारंभ हो जाएगी, जो अगले दिन 20 अक्टूबर को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट तक जारी रहेगी। नवमी समाप्त होते ही दशमी तिथि का आरंभ होगा। इस दिन नक्षत्र चक्र में उत्तराषाढ़ा नक्षत्र दोपहर 03 बजकर 38 मिनट तक रहेगा और उसके उपरांत श्रवण नक्षत्र का संचरण शुरू होगा। करण की बात करें तो बव करण प्रातः 10 बजकर 51 मिनट तक सक्रिय रहेगा, जिसके बाद बालव करण रात्रि 11 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस दौरान धृति योग का प्रभाव 20 अक्टूबर की मध्यरात्रि 12 बजकर 35 मिनट तक बना रहेगा। ग्रह गोचर में चंद्रमा मकर राशि में संचार करेंगे, जबकि ग्रहों के राजा सूर्य तुला राशि में विराजमान रहेंगे। यात्रा के संदर्भ में इस दिन पूर्व दिशा का दिशाशूल मान्य रहेगा।
मां महागौरी, मां सिद्धिदात्री की उपासना और कन्या पूजन
अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन पड़ने से शक्ति उपासना का महत्व अत्यधिक बढ़ गया है। सुबह 10 बजकर 51 मिनट से पहले मां महागौरी का पूजन संपन्न किया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं में माता महागौरी को परम शांति, अंतःकरण की पवित्रता, सुख, पारिवारिक समृद्धि और अखंड सौभाग्य की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। प्रातः 10 बजकर 51 मिनट के बाद नवमी तिथि शुरू होते ही देवी के नौवें स्वरूप मां सिद्धिदात्री का ध्यान और पूजन आरंभ होगा। मान्यता है कि मां सिद्धिदात्री की अनन्य भक्ति से साधकों को मानसिक एकाग्रता, असीम साहस, आत्मिक बल और सकारात्मक ऊर्जा की प्राप्ति होती है। इसी पावन अवधि में श्रद्धालु अपने घरों में कन्या पूजन का आयोजन करेंगे। सनातन परंपरा के अनुसार छोटी कन्याओं को साक्षात देवी का विग्रह मानकर उनके चरण धोए जाते हैं, उन्हें कुमकुम का तिलक लगाया जाता है, सात्विक भोजन कराया जाता है और सामर्थ्य अनुसार वस्त्र, दक्षिणा अथवा उपहार भेंट कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
सोमवार व्रत और भगवान शिव की पूजन विधि
सोमवार का दिन देवाधिदेव महादेव और चंद्रदेव को समर्पित होता है। नवरात्रि के इस विशेष दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और भगवान शिव का स्मरण करें। इसके पश्चात तांबे के पात्र से शिवलिंग पर शुद्ध जल अथवा गंगाजल अर्पित करें। पारंपरिक पूजन सामग्री के रूप में बिल्वपत्र, धतूरा, सफेद सुगंधित पुष्प और ताजे फल चढ़ाएं। धूप और दीप प्रज्वलित कर महामृत्युंजय मंत्र अथवा पंचाक्षरी मंत्र ॐ नमः शिवाय का शांत मन से जप करें। अंत में शिव चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ कर आरती उतारें। इस दिन शिव उपासना करने से जातक की कुंडली में स्थित चंद्र दोष शांत होता है और मानसिक तनाव दूर होकर चंद्रमा की स्थिति सुदृढ़ होती है। शिववास की स्थिति पर दृष्टि डालें तो प्रातः 10 बजकर 51 मिनट तक भगवान शिव श्मशान में रहेंगे और उसके बाद देवी गौरी के साथ वास करेंगे।
सूर्योदय, चंद्रोदय और दिन के शुभ मुहूर्त
सोमवार को सूर्योदय प्रातः 06 बजकर 29 मिनट पर होगा और सूर्यास्त शाम 05 बजकर 54 मिनट पर होगा। चंद्र दर्शन के लिए चंद्रोदय दोपहर 01 बजकर 39 मिनट पर होगा, जबकि चंद्रास्त देर रात 12 बजकर 45 मिनट अथवा 20 अक्टूबर की रात 12 बजकर 26 मिनट पर होगा। दिन भर में शुभ कार्यों के संपादन हेतु कई विशेष मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे। प्रातःकाल 04 बजकर 44 मिनट से 05 बजकर 34 मिनट तक ब्रह्म मुहूर्त साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ रहेगा। दिन का सबसे प्रमुख अभिजित मुहूर्त दोपहर 11 बजकर 44 मिनट से 12 बजकर 29 मिनट तक रहेगा। इसके अतिरिक्त दोपहर 02 बजकर 01 मिनट से 02 बजकर 46 मिनट तक विजय मुहूर्त तथा शाम 05 बजकर 49 मिनट से 06 बजकर 14 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त रहेगा। अमृत काल प्रातः 08 बजकर 29 मिनट से 10 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। रात्रि कालीन साधना के लिए निशिता मुहूर्त 11 बजकर 42 मिनट से 12 बजकर 32 मिनट तक मान्य होगा। दोपहर 03 बजकर 38 मिनट से लेकर 20 अक्टूबर की सुबह 06 बजकर 25 मिनट तक सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग एक साथ सक्रिय रहेंगे, जो किसी भी शुभ संकल्प को सिद्ध करने के लिए उत्तम हैं।
अशुभ काल और वर्जित समय की सावधानी
किसी भी मांगलिक कार्य, नवीन अनुबंध अथवा यात्रा के शुभारंभ से पूर्व अशुभ समय का ध्यान रखना आवश्यक है। 19 अक्टूबर को राहुकाल प्रातः 07 बजकर 50 मिनट से 09 बजकर 16 मिनट तक रहेगा, जिसमें शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं। यमगण्ड का समय सुबह 10 बजकर 41 मिनट से दोपहर 12 बजकर 07 मिनट तक रहेगा। गुलिक काल दोपहर 01 बजकर 32 मिनट से 02 बजकर 58 मिनट तक रहेगा। इसके अतिरिक्त सुबह 08 बजकर 58 मिनट से शाम 05 बजकर 25 मिनट तक आडल योग और शाम 05 बजकर 25 मिनट से 20 अक्टूबर सुबह 06 बजकर 25 मिनट तक विडाल योग रहेगा। दोपहर 12 बजकर 29 मिनट से 01 बजकर 15 मिनट तक दुर्मुहूर्त काल रहेगा, जबकि रात्रि 08 बजकर 02 मिनट से 09 बजकर 48 मिनट तक वर्ज्य काल की स्थिति रहेगी। इन विशिष्ट अवधियों में किसी भी प्रकार के नए अथवा महत्वपूर्ण मांगलिक कार्य को टालना श्रेयस्कर रहेगा।



















