हिंदू सनातन परंपरा में पितृपक्ष का समय बेहद खास माना जाता है। इस विशेष कालखंड में पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने से उनकी आत्मा को तृप्ति मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन दिनों में पितरों का स्मरण करने से उनका सीधा आशीर्वाद परिवार को मिलता है। यही कारण है कि हर साल इस अवधि में लोग अपने पूर्वजों की शांति के लिए अनुष्ठान करते हैं। पंचांग के हिसाब से पितृपक्ष की शुरुआत हर साल भाद्रमास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि से होती है और इस बार यह अवधि 6 सितंबर से आरंभ हो रही है।
गयाजी यात्रा संभव न होने पर घर पर करें अनुष्ठान
बिहार के गयाजी में पितृपक्ष के दौरान भव्य मेला सजता है, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु अपने पूर्वजों का पिंडदान करने पहुंचते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि विष्णुई क्षेत्र गयाजी में पिंडदान संपन्न होने से पूर्वजों को मोक्ष की प्राप्ति होती है। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश यात्रा करने में असमर्थ है और गयाजी नहीं पहुंच पाता है, तो वह अपने निवास स्थान पर ही पूरी श्रद्धा और विधि के साथ श्राद्ध एवं तर्पण की प्रक्रिया को पूरा कर सकता है। इस संपूर्ण विधि-विधान को सुचारू रूप से चलाने के लिए कुछ खास पूजन सामग्री की जरूरत पड़ती है।
श्राद्ध और तर्पण के लिए जरूरी पूजन सामग्री
गया विष्णुपद क्षेत्र की मंत्रालय वैदिक पाठशाला के आचार्य पंडित राजा के बताए अनुसार घर पर तर्पण अनुष्ठान संपन्न करने के लिए काले तिल, शुद्ध जल या गंगाजल, कुशा घास, चावल, जौ, सफेद रंग के फूल, जनेऊ, रोली, कपूर, गाय का कच्चा दूध, शहद, माचिस और रुई की बत्ती जैसी वस्तुओं का संग्रह करना आवश्यक होता है। इन सभी सामग्रियों का उपयोग पूर्वजों को प्रसन्न करने और उनकी दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए विशेष रूप से किया जाता है.
घर पर अनुष्ठान करने की पूरी प्रक्रिया
यदि आप किसी वजह से गयाजी की यात्रा नहीं कर पा रहे हैं, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप घर पर ही तर्पण और पिंडदान करके अपने पितरों को तृप्त कर सकते हैं। इसके लिए तिलों, जल और जौ की मदद से पिंड तैयार करके घर के किसी पावन और स्वच्छ कोने में अथवा किसी पवित्र नदी के तट पर उनका अर्पण करना चाहिए। इसके अलावा ब्राह्मणों को भोजन कराना और पूर्वजों के निमित्त दान देना भी इस दौरान बेहद फलदायी माना जाता है। यूं तो गयाजी में पिंडदान करने का खास धार्मिक महत्व है, लेकिन घर पर भी नियमों के अनुसार किए गए अनुष्ठान उतने ही फलदायी और प्रभावी साबित होते हैं।
मत्स्य पुराण के अनुसार अपनाएं सही विधान
घर पर भी श्राद्ध कर्म पूरी पवित्रता और अनुशासन के साथ पूरा करना चाहिए। प्राचीन मत्स्य पुराण के मुताबिक श्राद्ध की निर्धारित तिथि के दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और साफ-सुथरे सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके पश्चात दक्षिण दिशा की तरफ मुख करके जल अर्पित करना चाहिए। फिर पूरब दिशा की ओर मुड़कर अपने पितरों का मानसिक रूप से आह्वान करना चाहिए। अपने हाथ में कुछ मात्रा में तिल और कुशा लेकर यह संकल्प लें कि आप अमुक तिथि पर अपने खास पूर्वज के निमित्त यह श्राद्ध कर्म कर रहे हैं। इसके बाद उस जल को धरती पर छोड़ देना चाहिए।

















