सनातन परंपरा में भाई-बहन के असीम प्रेम और सुरक्षा के प्रतीक रक्षाबंधन का पावन पर्व वर्ष 2026 में 28 अगस्त को पूरे श्रद्धा भाव के साथ मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल उपहारों और औपचारिकता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका संबंध प्राचीन काल से चले आ रहे उच्च आदर्शों, वचनों और रक्षा के अटूट संकल्प से है। हिंदू धर्मशास्त्रों और विभिन्न पुराणों में कई ऐसी कथाएं मिलती हैं, जो यह दर्शाती हैं कि रक्षासूत्र बाँधने की यह परंपरा कितनी प्रामाणिक और प्रभावशाली रही है। इन पौराणिक प्रसंगों से यह भी स्पष्ट होता है कि संकट की घड़ी में रक्षाबंधन का धागा न केवल पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करता है, बल्कि हर प्रकार के भय और विपत्ति से सुरक्षा भी प्रदान करता है।
माता लक्ष्मी और दानवीर राजा बलि का पावन प्रसंग
रक्षाबंधन की सबसे प्रसिद्ध और प्रचलित कथाओं में से एक का संबंध धन की देवी माता लक्ष्मी और असुरराज राजा बलि से है। पौराणिक वृत्तांत के अनुसार, भगवान विष्णु ने राजा बलि के अत्यधिक अहंकार को समाप्त करने के लिए वामन अवतार धारण किया था। वामन रूप में भगवान ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। दानवीर बलि के हां कहते ही भगवान विष्णु ने दो ही पगों में समस्त तीनों लोकों को नाप लिया और तीसरा पग रखने के लिए जब कोई स्थान नहीं बचा, तो राजा बलि ने अपना मस्तक आगे कर दिया। बलि की इस अनुपम दानशीलता और भक्ति से प्रसन्न होकर श्री हरि ने उन्हें सुतल लोक (पाताल लोक) का एकाधिकार सौंप दिया। इसके साथ ही, राजा बलि के विशेष आग्रह पर भगवान विष्णु स्वयं उनके महल के द्वारपाल बनकर पाताल लोक में निवास करने लगे।
बैकुंठ धाम छोड़कर भगवान विष्णु के पाताल लोक चले जाने से माता लक्ष्मी अत्यंत चिंतित और दुखी हो गईं। अपने स्वामी को वापस लाने के लिए माता लक्ष्मी ने एक चतुराई भरी योजना बनाई। वे एक निर्धन स्त्री का रूप धारण करके पाताल लोक पहुंचीं और राजा बलि को अपना भाई मानते हुए उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांध दिया। इस स्नेहपूर्ण आचरण से अभिभूत होकर राजा बलि ने उनसे मनचाहा उपहार मांगने को कहा। उसी समय माता लक्ष्मी अपने वास्तविक स्वरूप में आ गईं और उपहार के रूप में भगवान विष्णु को पाताल लोक के बंधन से मुक्त मांग लिया। अपने दिए गए वचन से बंधे होने के कारण राजा बलि ने श्री हरि को माता लक्ष्मी के साथ बैकुंठ लौटने की सहर्ष अनुमति दे दी। माना जाता है कि इसी पावन घटना के स्मरण में रक्षाबंधन का पर्व मनाने की परंपरा आरंभ हुई।
देवराज इंद्र और शूचि का अलौकिक रक्षासूत्र प्रसंग
भविष्य पुराण में दर्ज एक अन्य महत्वपूर्ण कथा के अनुसार, रक्षासूत्र का महत्व केवल भाई और बहन के संबंध तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी भी धर्मपरायण व्यक्ति की रक्षा का अचूक साधन है। प्राचीन काल में देवताओं और दैत्यों के मध्य एक अत्यंत भीषण और लंबा युद्ध छिड़ गया था। इस भयंकर संग्राम में असुरों के सम्राट वृत्रासुर ने देवराज इंद्र की सेना को पराजित कर दिया और स्वर्ग पर अपना अधिकार जमाने लगा। देवताओं को पराजय के संकट में घिरा देखकर देवराज इंद्र की पत्नी इंद्राणी, जिन्हें देवी शूचि भी कहा जाता है, अत्यंत व्याकुल हो गईं।
अपने पति और समस्त देवगणों की रक्षा हेतु देवी शूचि ने भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। उनकी निष्ठा और भक्ति से प्रसन्न होकर श्री हरि ने उन्हें एक सिद्ध और चमत्कारिक रक्षासूत्र प्रदान किया। देवी शूचि ने मंत्रोच्चार के साथ वह रक्षासूत्र देवराज इंद्र और अन्य सभी देवताओं की कलाई पर बांध दिया। इस अलौकिक रक्षा कवच के प्रभाव से देवताओं की शक्ति पुनर्जागृत हुई और उन्होंने युद्ध क्षेत्र में असुरों को पराजित कर स्वर्ग पर पुनः अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। यह पौराणिक कथा यह संदेश देती है कि जब भी मनुष्य पर कोई भारी संकट आता है, तो सच्चे मन से बांधा गया रक्षासूत्र हर प्रकार की बाधा से मुक्ति दिलाता है।
श्री कृष्ण और द्रौपदी का पवित्र और अटूट संबंध
महाभारत काल से जुड़ा एक और अत्यंत भावुक प्रसंग भगवान श्री कृष्ण और द्रौपदी के मध्य के पावन रिश्ते को उजागर करता है। कथा के अनुसार, जब भगवान श्री कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग करके अत्याचारी शिशुपाल का वध किया था, तब चक्र के वापस लौटते समय उनकी उंगली में गहरी चोट लग गई और तेज रक्तस्त्राव होने लगा। सभा में उपस्थित सभी लोग प्राथमिक उपचार के लिए व्याकुल हो गए, किंतु उसी क्षण पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने बिना किसी संकोच के अपनी महंगी साड़ी का पल्लू फाड़कर श्री कृष्ण की उंगली पर कसकर बांध दिया ताकि खून बहना बंद हो जाए।
द्रौपदी के इस निःस्वार्थ सेवा भाव और आत्मीयता से द्वारकाधीश श्री कृष्ण अत्यधिक द्रवित हुए। उन्होंने द्रौपदी को बहन स्वीकार करते हुए यह वचन दिया कि वे जीवन के हर कठिन मोड़ पर उनकी रक्षा करेंगे और इस वस्त्र के एक-एक धागे का ऋण चुकाएंगे। कालक्रम में जब कौरवों की भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया गया और पांडव भी असहाय हो गए, तब संकट की उस घड़ी में द्रौपदी ने श्री कृष्ण को पुकारा। अपने दिए वचन का पालन करते हुए श्री कृष्ण ने अदृश्य रूप से प्रकट होकर द्रौपदी के वस्त्र को अनंत बढ़ा दिया और उनकी लाज बचाई। यह घटना दर्शाती है कि रक्षा सूत्र का एक छोटा सा टुकड़ा भी कर्तव्य और सुरक्षा के बहुत बड़े संकल्प का प्रतीक होता है।
यमराज और यमुना की भेंट तथा भयमुक्ति का वरदान
रक्षाबंधन से जुड़ी एक और पौराणिक मान्यता सूर्यपुत्र यमराज और उनकी बहन यमुना जी के स्नेहपूर्ण मिलन पर आधारित है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, अत्यधिक व्यस्तता के कारण मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना लंबे समय तक एक-दूसरे से भेंट नहीं कर पाए थे। यमुना जी अपने भाई से मिलने के लिए अत्यंत उत्सुक थीं, इसलिए उन्होंने यमराज को अपने घर भोजन के लिए आमंत्रित किया। बहन के बार-बार आग्रह करने पर यमराज जी उनके गृह पधारे।
यमुना जी ने अपने भाई यमराज का अत्यंत भव्य और आदरपूर्वक स्वागत किया। उन्होंने यमराज को स्वादिष्ट भोजन कराया, उनके मस्तक पर मंगल तिलक लगाया और उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधकर उनकी दीर्घायु की कामना की। अपनी बहन के इस अप्रतिम सत्कार और प्रेम से प्रसन्न होकर यमराज ने यमुना जी से कोई भी वरदान मांगने को कहा। तब यमुना जी ने वर मांगा कि आप प्रतिवर्ष इस तिथि पर मेरे घर पधारेंगे और जो भी बहन इस पावन दिन अपने भाई का तिलक करके उसकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधेगी, उसे यमराज और अकाल मृत्यु के भय से सर्वदा मुक्ति प्राप्त होगी। यमराज ने प्रसन्नतापूर्वक यह वरदान स्वीकार किया। यद्यपि यह कथा मुख्य रूप से भाईदूज से जुड़ी मानी जाती है, परंतु रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भी इस कथा का स्मरण अत्यंत शुभ और फलदायी माना गया है।



















