हिमाचल प्रदेश विधान सभा के मानसून सत्र के छठे दिन नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा का मुद्दा गूंजा। सदन में प्रश्नकाल के तुरंत बाद मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने नेपाल बाढ़ में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति गहरा शोक प्रकट किया और प्रभावित परिवारों के प्रति संवेदना जताई। मुख्यमंत्री के आग्रह पर पूरे सदन ने दो मिनट का मौन रखकर मृतकों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। इस दौरान आपदा के संदर्भ में केंद्र सरकार से प्राप्त जानकारियों को भी साझा किया गया। राज्य सरकार आपदा प्रबंधन को लेकर लगातार अलर्ट मोड पर बनी हुई है और सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ा दी गई है।
नेपाल बाढ़ में 133 भारतीय लापता, हिमाचल के नागरिकों की जानकारी जुटाई जा रही
विधानसभा परिसर में भोजनावकाश के दौरान पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने बताया कि केंद्र सरकार से मिली सूचना के अनुसार नेपाल की भीषण तबाही में अब तक 133 भारतीय नागरिकों के लापता होने की पुष्टि हुई है। हालांकि, इन लापता भारतीयों में हिमाचल प्रदेश के कितने नागरिक शामिल हैं, इस संबंध में फिलहाल केंद्रीय एजेंसियों की ओर से कोई स्पष्ट आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब किसी बड़ी प्राकृतिक आपदा में इतने बड़े पैमाने पर जनहानि होती है, तो यह बेहद आघात पहुंचाने वाला होता है। राज्य सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और नागरिकों की सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर भी जारी किए गए हैं ताकि किसी भी हिमाचली नागरिक के संबंध में तुरंत जानकारी जुटाई जा सके।
लाहौल घाटी में मंडराया जल प्रलय का खतरा: 1990 के बाद 5 गुना बढ़ीं ग्लेशियल झीलें
हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे के बीच लाहौल-स्पीति जिले से एक चिंताजनक वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है। आईआईटी रोपड़ और यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों का आकार और संख्या चिंताजनक दर से बढ़ रही है। वर्ष 1990 में प्रदेश में ग्लेशियल झीलों की संख्या महज 107 थी, जो वर्ष 2024 तक बढ़कर 669 तक पहुंच गई है। यानी बीते 34 वर्षों में इन झीलों की संख्या में पांच गुना से भी अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके साथ ही इन झीलों का कुल सतह क्षेत्रफल 5.54 वर्ग किलोमीटर से 102 प्रतिशत बढ़कर 11.20 वर्ग किलोमीटर हो गया है।
सिस्सु की घेपन झील सबसे बड़ा खतरा, अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने की तैयारी
वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश की 669 झीलों में से 9 ग्लेशियल झीलों को 'अत्यधिक खतरे' वाली श्रेणी में रखा गया है। इसके अलावा 18 झीलों को 'उच्च खतरे' तथा 26 झीलों को 'मध्यम खतरे' की श्रेणी में वर्गीकृत किया गया है। लाहौल घाटी के सिस्सु क्षेत्र में स्थित घेपन झील को सबसे बड़ा खतरा माना जा रहा है। पिछले 33 वर्षों के दौरान घेपन झील का दायरा 173 फीसदी तक बढ़ चुका है। यदि भारी बारिश या बादल फटने की स्थिति में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) की घटना होती है, तो निचले इलाकों में नेपाल जैसी तबाही मच सकती है। इस गंभीर खतरे को देखते हुए प्रशासन द्वारा घेपन झील के समीप अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की योजना पर काम चल रहा है ताकि समय रहते स्थानीय आबादी को सुरक्षित निकाला जा सके।
जलवायु परिवर्तन और बादल फटने की घटनाओं पर मुख्यमंत्री का बयान
हिमाचल प्रदेश में बार-बार आ रही प्राकृतिक आपदाओं के कारणों पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री सुक्खू ने जलवायु परिवर्तन को इसका सबसे बड़ा कारण बताया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2023-24 में आई भीषण आपदाओं के बाद राज्य सरकार ने केंद्र सरकार से हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के विस्तृत अध्ययन का अनुरोध किया था। मुख्यमंत्री ने केंद्रीय गृह मंत्री से मुलाकात कर आईआईटी, पर्यावरण विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों की एक संयुक्त टीम से पूरे हिमालयी क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग रखी थी। इसके बाद वैज्ञानिकों का एक दल अध्ययन के लिए हिमाचल आया भी था, हालांकि उस अध्ययन की अंतिम रिपोर्ट के निष्कर्षों की जानकारी अभी राज्य सरकार को प्राप्त नहीं हुई है। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि पहाड़ों में भूस्खलन एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन बादल फटने की बढ़ती घटनाएं सीधे तौर पर मौसम के तेजी से बदलते मिजाज से जुड़ी हैं।
1500 करोड़ की केंद्रीय राहत राशि का इंतजार और नीतिगत फैसले
पत्रकारों से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने पिछले वर्ष केंद्र सरकार द्वारा घोषित 1500 करोड़ रुपये की राहत राशि के संबंध में भी स्थिति स्पष्ट की। मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री द्वारा घोषित राहत पैकेज का हिमाचल प्रदेश सरकार अभी भी इंतजार कर रही है। यह मामला दिल्ली में प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अटका हुआ है और राज्य कोष में अब तक कोई राशि प्राप्त नहीं हुई है। इसके अलावा, मानसून सत्र के दौरान विपक्ष द्वारा उठाए गए लॉटरी प्रणाली और टोल वसूली से जुड़े सवालों का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि लॉटरी पूरी तरह से भाग्य पर आधारित खेल है और इसे जुए के समान नहीं माना जाना चाहिए। सरकार आपदा प्रबंधन, सड़कों की मरम्मत और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए सभी आवश्यक वित्तीय एवं प्रशासनिक कदम उठा रही है।


















