आवास ऋण लेने वाले ग्राहकों के लिए सस्ते कर्ज की सुविधा अब धीरे-धीरे सिमटती नजर आ रही है. करीब साढ़े तीन साल के लंबे अंतराल के बाद 7 अक्टूबर को जब केंद्रीय बैंक ने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी की घोषणा की थी, तब इसे एक सीमित कदम माना जा रहा था. हालांकि वित्तीय शोध संस्था एसबीआई कैपिटल मार्केट्स के ताजा विश्लेषण के अनुसार यह कदम केंद्रीय बैंक की तरफ से शुरू किए गए एक लंबे सख्त मौद्रिक चक्र का शुरुआती चरण साबित हो सकता है. इस रुख के चलते आने वाले दिनों में उधारी की लागत में और इजाफा देखने को मिल सकता है.
अगले वित्त वर्ष तक दरों में बढ़ोतरी का सिलसिला जारी रहने के आसार
विश्लेषण के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक आगामी तिमाहियों के दौरान अपनी प्रमुख नीतिगत दर यानी रेपो रेट में 0.75 प्रतिशत से लेकर 1 प्रतिशत तक की अतिरिक्त वृद्धि कर सकता है. दरों में यह इजाफा अगले वित्त वर्ष तक खिंचने का अनुमान व्यक्त किया गया है. यदि नीतिगत दरों में यह अनुमानित बढ़ोतरी पूरी तरह लागू होती है, तो वर्तमान में 8 प्रतिशत की दर पर मिल रहे होम लोन की ब्याज दरें बढ़कर 9 प्रतिशत के स्तर को छू सकती हैं. इसका सीधा असर मौजूदा और नए दोनों तरह के कर्जदारों की मासिक किस्तों पर पड़ेगा.
महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सख्त रुख
नीतिगत दरों को बढ़ाने के पीछे मुख्य वजह खुदरा मुद्रास्फीति के बढ़ते दबाव को बताया गया है. बाजार में कीमतों पर नियंत्रण बनाए रखने के उद्देश्य से मौद्रिक नीति समिति को ब्याज दरों में सख्ती का रास्ता चुनना पड़ रहा है. समिति ने अपनी पिछली बैठक में रेपो रेट में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि करने के साथ ही अपनी नीतिगत दिशा को भी कड़ा कर लिया है. अनुमान यह भी लगाया जा रहा है कि मुद्रास्फीति के लगातार बने रहने वाले दबाव के चलते वित्त वर्ष 2028 की शुरुआत में भी नीतिगत दरों में दोबारा बढ़ोतरी की जा सकती है.

















