सावन के पवित्र महीने की शुरुआत होते ही मुरादाबाद का वातावरण पूरी तरह शिवभक्ति में लीन हो जाता है। इस दौरान शहर के प्रमुख धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और चारों तरफ हर-हर महादेव का उद्घोष गूंजने लगता है। मुरादाबाद में यूं तो कई धार्मिक स्थल मौजूद हैं, लेकिन यहां के 5 विशेष मंदिर ऐसे हैं जिनकी मान्यता दूर-दूर तक फैली हुई है। इनमें कैलाश मानसरोवर शिव मंदिर, श्री महाकालेश्वर धाम, कामेश्वरनाथ बाबा 84 घंटा मंदिर, प्राचीन श्री काली माता मंदिर और झारखंडी महादेव मंदिर शामिल हैं। इन मंदिरों का अपना एक विशिष्ट इतिहास, धार्मिक महत्व और अलौकिक परंपराएं हैं। श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार, महाशिवरात्रि तथा अन्य प्रमुख पर्वों पर इन आस्था केंद्रों में हजारों की संख्या में भक्त जलाभिषेक, रुद्राभिषेक और पूजा-अर्चना के लिए एकत्र होते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव और मां भगवती की आराधना करके अपने परिवार की सुख, समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं।
कैलाश मानसरोवर शिव मंदिर: दिल्ली रोड पर बसा शांत और सुंदर धाम
मुरादाबाद शहर में दिल्ली रोड पर स्थित मानसरोवर कॉलोनी का कैलाश मानसरोवर शिव मंदिर श्रद्धालुओं के लिए असीम शांति और भक्ति का केंद्र माना जाता है। यदि आप शहर के भीतर किसी ऐसे स्थान की खोज में हैं जहां प्राकृतिक स्वच्छता और आध्यात्मिक ऊर्जा एक साथ महसूस हो, तो यह मंदिर एक बेहतरीन विकल्प है। यह पवित्र स्थल देवाधिदेव महादेव, माता पार्वती, विघ्नहर्ता भगवान गणेश और नंदी महाराज को समर्पित है। इस मंदिर के नामकरण के पीछे एक विशेष मान्यता जुड़ी हुई है। माना जाता है कि मंदिर का नाम भगवान शिव के परम निवास स्थान कैलाश पर्वत और अति पवित्र मानसरोवर झील से प्रेरित होकर रखा गया है।
पिछले कई वर्षों से यह मंदिर क्षेत्रवासियों और दूर-दराज से आने वाले भक्तों की अटूट आस्था का मुख्य केंद्र बना हुआ है। सामान्य दिनों में भी यहां प्रतिदिन सुबह से ही भक्तों का आगमन शुरू हो जाता है जो भगवान शिव का जलाभिषेक करके अपने दिन की शुरुआत करते हैं। श्रावण मास के पूरे महीने के दौरान यहां का माहौल देखने लायक होता है। सावन के सभी सोमवार, महाशिवरात्रि और विभिन्न धार्मिक अवसरों पर मंदिर समिति और स्थानीय श्रद्धालुओं द्वारा विशेष पूजा-याचिका, भव्य रुद्राभिषेक, मनमोहक भजन-कीर्तन तथा विशाल भंडारों का आयोजन किया जाता है।
दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालु यहां पहुंचकर शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं और अपने घर-परिवार में खुशहाली, उत्तम स्वास्थ्य तथा हर मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद मांगते हैं। स्थानीय लोगों का पक्का विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे और स्वच्छ मन से यहां आकर भोलेनाथ के सामने अपनी प्रार्थना रखता है, उसकी पुकार अवश्य सुनी जाती है। मंदिर का हरा-भरा वातावरण, अत्यंत स्वच्छ परिसर और वहां की सकारात्मक ऊर्जा आने वाले हर व्यक्ति को मंत्रमुग्ध कर देती है। विशेष रूप से प्रातःकाल और संध्या समय होने वाली भव्य आरती का दृश्य इतना आकर्षक होता है कि श्रद्धालु उसमें लीन हो जाते हैं। यही वजह है कि यह मंदिर न केवल मुरादाबाद बल्कि आसपास के अन्य जिलों के लोगों के लिए भी आस्था का एक प्रमुख केंद्र बन चुका है।
श्री महाकालेश्वर धाम: उज्जैन की दिव्य ज्योति से जुड़ा पावन स्थल
मुरादाबाद में दिल्ली रोड स्थित नया सिविल लाइंस क्षेत्र में बना श्री महाकालेश्वर धाम भगवान शिव के उपासकों के लिए एक अत्यंत पवित्र और फलदायी स्थान माना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां स्थापित प्राचीन ज्योतिर्लिंग है। स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर में विराजमान ज्योतिर्लिंग का संबंध मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की दिव्य ज्योति से है। इसी कारण मुरादाबाद और आसपास के क्षेत्रों के भक्त इसे अत्यंत पूजनीय मानते हैं और यहां महाकाल के दर्शन कर पुण्य प्राप्त करते हैं।
मंदिर प्रांगण में एक खास कल्पवृक्ष भी मौजूद है जो श्रद्धालुओं के आकर्षण का मुख्य केंद्र है। इसके अतिरिक्त मंदिर परिसर में एक प्राचीन बांबी स्थित है, जिसके विषय में माना जाता है कि वहां देवी-देवताओं का अदृश्य निवास है। इस बांबी की उपस्थिति मंदिर के आध्यात्मिक वातावरण को और अधिक रहस्यमयी तथा प्रभावशाली बनाती है। हर रोज तड़के से ही यहां बड़ी संख्या में लोग जल चढ़ाने, दूध से अभिषेक करने और विशेष रुद्राभिषेक संपन्न कराने के लिए एकत्र होते हैं।
सावन के पवित्र महीने, महाशिवरात्रि के पावन पर्व और श्रावण मास के प्रत्येक सोमवार को यहां विशाल धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इन विशेष मौकों पर दूर-दराज के इलाकों से हजारों श्रद्धालु भगवान महाकाल के दर्शन के लिए लाइन में खड़े नजर आते हैं। ऐसी जनश्रुति है कि जो व्यक्ति निश्छल भाव से भगवान महाकालेश्वर की सेवा करता है, उसके जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और उसे सुख, शांति तथा समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अपनी अपार आध्यात्मिक ऊर्जा और शांत वातावरण की वजह से यह धाम शहर के शीर्ष शिव मंदिरों में अपनी एक अलग पहचान रखता है।
कामेश्वरनाथ बाबा 84 घंटा मंदिर: 250 वर्ष पुरानी अद्भुत परंपरा
मुरादाबाद के ऐतिहासिक किसरौल मोहल्ले में स्थित कामेश्वरनाथ बाबा 84 घंटा मंदिर शहर के सबसे प्राचीन और चमत्कारिक शिव स्थलों में गिना जाता है। उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, इस पावन मंदिर का इतिहास लगभग ढाई सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। इस मंदिर का नाम 84 घंटा मंदिर पड़ने के पीछे एक बेहद रोचक और अनोखी परंपरा जुड़ी हुई है। यहां मंदिर परिसर में एक साथ 84 घंटों को लटकाने का रिवाज रहा है, जो आज भी इस स्थल की सबसे प्रमुख पहचान बना हुआ है।
इस मंदिर से संबंधित सबसे प्रचलित मान्यता यह है कि जो भी भक्त अपनी कोई विशेष मनोकामना लेकर यहां आता है और भगवान शिव से मन्नत मांगता है, उसकी इच्छा पूरी होने पर वह मंदिर में घंटा अर्पित करता है। इस परंपरा से जुड़ी कई ऐतिहासिक कहानियां भी क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध हैं। कहा जाता है कि प्राचीन समय में नेपाल नरेश की कोई संतान नहीं थी। जब उन्होंने यहां आकर सच्चे मन से संतान प्राप्ति की मन्नत मांगी और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो उन्होंने अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मंदिर में एक विशाल घंटा भेंट किया था। वह ऐतिहासिक घंटा आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष कौतूहल और श्रद्धा का विषय बना हुआ है।
इसके अलावा एक अन्य ऐतिहासिक घटना के अनुसार, काशी नरेश ने भी अपनी एक विशेष मनोकामना पूर्ण होने के बाद यहां सवा तीन मन का एक बेहद भारी और कलात्मक घंटा चढ़ाया था। ये दोनों घटनाएं इस मंदिर के दिव्य प्रभाव को प्रमाणित करती हैं। सावन के पूरे महीने, विशेषकर श्रावण सोमवार और महाशिवरात्रि के दिन यहां भारी जनसैलाब देखने को मिलता है। दूर-दूर से आए हजारों श्रद्धालु कतारबद्ध होकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं और बाबा कामेश्वरनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
प्राचीन श्री काली माता मंदिर: लालबाग की 400 से 500 वर्ष पुरानी सिद्धपीठ
मुरादाबाद के लालबाग इलाके में स्थापित प्राचीन श्री काली माता मंदिर शहर के सबसे प्रमुख और प्राचीन शक्ति पीठों में से एक के रूप में जाना जाता है। इस मंदिर का इतिहास लगभग 400 से 500 वर्ष पुराना बताया जाता है। स्थानीय प्राचीन कथाओं के अनुसार, शताब्दियों पहले इस स्थान पर कोई बस्ती नहीं थी, बल्कि चारों तरफ घना जंगल और एक बड़ा ऊंचा टीला हुआ करता था। इस निर्जन और शांत स्थान पर सिद्ध संत मिश्री गिरि महाराज ने वर्षों तक कठोर तपस्या और साधना की थी। उनकी तपस्या के प्रभाव से ही बाद में यह स्थान मां काली की आराधना का एक परम सिद्ध केंद्र बनकर उभरा।
समय बीतने के साथ स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं ने यहां भव्य मंदिर का निर्माण कराया। आज यह सिद्धपीठ केवल मुरादाबाद शहर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पास के रामपुर, अमरोहा, संभल, बिजनौर और कई अन्य पड़ोसी जिलों से भी लाखों श्रद्धालु मां काली का आशीर्वाद लेने यहां आते हैं। सावन के पवित्र महीने के अलावा शारदीय व चैत्र नवरात्र, काली पूजा, दुर्गाष्टमी, अमावस्या और अन्य हिंदू त्योहारों पर यहां भक्तों का तांता लगा रहता है।
मां काली के इस दरबार में आने वाले भक्तों की अटूट आस्था है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे दिल से मां के चरणों में अपनी फरियाद रखता है, माता उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं और उसके जीवन में आने वाले सभी दुखों व कष्टों का निवारण करती हैं। सावन के दौरान शिव पूजा के साथ-साथ शक्ति की उपासना के लिए भी इस मंदिर में श्रद्धालुओं की अभूतपूर्व भीड़ जुटती है।
प्राचीन झारखंडी महादेव मंदिर: झाड़ियों से प्रकट हुआ स्वयंभू शिवलिंग
मुरादाबाद के नागफनी क्षेत्र में स्थित प्राचीन झारखंडी महादेव मंदिर भगवान शिव का एक और अत्यंत प्राचीन और पावन धाम है। स्थानीय किंवदंतियों और बुजुर्गों के अनुसार इस मंदिर का इतिहास लगभग 500 वर्ष पुराना माना जाता है। इस मंदिर की उत्पत्ति की कहानी भी बेहद आस्थाजनक है। प्राचीन काल में इस पूरे इलाके में घनी कंटीली झाड़ियां और नागफनी का घना जंगल फैला हुआ था। एक दिन जब स्थानीय निवासी और मजदूर उस जंगल और झाड़ियों की सफाई कर रहे थे, तब सफाई के दौरान अचानक वहां एक स्वयंभू शिवलिंग प्रकट हुआ।
जंगल के बीचों-बीच प्राकृतिक रूप से प्रकट हुए इस शिवलिंग को देखकर स्थानीय निवासियों में भारी उत्साह और श्रद्धा की लहर दौड़ गई। इसके बाद ग्रामीणों और भक्तों ने मिलकर उसी पवित्र स्थान पर एक सुंदर मंदिर का निर्माण कराया। चूंकि यह शिवलिंग झाड़ियों और नागफनी के जंगल के बीच मिला था, इसलिए इस पावन धाम का नाम 'झारखंडी महादेव मंदिर' प्रसिद्ध हो गया। तब से लेकर आज तक यह मंदिर श्रद्धालुओं की अगाध आस्था का केंद्र बना हुआ है।
इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भी भक्त यहां आकर स्वयंभू शिवलिंग पर शुद्ध जल और बेलपत्र अर्पित करता है, भगवान शिव उसके सारे संकट हर लेते हैं और मनचाहा फल प्रदान करते हैं। सावन के पूरे महीने, महाशिवरात्रि के दिन और हर सोमवार को यहां तड़के से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं। हर-हर महादेव और जय भोलेनाथ के नारों से पूरा नागफनी क्षेत्र गुंजायमान हो उठता है।



















