लखीमपुर खीरी जिले में शारदा नदी का तांडव इस कदर बढ़ गया है कि वहां के बाशिंदों पर भारी मुसीबत आ पड़ी है। जिन घरों को ग्रामीणों ने अपनी मेहनत और मजदूरी की एक-एक पाई जोड़कर खड़ा किया था, आज उसी आशियाने को उन्हें अपने ही हाथों से तोड़ना पड़ रहा है। नदी के भयानक कटाव के चलते परिवारों के सपनों का महल ढह रहा है और मजबूरी में उन्हें अपने ही घरों को गिराकर वहां से निकलना पड़ रहा है। नदी की तेज लहरें जमीन को जिस रफ्तार से काट रही हैं, उसे देखकर स्थानीय लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं।
रूरा सुल्तानपुर में बिगड़े हालात
जिले के रूरा सुल्तानपुर इलाके में हालात सबसे ज्यादा डरावने बने हुए हैं। यहां लोगों के सामने अब अपना घर बचाने की कोई उम्मीद नहीं बची है, बल्कि उनकी प्राथमिकता घर के भीतर रखा जरूरी सामान किसी तरह सुरक्षित बाहर निकालने की है। नदी की धार इतनी आक्रामक है कि वह लगातार रिहायशी इलाकों की तरफ बढ़ती जा रही है। इस आसन्न खतरे को भांपते हुए ग्रामीण खुद अपने घरों की दीवारें हथौड़ों और अन्य औजारों से गिरा रहे हैं। कोई अपने घर से ईंटें निकालकर सुरक्षित ठिकाने पर पहुंचा रहा है, तो कोई खिड़कियां और दरवाजे उखाड़ रहा है। छतों के हिस्सों को भी बचाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं ताकि बाद में निर्माण कार्य में कुछ मदद मिल सके। जो भी सामान दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है, उसे लोग सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट करने में लगे हुए हैं।
उपजाऊ खेतों का नदी में विलीन होना
केवल रिहायशी मकान ही नहीं, बल्कि शारदा नदी का विकराल रूप खेतों को भी तेजी से लीलता जा रहा है। किसानों की उपजाऊ जमीनें देखते ही देखते नदी का हिस्सा बनती जा रही हैं। फसलों के नष्ट होने के बाद अब कटान का सीधा असर आबादी पर आ गया है, जिससे पूरे क्षेत्र में भय और बेचैनी का माहौल पैदा हो गया है। ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य साधन उनकी कृषि भूमि थी, जो अब जलमग्न होकर पानी में बह चुकी है। खेतों के बाद अब घरों पर मंडराते इस संकट ने लोगों की नींद उड़ा दी है।
मजबूरन पलायन करने को विवश ग्रामीण
बढ़ते खतरे के साये में जी रहे कई परिवार अब सुरक्षित आशियाने की तलाश में गांव से पलायन करने को मजबूर हो चुके हैं। ग्रामीण सबसे पहले अपने घर के बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को सुरक्षित ठिकानों पर भेज रहे हैं। इसके बाद बची-कुची गृहस्थी को सहेजने का काम किया जा रहा है। हालात यह हैं कि कोई अपने सिर पर सामान लादकर निकल रहा है, तो कोई ट्रैक्टर-ट्रॉली में अपने घरों के दरवाजे, खिड़कियां और अन्य जरूरी सामान भरकर सुरक्षित ठिकानों की तरफ पलायन कर रहा है। प्रशासन और भविष्य को लेकर उनके मन में तमाम तरह की अनिश्चितताएं बनी हुई हैं।
पीड़ितों का दर्द और उनकी आपबीती
स्थानीय निवासी संगीता देवी अपना दर्द बयां करते हुए बताती हैं कि उनकी उपजाऊ जमीन पहले ही शारदा नदी की भेंट चढ़ चुकी है और अब उनका मकान भी नदी के बिल्कुल करीब आ पहुंचा है। उनका कहना है कि जिन हाथों से उन्होंने अपना घर सींचा था, आज विवशता में उन्हीं हाथों से उसे ढहाना पड़ रहा है। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनके बनाए आशियाने में उन्हें इस तरह बेदखल होना पड़ेगा। उनके पति मेहनत-मजदूरी करके परिवार का गुजारा चलाते थे, लेकिन अब सिर पर छत न होने के कारण जीवनयापन का संकट और गहरा गया है। एक अन्य ग्रामीण लाली देवी बताती हैं कि उनके पति भी मजदूरी करके किसी तरह परिवार का पेट पालते थे और शाम को पूरा परिवार एक साथ बैठकर भोजन करता था, लेकिन अब वह छत भी उनके सिर से छिनने के कगार पर पहुंच चुकी है। लाली देवी का कहना है कि शारदा का कटान इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि फसलें और खेत लगातार समाते जा रहे हैं, जिसके कारण उन्हें मजबूरी में पलायन का रास्ता चुनना पड़ रहा है। उन्हें यह तक नहीं पता है कि प्रशासन बाढ़ और कटान पीड़ितों को कहां ठहराएगा और उनके पुनर्वास के लिए क्या व्यवस्था की जाएगी।

















