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तेलंगाना की अनोखी रेती वाली दरगाह: जहाँ नहीं चढ़ती चादर और कच्ची रेत पर मांगी जाती है मन्नतधर्म
17 अग॰ 2026, 6:06 pm (44 दिन पहले)· 1

तेलंगाना की अनोखी रेती वाली दरगाह: जहाँ नहीं चढ़ती चादर और कच्ची रेत पर मांगी जाती है मन्नत

तेलंगाना के हैदराबाद में स्थित हजरत सैयद सादुल्लाह शाह नक्शबंदी की दरगाह अपनी अनोखी परंपराओं के लिए जानी जाती है, जहाँ पक्की मजार और चादर चढ़ाने की बजाय कच्ची रेत पर दुआएं मांगी जाती हैं।

देश के कई हिस्सों में सूफी संतों की तमाम दरगाहें अपनी विशाल इमारतों और संगमरमर की कलाकृतियों के लिए जानी जाती हैं, लेकिन तेलंगाना के हैदराबाद शहर में एक ऐसी ऐतिहासिक दरगाह मौजूद है जो अपनी असीम सादगी से हर किसी का ध्यान खींच लेती है। पुराना शहर के पत्थरगट्टी इलाके के करीब स्थित इस मजार को आम बोलचाल की भाषा में रेती वाली दरगाह कहा जाता है, जिसका असली नाम हजरत सैयद सादुल्लाह शाह नक्शबंदी (रह.) है। इस आध्यात्मिक स्थल की सबसे अनूठी बात यह है कि यहाँ पारंपरिक पक्की कब्रों के बजाय बारीक और कच्ची रेत की मजारें बनी हुई हैं जो सैकड़ों वर्षों से अपने मूल रूप में संरक्षित हैं।

इस दरगाह पर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए कुछ खास नियम तय किए गए हैं जो इसकी सादगी को और अधिक बढ़ाते हैं। यहाँ आने वाले लोग मजारों पर कीमती रेशमी या सूती चादरें नहीं चढ़ाते हैं, क्योंकि ऐसा करने पर पूरी तरह पाबंदी है। श्रद्धालु यहाँ केवल ताजे फूल और इत्र की खुशबू अर्पित करते हैं। इसके अलावा, पारंपरिक रूप से पक्की मजारों को छूने के बजाय लोग यहाँ की कच्ची रेत पर अपनी हथेलियों के निशान छोड़ते हैं और उसी अवस्था में बैठकर अपनी मन्नतें मांगते हैं। यह अनूठी परंपरा बिना किसी रुकावट के पीढ़ियों से चली आ रही है और यहाँ आने वाले हर शख्स को एक अलग तरह की मानसिक शांति का अनुभव कराती है।

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दक्कन में अध्यात्म का प्रसार और संत का जीवन सफर

ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, इस पवित्र दरगाह के संत हजरत सैयद सादुल्लाह शाह (रह.) का जन्म 1199 हिजरी में सीमांत इलाके में हुआ था। कम उम्र से ही उनका झुकाव धार्मिक शिक्षा, मानवीय सेवा और ईश्वर की इबादत की तरफ हो गया था। अपनी शुरुआती तालीम मुकम्मल करने के बाद वे आध्यात्मिक ज्ञान की तलाश में दिल्ली पहुंचे, जहाँ उन्होंने सूफी मत के नक्शबंदिया सिलसिले के प्रतिष्ठित संत हजरत शाह गुलाम अली देहलवी (रह.) से शिक्षा और खिलाफत प्राप्त की। इसके बाद पवित्र हज यात्रा संपन्न करके वे दक्कन यानी हैदराबाद आए और यहाँ नक्शबंदिया सिलसिले की मुख्य आध्यात्मिक नींव रखी। उन्होंने करीब 25 साल तक समाज में भाईचारे, इंसानियत और शांति का संदेश प्रसारित किया। करीब 70 वर्ष की आयु में 28 जमादि-उल-अव्वल 1270 हिजरी को उनका देहांत हुआ।

मुख्य परिसर की संरचना और सालाना उर्स का आयोजन

इस दरगाह के मुख्य गुंबद के भीतर कुल चार कच्ची रेत की मजारें बनी हुई हैं जो आज भी ज्यों की त्यों सुरक्षित हैं। इन चार मजारों में हजरत सैयद सादुल्लाह शाह (रह.) के अलावा उनके भाई हजरत सैयद शाह मोहम्मद उस्मान, उस्मान साहब की धर्मपत्नी सैयदा फाजिला बेगम और उनके दामाद हजरत अमीर अशरफ अली की मजारें शामिल हैं। इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक हर साल जमादि-उल-अव्वल के महीने में इस स्थान पर सालाना उर्स का आयोजन किया जाता है, जो पूरी सादगी और भव्यता के साथ संपन्न होता है। सदियों पुरानी यह परंपरा आज भी लोगों को अहंकार से दूर रहकर सादगी और प्रेम का मार्ग दिखाती है।

सवाल-जवाब

रेती वाली दरगाह कहाँ स्थित है?
यह दरगाह तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद के पुराने शहर में पत्थरगट्टी इलाके के पास स्थित है।
इस दरगाह को रेती वाली दरगाह क्यों कहा जाता है?
यहाँ की मजारें पक्की ईंट या संगमरमर की नहीं बनी हैं, बल्कि बारीक और कच्ची रेत के रूप में सुरक्षित हैं।
क्या इस दरगाह पर चादर चढ़ाने की अनुमति है?
नहीं, इस ऐतिहासिक दरगाह पर पारंपरिक सूती या रेशमी चादर चढ़ाने पर पूरी तरह मनाही है।
यहाँ श्रद्धालु किस प्रकार अपनी दुआएं मांगते हैं?
श्रद्धालु मजारों पर चादर चढ़ाने के बजाय ताजे फूल, इत्र अर्पित करते हैं और कच्ची रेत पर हथेलियों के निशान बनाकर दुआ मांगते हैं।
इस दरगाह के मुख्य संत कौन थे?
इस आध्यात्मिक केंद्र की स्थापना हजरत सैयद सादुल्लाह शाह नक्शबंदी (रह.) ने की थी।
सालाना उर्स का आयोजन किस महीने में होता है?
यहाँ हर साल इस्लामी कैलेंडर के अनुसार जमादि-उल-अव्वल के महीने में सालाना उर्स मनाया जाता है।
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