गोवत्स द्वादशी का यह पवित्र पर्व विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की लंबी उम्र और सुखद जीवन की कामना के लिए रखा जाता है। इस अवसर पर देशभर में गौ माता और उनके बछड़ों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस व्रत के अनुष्ठान में शुभ मुहूर्त के दौरान गोवत्स द्वादशी की पौराणिक कथा सुनने की परंपरा है। हालांकि बहुत कम लोग यह जानते हैं कि इस दिन गणेश जी की कथा सुनना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसके बिना पूजा का पूर्ण फल अधूरा माना जाता है।
एक अनूठी लोक कथा और गणेश जी का चमत्कार
धार्मिक परंपराओं में प्रचलित इस कथा के अनुसार एक गांव में एक मां और उसकी बेटी रहती थीं। एक दिन जब गांव के सभी लोग गणेश मेला देखने जाने लगे, तो बेटी की भी वहां जाने की तीव्र इच्छा हुई। उसने अपनी मां से मेले में जाने की जिद की। मां ने उसे समझाया कि मेले में भारी भीड़ के कारण वहां जाना सुरक्षित नहीं है और गिरने से चोट लग सकती है। लेकिन लड़की के न मानने पर मां ने उसे विदा करते हुए दो लड्डू और थोड़ा सा पानी दिया। मां ने निर्देश दिया कि एक हिस्सा भगवान गणेश को अर्पित करना है और बाकी खुद ग्रहण करना है।
मेले में रुकी लड़की और भगवान की परीक्षा
लड़की मेला स्थल पर पहुंच गई, लेकिन उत्सव समाप्त होने के बाद जब सभी ग्रामीण अपने घरों को लौट आए, तो वह लड़की वापस नहीं लौटी। वह वहीं गणेश जी की मूर्ति के पास बैठी रही और रात भर यही दोहराती रही कि एक हिस्सा गणेश जी के लिए और एक उसके अपने लिए है। पूरी रात बीतने के बाद गणेश जी ने विचार किया कि यदि उन्होंने वह प्रसाद ग्रहण नहीं किया, तो यह बालिका घर नहीं जाएगी और उसकी मां घर पर अत्यंत चिंतित हो रही होगी।
वरदान प्राप्ति और माता का मिलन
इस स्थिति को देखकर गणेश जी ने एक बालक का रूप धारण किया और लड़की के पास आकर उसका दिया हुआ प्रसाद स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्होंने बालिका से अपनी इच्छा के अनुसार वर मांगने को कहा। लड़की असमंजस में पड़ गई कि वह अन्न मांगे, धन मांगे, उत्तम वर मांगे या कोई बड़ा महल मांगे। भगवान ने उसके मन की दुविधा को भांपते हुए उसे तुरंत घर जाने को कहा और आश्वासन दिया कि उसकी हर मनोकामना पूर्ण होगी। जब वह घर पहुंची और अपनी मां को पूरी घटना सुनाई, तो शीघ्र ही उसके मन में आए सभी सपने सच साबित हो गए।



















