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53.7 की जगह सिर्फ 19.2 मिमी बारिश, 24 घंटे में आसमान से कहां उड़ गए मॉनसून के बादल और क्यों उठ रहा रेत का गुबारविज्ञान
25 जून 2026, 6:32 pm (45 दिन पहले)· 1

53.7 की जगह सिर्फ 19.2 मिमी बारिश, 24 घंटे में आसमान से कहां उड़ गए मॉनसून के बादल और क्यों उठ रहा रेत का गुबार

14 जून तक सैटेलाइट पर भारत के बड़े हिस्से में घने मॉनसूनी बादल थे, अगले दिन वे गायब हो गए और बारिश में 64% की कमी दर्ज हुई। जानिए बादलों के अचानक छंटने और रेतीले बवंडर के पीछे का पूरा विज्ञान।

देश में किसान, कारोबारी और आम लोग, सब इस वक्त आसमान की तरफ टकटकी लगाए बैठे हैं। बादल बनते हैं, घिरते हैं, लेकिन बरसने से पहले ही हवा में घुलकर गायब हो जाते हैं और पीछे रह जाती है सिर्फ मायूसी। हैरानी की बात यह है कि 14 जून तक हालात बिल्कुल उम्मीद के मुताबिक थे। सैटेलाइट तस्वीरों में भारत के एक बड़े हिस्से पर मॉनसून के घने बादल छाए हुए थे और किसान मान बैठे थे कि इस बार बारिश ठीक समय पर राहत लेकर आएगी।

लेकिन ठीक अगले दिन, यानी 15 जून को जब मौसम वैज्ञानिकों ने नया सैटेलाइट डेटा खोला तो वे चौंक गए। एक दिन पहले तक बरसने को बेताब दिख रहे वे सारे बादल अचानक छंट चुके थे। आंकड़ों में यह झटका और साफ दिखता है, 4 से 15 जून के बीच सामान्य तौर पर 53.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, जबकि असल में सिर्फ 19.2 मिमी ही दर्ज हुई। यानी बारिश में पूरे 64% की भारी गिरावट। सवाल यह है कि मॉनसून आते-आते आखिर क्यों ठिठक गया?

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बादलों के गायब होने की तीन घरेलू वजहें

मौसम की इस आंख-मिचौली के पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि पक्के वैज्ञानिक कारण हैं। पहला है मॉनसून का ब्रेक फेज। आगे बढ़ने के लिए मॉनसून को लगातार नमी चाहिए होती है, लेकिन इस बार बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में हवा का दबाव कुछ इस तरह बदला कि मॉनसून की रफ्तार सुस्त पड़ गई। मौसम विज्ञान की भाषा में इसे मॉन्सूनल ट्रफ का खिसकना कहते हैं, जिसकी वजह से बादल बनने की पूरी प्रक्रिया अचानक थम गई।

दूसरी वजह है अल नीनो का हैंगओवर। अल नीनो भले ही अब कमजोर पड़ रहा है, लेकिन पिछले महीनों में प्रशांत महासागर के गर्म होने का असर अब भी भारतीय वायुमंडल पर बना हुआ है। नतीजा यह कि हवाओं को वो नमी नहीं मिल पा रही जो बादलों को बांधकर रोक सके। तीसरी वजह है एंटी-चक्रवात। भारत के मध्य और उत्तर-पश्चिमी हिस्से के ऊपर एक हाई-प्रेशर जोन बन गया है, जो हवा को ऊपर उठने से रोक देता है। जब हवा ऊपर उठकर ठंडी ही नहीं होगी, तो बादल भला कैसे बनेंगे? इसी का सीधा नतीजा है, बादलों का गायब हो जाना।

रेतीला बवंडर क्यों और कैसे उठता है

इन्हीं दिनों कई इलाकों में बार-बार रेतीला बवंडर भी उठ रहा है, जिसमें अचानक आसमान पीला पड़ जाता है और धूल का एक गुबार तेजी से ऊपर की ओर चढ़ने लगता है। इसका गणित सीधा है। जब बारिश नहीं हुई तो मिट्टी की नमी पूरी तरह खत्म हो गई और जमीन पाउडर जैसी सूखी पड़ गई। दोपहर में जब सूरज धरती को भट्टी की तरह तपाता है, तो जमीन के पास की हवा गर्म होकर बहुत तेजी से ऊपर उठती है। इस खाली जगह को भरने के लिए आस-पास की हवाएं चक्रवात की तरह घूमती हुई आती हैं और सूखी मिट्टी को अपने साथ आसमान में उड़ा ले जाती हैं। यही नजारा रेतीले बवंडर के रूप में दिखता है।

यह सिर्फ भारत की समस्या नहीं है

अगर आपको लग रहा है कि मॉनसून का गायब होना और बवंडर उठना सिर्फ भारत की स्थानीय परेशानी है, तो आप गलत हैं। इसके पीछे कुछ ऐसे तथ्य हैं जो हैरान कर देंगे। सबसे पहले मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन यानी MJO का खेल। यह समुद्र के ऊपर चलने वाला बादलों और हवाओं का एक चक्र है, जो पूरी दुनिया का चक्कर लगाता है। इस वक्त यह चक्र हिंद महासागर से दूर खिसककर प्रशांत महासागर की ओर शिफ्ट हो गया है। जब तक MJO भारत के पास नहीं लौटता, यह मॉनसून को दबाए रखता है, यानी बादल चाहकर भी भारी बारिश नहीं करा पाते।

दूसरा कारण है जेट स्ट्रीम की मनमानी। धरती से करीब 10 से 12 किलोमीटर ऊपर बहने वाली तेज हवाओं को जेट स्ट्रीम कहते हैं। आमतौर पर जून में इन्हें भारत के उत्तर की ओर खिसक जाना चाहिए था, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के चलते इस बार ये हवाएं भारत के ऊपर ही टिकी हुई हैं और ऊपर से गर्म हवा को नीचे की ओर धकेलकर बादल बनने ही नहीं दे रहीं। तीसरा कारण है अर्बन हीट आइलैंड। ये रेतीले बवंडर गांवों के मुकाबले दिल्ली-NCR और जयपुर जैसे शहरों के आस-पास ज्यादा क्यों दिख रहे हैं? क्योंकि कंक्रीट का जंगल यानी इमारतें और सड़कें सूरज की गर्मी को सोख लेती हैं, जिससे शहरों का तापमान आस-पास के ग्रामीण इलाकों से भी ज्यादा हो जाता है। यही तेज गर्मी धूल के इन बवंडरों के लिए ईंधन का काम करती है।

क्या यह हालत हमेशा रहेगी

राहत की बात यह है कि मौसम वैज्ञानिक इसे मॉनसून का एक अस्थायी ठहराव मान रहे हैं। जून खत्म होते-होते हवाओं का रुख दोबारा बदलेगा। जैसे ही अरब सागर से नमी भरी हवाएं फिर रफ्तार पकड़ेंगी, ये रेतीले बवंडर शांत हो जाएंगे और गायब हुए बादल एक बार फिर गरज-चमक के साथ लौट आएंगे।

लेकिन असल संदेश यह है कि प्रकृति हमें चेतावनी दे रही है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से अब मौसम का मिजाज भांपना कितना मुश्किल होता जा रहा है, यह 24 घंटे में बादलों का गायब होना और धूल का तांडव खुद बता रहा है। यह बदलते क्लाइमेट का सिर्फ एक ट्रेलर है। गर्म होती हवा पानी सोखने की ज्यादा क्षमता रखती है, इसलिए बादल कई दिनों तक बिना बरसे हवा में नमी जमा करते रहते हैं और फिर अचानक किसी एक जगह बादल फटने जैसी स्थिति बना देते हैं या तीन दिन की बारिश तीन घंटे में गिरा देते हैं। इसी वजह से एक तरफ 64% का सूखा दिखता है और अगले ही हफ्ते किसी शहर में बाढ़ आ जाती है।

पहले मॉनसून 1 जून को केरल पहुंचता था और धीरे-धीरे पूरे देश को भिगो देता था। अब इसकी टाइमिंग बदल चुकी है, यह कभी समय से पहले आ जाता है तो कभी आकर हफ्तों तक एक ही जगह अटक जाता है। बादलों का यूं अचानक गायब हो जाना इसी असंतुलन का नतीजा है। हम सिर्फ एक खराब मौसम का सामना नहीं कर रहे, बल्कि इंसानों ने धरती के थर्मोस्टेट को इतना बिगाड़ दिया है कि अब कुदरत भी असमंजस में है। आज आसमान से बादल गायब हैं, कल शायद नदियां गायब हो जाएं। संभलने का वक्त अब है, वरना आने वाले सालों में प्रकृति का संतुलन और बिगड़ेगा और हमें कई नई मुसीबतों से जूझना पड़ेगा।

सवाल-जवाब

4 से 15 जून के बीच बारिश में कितनी कमी आई?
इस दौरान सामान्य रूप से 53.7 मिमी बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन सिर्फ 19.2 मिमी दर्ज हुई, यानी 64% की कमी।
बादल अचानक कब गायब हुए?
14 जून तक सैटेलाइट पर घने मॉनसूनी बादल दिख रहे थे, लेकिन 15 जून को वे अचानक छंट गए।
बादल गायब होने की मुख्य वजहें क्या हैं?
मॉनसून का ब्रेक फेज, अल नीनो का बचा हुआ असर और मध्य व उत्तर-पश्चिमी भारत पर बना एंटी-चक्रवात इसकी मुख्य वजहें हैं।
रेतीला बवंडर क्यों उठता है?
बारिश न होने से मिट्टी सूखकर पाउडर जैसी हो जाती है, और दोपहर की तेज गर्मी से गर्म हवा ऊपर उठती है तथा आस-पास की हवाएं घूमते हुए सूखी मिट्टी को आसमान में उड़ा ले जाती हैं।
MJO और जेट स्ट्रीम का इसमें क्या रोल है?
MJO इस समय हिंद महासागर से प्रशांत महासागर की ओर खिसक गया है जिससे मॉनसून दब रहा है, और जेट स्ट्रीम भारत के ऊपर ही टिककर गर्म हवा को नीचे धकेल रही है।
रेतीले बवंडर शहरों के पास ज्यादा क्यों दिखते हैं?
दिल्ली-NCR और जयपुर जैसे शहरों में कंक्रीट गर्मी सोख लेता है, जिससे तापमान ग्रामीण इलाकों से ज्यादा हो जाता है और यह गर्मी बवंडरों को ईंधन देती है।
क्या बारिश दोबारा लौटेगी?
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक यह अस्थायी ठहराव है, जून खत्म होते-होते अरब सागर से नमी भरी हवाएं लौटेंगी और बादल गरज-चमक के साथ वापस आएंगे।
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