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डेथ वैली में उगने वाला अनोखा पौधा इंसानों की तरह बहाता है पसीना, 60 डिग्री सेल्सियस की जानलेवा गर्मी में भी रहता है एकदम कूलविज्ञान
6 अग॰ 2026, 4:42 pm (12 घंटे पहले)· 0

डेथ वैली में उगने वाला अनोखा पौधा इंसानों की तरह बहाता है पसीना, 60 डिग्री सेल्सियस की जानलेवा गर्मी में भी रहता है एकदम कूल

कैलिफोर्निया की अत्यधिक गर्म डेथ वैली में टाइडेस्ट्रोमिया ऑबलॉन्गीफोलिया नामक पौधा स्टोमेटा छिद्रों के जरिए पानी वाष्पित करके 60 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी खुद को सुरक्षित रखता है। शोधकर्ताओं ने इसके अनोखे बायोलॉजिकल कूलिंग सिस्टम और जेनेटिक संरचना का खुलासा किया है।

उत्तरी अमेरिका का डेथ वैली रेगिस्तान अपनी अत्यधिक भीषण गर्मी और सूखे हालात के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस मरुस्थलीय इलाके में आम दिनों का तापमान 49 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, जबकि यहां का ऐतिहासिक अधिकतम रिकॉर्ड 56.7 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया जा चुका है। इतने कठोर वातावरण में किसी भी जटिल वनस्पति या जीव-जंतु का जीवित रहना लगभग असंभव माना जाता है। हालांकि, कैलिफोर्निया और नेवादा के सीमावर्ती रेगिस्तानी हिस्सों में टाइडेस्ट्रोमिया ऑबलॉन्गीफोलिया नाम का एक बेहद मजबूत कांटेदार फूल वाला पौधा पाया जाता है। स्थानीय स्तर पर एरिजोना हनीस्वीट के नाम से पहचाने जाने वाला यह पौधा 60 डिग्री सेल्सियस की भयानक गर्मी में भी खुद को ठंडा रखने में सक्षम है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए नवीनतम अध्ययनों से पता चला है कि यह पौधा अत्यधिक उच्च तापमान में भी इंसानों के पसीने की तरह वाष्पीकरण प्रक्रिया का उपयोग करके खुद को मौत के मुंह में जाने से बचा लेता है।

डेथ वैली का भयानक वातावरण और जटिल जीवन की जैविक सीमाएं

पर्यावरण विज्ञान में 60 डिग्री सेल्सियस का तापमान किसी भी जटिल पौधे या जानवर के जैविक अस्तित्व की ऊपरी सीमा माना जाता है। अत्यंत उच्च तापमान में जटिल जीवों की कोशिकीय संरचनाएं नष्ट होने लगती हैं, प्रोटीन विकृत हो जाते हैं और आंतरिक अंग काम करना बंद कर देते हैं। जहां गर्म पानी के झरनों या समुद्र के गहरे हिस्सों में सूक्ष्म बैक्टीरिया आसानी से पनप सकते हैं, वहीं बहुकोशिकीय जटिल पौधों के लिए ऐसी गर्मी को बर्दाश्त करना नामुमकिन होता है। इसके बावजूद, एरिजोना हनीस्वीट ने डेथ वैली की इस आग उगलती परिस्थितियों के अनुकूल खुद को पूरी तरह ढाल लिया है। यह पौधा अपनी पत्तियों के तापमान को आसपास की तपती हवा की तुलना में काफी नीचे बनाए रखने की अद्भुत क्षमता रखता है। यही खास गुण इसे 60 डिग्री सेल्सियस के जानलेवा माहौल में भी हरा-भरा और जीवित रखता है।

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1200 से अधिक पौधों पर किया गया कठोर प्रयोगशाला परीक्षण

इस अद्भुत वनस्पति की गर्मी सहने की क्षमता का विस्तृत अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं की एक टीम ने व्यापक प्रयोग किया। वैज्ञानिकों ने डेथ वैली और आसपास के अन्य मरुस्थलीय क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले कुल 223 पौधों से बीज एकत्र किए। इन बीजों को नियंत्रित परिस्थितियों में अंकुरित करके 1200 से अधिक छोटे पौधों की पौध तैयार की गई। इसके बाद प्रयोगशाला में इन पौधों को धीरे-धीरे बढ़ते तापमान के प्रति अनुकूलित किया गया ताकि वे आने वाली भीषण परिस्थितियों के लिए तैयार हो सकें। अनुकूलन चरण के पूरा होने पर सभी 1200 पौधों को लगातार एक सप्ताह से अधिक समय तक हर दिन छह से आठ घंटे के लिए 60 डिग्री सेल्सियस की अत्यधिक गर्मी में रखा गया।

इस अत्यधिक कठिन परीक्षण के दौरान सभी पौधे जीवित नहीं रह सके। विभिन्न पौधों की आनुवंशिक विविधता के आधार पर उनके बचने की दर 2 प्रतिशत से लेकर 34 प्रतिशत तक दर्ज की गई। यह परिणाम स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि प्राकृतिक आबादी के भीतर आनुवंशिक भिन्नता के कारण कुछ विशिष्ट पौधे दूसरों की तुलना में अत्यधिक गर्मी सहने में काफी अधिक मजबूत होते हैं। जीवित बचे पौधों ने साबित किया कि उनके पास गर्मी से सुरक्षा प्रदान करने वाला एक बेहद प्रभावी आंतरिक तंत्र मौजूद है।

इन्फ्रारेड कैमरों द्वारा पत्तियों का तापमान विश्लेषण

प्रयोगशाला परीक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने पौधों की शारीरिक स्थितियों और पत्तियों के तापमान की सटीक निगरानी के लिए अत्याधुनिक इन्फ्रारेड कैमरों का सहारा लिया। थर्मल इमेजिंग आंकड़ों के विश्लेषण से चौंकाने वाले वैज्ञानिक तथ्य सामने आए। सबसे गर्म दिनों में भी जीवित बचे पौधों की पत्तियों का तापमान आसपास की वायु के तापमान की तुलना में 10 डिग्री सेल्सियस तक कम दर्ज किया गया। कुछ सबसे असाधारण मामलों में पत्तियों का तापमान हवा के मुकाबले 13 डिग्री सेल्सियस तक कम पाया गया।

लगातार आठ दिनों तक 60 डिग्री सेल्सियस के जानलेवा वातावरण में रहने के बावजूद, इन पौधों ने अपनी पत्तियों का आंतरिक तापमान 54 डिग्री सेल्सियस से 59 डिग्री सेल्सियस के बीच बनाए रखने में सफलता हासिल की। यद्यपि 54 से 59 डिग्री का तापमान भी बहुत अधिक होता है, लेकिन यह जटिल कोशिकीय जीवन के विनाशकारी सीमा रेखा से ठीक नीचे है। शोध से यह निष्कर्ष निकला कि पौधा केवल गर्मी को सह नहीं रहा था, बल्कि सक्रिय रूप से अपनी पत्तियों को ठंडा करके अपनी जैविक क्रियाओं को निरंतर चला रहा था।

मानव पसीने की भांति कार्य करने वाला स्टोमेटा तंत्र

वैज्ञानिकों ने जब इस कूलिंग प्रक्रिया के जैविक कारणों की पड़ताल की, तो पाया कि ठंडी पत्तियों वाले पौधों ने एक विशेष शारीरिक तंत्र को सक्रिय कर रखा था। यह तंत्र पत्तियों की सतह पर मौजूद बेहद सूक्ष्म छिद्रों को खुला रखने का काम करता है। इन सूक्ष्म छिद्रों को वनस्पति विज्ञान में स्टोमेटा कहा जाता है। जब स्टोमेटा खुले रहते हैं, तो पौधे के भीतर मौजूद जल पत्तियों की सतह पर आता है और भाप बनकर हवा में उड़ जाता है। यह प्रक्रिया ठीक उसी सिद्धांत पर काम करती है जिस तरह इंसानों की त्वचा से पसीना सूखने के बाद शरीर को ठंडक महसूस होती है।

स्टोमेटा की भूमिका की पुष्टि करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक अतिरिक्त परीक्षण किया, जिसमें उन्होंने कृत्रिम रूप से इन छिद्रों को बंद कर दिया। मिशिगन के प्लांट रेजिलिएंस इंस्टीट्यूट की पोस्टडॉक्टरल फेलो जोआना फीहन ने इस अध्ययन के निष्कर्षों पर प्रकाश डालते हुए कहा, "हमने पाया कि स्टोमेटा को बंद करने से पौधे की कूलिंग प्रोसेस में रुकावट आती है।" जब स्टोमेटा बंद हो जाते हैं, तो पानी का वाष्पीकरण रुक जाता है और पत्तियां तेजी से गर्म होकर नष्ट होने लगती हैं। इससे यह साबित हो गया कि स्टोमेटा के माध्यम से होने वाला जल वाष्पीकरण ही इस पौधे के कूलिंग सिस्टम की मुख्य कुंजी है।

माइटोकॉन्ड्रिया, क्लोरोप्लास्ट और जीनोम की आनुवंशिक संरचना

पूर्व में किए गए वैज्ञानिक अनुसंधानों से संकेत मिला था कि इस पौधे की शीतलन क्षमता का संबंध इसकी कोशिकाओं के भीतर मौजूद माइटोकॉन्ड्रिया और क्लोरोप्लास्ट के बीच होने वाले परस्पर संपर्क से है। अत्यधिक गर्मी के तनाव में क्लोरोप्लास्ट अपना सामान्य आकार बदलकर एक सुरक्षात्मक आवरण बना लेते हैं। इस बार वैज्ञानिकों ने पौधे के संपूर्ण जीनोम का विस्तृत विश्लेषण किया ताकि इस जैविक मशीनरी के पीछे मौजूद डीएनए घटकों की पहचान की जा सके।

जीनोम मैपिंग के दौरान शोधकर्ताओं को डीएनए के तीन ऐसे विशिष्ट आनुवंशिक क्षेत्रों की खोज करने में सफलता मिली जो सीधे तौर पर उच्च तापमान में उत्तरजीविता से जुड़े हैं। गर्म और ठंडी पत्तियों वाले पौधों के आनुवंशिक प्रोफाइल में स्पष्ट अंतर देखा गया, जिससे यह साबित होता है कि अत्यधिक गर्मी में पसीना बहाकर खुद को ठंडा रखने की यह क्षमता पूरी तरह से जेनेटिक कोड पर आधारित है।

जलवायु परिवर्तन और भविष्य की कृषि के लिए महत्व

रेगिस्तान के अत्यंत शुष्क वातावरण में जहां पानी की भारी कमी होती है, वहां यह पौधा कूलिंग प्रक्रिया के लिए आवश्यक जल किस प्रकार प्राप्त करता है, वैज्ञानिक अब इसके भूमिगत जड़ों के नेटवर्क का अध्ययन कर रहे हैं। वैश्विक जलवायु परिवर्तन और बढ़ते तापमान के दौर में टाइडेस्ट्रोमिया ऑबलॉन्गीफोलिया का यह जेनेटिक तंत्र कृषि वैज्ञानिकों के लिए नए रास्ते खोल सकता है। इस पौधे के स्टोमेटा नियंत्रण और गर्मी सहने वाले आनुवंशिक गुणों को समझकर भविष्य में सूखे और भयंकर गर्मी का सामना करने में सक्षम फसल प्रजातियों को विकसित करने में मदद मिल सकती है।

सवाल-जवाब

डेथ वैली में पाए जाने वाले इस विशेष पौधे का क्या नाम है?
इस पौधे का वैज्ञानिक नाम टाइडेस्ट्रोमिया ऑबलॉन्गीफोलिया (Tydestromia oblongifolia) है, जिसे आम भाषा में एरिजोना हनीस्वीट भी कहा जाता है।
यह पौधा कितनी गर्मी में भी जीवित रह सकता है?
यह पौधा 60 डिग्री सेल्सियस (140 डिग्री फारेनहाइट) तक के अत्यधिक जानलेवा तापमान में भी खुद को ठंडा रखकर जीवित रहने की क्षमता रखता है।
यह पौधा गर्मी से बचने के लिए खुद को ठंडा कैसे रखता है?
यह पौधा पत्तियों की सतह पर मौजूद छिद्रों (स्टोमेटा) को खुला रखता है, जिससे जल वाष्प बनकर उड़ता है। यह प्रक्रिया इंसानों में पसीना आने और सूखने से मिलने वाली ठंडक की तरह काम करती है।
प्रयोगशाला परीक्षण में पत्तियों का तापमान हवा से कितना कम दर्ज किया गया?
इन्फ्रारेड कैमरों की निगरानी में पत्तियों का तापमान हवा के मुकाबले 10 से 13 डिग्री सेल्सियस तक कम पाया गया।
वैज्ञानिकों को इस पौधे के डीएनए विश्लेषण में क्या मिला?
जीनोम विश्लेषण के दौरान शोधकर्ताओं को डीएनए के तीन ऐसे विशेष क्षेत्रों की पहचान हुई जो गर्मी में उत्तरजीविता और आनुवंशिक सुरक्षा से जुड़े हैं।
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