तकनीकी दुनिया में यह आशंका लगातार जताई जाती रही है कि किसी दिन अत्यधिक शक्तिशाली कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बेकाबू होकर जैविक हथियारों के जरिए मानव सभ्यता को संकट में डाल सकती है। हाल के महीनों में तकनीक जगत के कई प्रमुख अधिकारियों ने सिंथेटिक डीएनए के निर्माण को कड़े कानूनों के दायरे में लाने की वकालत की। इसी बीच स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और आर्क इंस्टीट्यूट के शोधकर्ताओं ने यह दर्शाया कि आधुनिक एल्गोरिदम नए वायरल जीनोम डिजाइन करने की क्षमता रखते हैं। वहीं एंथ्रोपिक ने भी एक अध्ययन में यह संकेत दिया कि क्लॉड जैसे उन्नत मॉडल का दुरुपयोग जैविक हथियार विकसित करने से जुड़ी प्रक्रियाओं में करने के प्रयास देखे गए हैं। इस जोखिम को फ्रंटियर एआई का सबसे गंभीर खतरा बताते हुए मुख्य कार्यकारी अधिकारी डारियो अमोदेई ने सरकारों से आग्रह किया कि वे तकनीकी प्रयोगशालाओं को सही दिशा में आगे बढ़ाने में मदद करें। इसके बावजूद जीवविज्ञानियों और सुरक्षा विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इस तरह के कयामती परिदृश्य की जमीनी संभावना काफी कम है।
इंटरनेट युग का पुराना दोहरा उपयोग संकट
कैलिफोर्निया के सनीवेल स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ फाउंडेशन मॉडल्स के रिसर्च साइंटिस्ट डेविड बेलामी का मानना है कि जैविक हथियारों के संदर्भ में एआई कोई पूरी तरह नया संकट नहीं पेश करता। वैज्ञानिक जगत दशकों से इस दोहरे उपयोग की दुविधा से जूझता रहा है कि क्या संभावित रूप से खतरनाक जैविक अनुसंधानों के निष्कर्ष सार्वजनिक रूप से प्रकाशित किए जाने चाहिए या नहीं। लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स के आने से पहले भी खुला इंटरनेट, ओपन-एक्सेस वैज्ञानिक शोध पत्रिकाएं और गूगल ट्रांसलेट जैसी अनुवाद सेवाएं लोगों के लिए प्रयोगशाला प्रोटोकॉल और जैविक जानकारियों तक पहुंच आसान बना चुकी थीं।
डेविड बेलामी स्पष्ट करते हैं कि एआई मूलतः एक ऐसा माध्यम है जो वैज्ञानिकों जैसे नेकनीयत शोधकर्ताओं और नुकसान पहुंचाने की मंशा रखने वाले तत्वों, दोनों को ही सूचनाओं का तेजी से विश्लेषण करने और आवश्यक प्रोटोकॉल तलाशने में सहायता कर सकता है। हालांकि केवल जानकारी हासिल कर लेना जैविक हथियारों के उत्पादन में सबसे बड़ी बाधा कभी नहीं रहा है।
लैब में वायरस तैयार करने की व्यावहारिक चुनौतियां
किसी खतरनाक जैविक तत्व को तैयार करने की राह में सबसे बड़ी रुकावट वास्तविक भौतिक प्रयोगशाला की प्रक्रियाएं हैं। किसी भी नुकसान पहुंचाने वाले तत्व को जरूरी जीन के टुकड़ों को हासिल करना होगा, एकदम शुरुआती स्तर से एक पूरा जीनोम तैयार करना होगा और फिर कई चरणों में यह परखना होगा कि वह वायरस इंसानों को संक्रमित करने में सक्षम है या नहीं। इसके साथ ही उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वह रोगाणु मनचाही बीमारी पैदा करे और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में तेजी से फैल सके। प्रयोगशालाओं में रोबोटिक सहायक कुछ नियमित कार्यों को स्वचालित जरूर कर सकते हैं और काम की रफ्तार बढ़ा सकते हैं, लेकिन जटिल प्रयोगों को सुरक्षित और सफल तरीके से संचालित करने के लिए उच्च स्तरीय मानवीय विशेषज्ञता और प्रचुर भौतिक संसाधनों की अनिवार्य जरूरत बनी रहती है।
बायोटेक स्टार्टअप गिंग्को बायोवर्क्स के सीईओ जेसन केली का तर्क है कि किसी आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस द्वारा मौजूदा रोगाणुओं पर नियंत्रण हासिल करना और उन्हें फैलाना लगभग नामुमकिन है, नए वायरस का निर्माण और उनका इस्तेमाल तो बहुत दूर की बात है। गिंग्को बायोवर्क्स स्वचालित प्रयोगशालाओं के विकास पर काम करती है और उसने ओपनएआई के साथ मिलकर एक परियोजना पर काम किया था जहां जीपीटी-5 मॉडल ने एक लैब का संचालन किया था।
जेसन केली के अनुसार एआई किसी भी स्थिति में प्रयोगशाला पर पूरी तरह कब्जा नहीं कर सकता था। इसकी मुख्य वजह यह थी कि लैब के भीतर मौजूद इंसान उन पदार्थों और उपकरणों को रोबोट को सौंपने से सीधे मना कर सकते थे जिनकी मांग वह किसी संभावित जैविक खतरे के निर्माण के लिए कर रहा था। इंसानों की यह मौजूदगी एक स्वाभाविक नियंत्रण प्रणाली की तरह काम करती है। किसी एआई के लिए अपनी मर्जी से जटिल वायरोलॉजी प्रक्रियाओं को अंजाम देने के लिए भारी संख्या में रोबोट्स की दरकार होगी, जो आज की तारीख में व्यावहारिक नहीं है।
मानवीय रक्षा घेरा और त्वरित वैक्सीन निर्माण
इम्यूनोलॉजिस्ट डेरिया उनुतमाज भी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि यदि कोई एजीआई जानलेवा बीमारी तैयार करने का प्रयास भी करे तो इंसान उसे आसानी से नाकाम करने में सक्षम होंगे। उनका कहना है कि यदि कोई दुर्भावनापूर्ण सुपर इंटेलिजेंस किसी तरह एक जानलेवा वायरस बाहर लाने में सफल हो भी जाता है, तो भी दुनिया भर के वैज्ञानिक अन्य आधुनिक एआई प्रणालियों का उपयोग करके बेहद कम समय में उसकी प्रभावी वैक्सीन विकसित कर लेंगे।
हालांकि जो विशेषज्ञ यह मानते हैं कि एजीआई द्वारा स्वतंत्र रूप से तुरंत जैविक हमला किए जाने का खतरा नगण्य है, वे भी इस बात को लेकर सतर्क हैं कि असामाजिक तत्व या चरमपंथी समूह इस तकनीक का फायदा उठा सकते हैं। इंस्टीट्यूट फॉर प्रोग्रेस की बायोटेक्नोलॉजी फेलो ओलिविया शार्फमैन का कहना है कि आज पूरी तरह से स्वायत्त प्रयोगशालाएं अस्तित्व में ही नहीं हैं, इसलिए किसी एआई का सीधे तौर पर लैब तक पहुंचकर अपने दम पर वायरस तैयार करना असंभव है। लेकिन वे इस खतरे को रेखांकित करती हैं कि कोई एआई किसी इंसान को पैसे देकर अपने लिए यह काम करवाने की कोशिश कर सकता है।
ओलिविया शार्फमैन के अनुसार एआई समर्थित बायोटेररिज्म एक गंभीर चुनौती हो सकता है, क्योंकि कुछ ऐसे चरमपंथी विचार वाले समूह मौजूद हैं जो इंसानों की जगह मशीनों को स्थापित करने की सनक रखते हैं। ऐसे तत्व इस तकनीक का अनुचित इस्तेमाल करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
जैविक हथियारों की तकनीकी सीमाएं
दूसरी तरफ कई विशेषज्ञ इस बात को लेकर निश्चिंत हैं कि जैविक युद्ध सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर बहुत व्यावहारिक रणनीति नहीं है। जेनेटिक बायोलॉजिस्ट और कम्प्यूटेशनल बायोलॉजी के प्रोफेसर फ्रैंकोइस बेलॉक्स का मानना है कि लोग अक्सर हथियारों के रूप में रोगाणुओं की क्षमता को जरूरत से ज्यादा आंक लेते हैं और इसके जोखिमों को गलत तरीके से समझते हैं।
फ्रैंकोइस बेलॉक्स के मुताबिक एजीआई की चर्चा को अलग रख दें तो भी नरसंहार की मंशा रखने वालों के लिए जैविक हथियार कोई बहुत आकर्षक विकल्प साबित नहीं होते। इसकी मुख्य वजह यह है कि जैविक हथियारों से किसी खास आबादी को निशाना बनाना और दूसरों को सुरक्षित बचा पाना बेहद कठिन होता है। इसके अलावा किसी पारंपरिक बम या विस्फोटक की तुलना में रोगाणुओं का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना और उनका रणनीतिक वितरण करना लॉजिस्टिक्स के लिहाज से बेहद पेचीदा काम है। उनका साफ कहना है कि किसी भी हमलावर के लिए, चाहे वह दुनिया का सबसे उन्नत दिमाग हो या कोई सामान्य इंसान, तबाही मचाने के जैविक माध्यमों की तुलना में कहीं अधिक सरल और असरदार तरीके पहले से मौजूद हैं।
बहुस्तरीय सुरक्षा घेरे और निगरानी की आवश्यकता
जैविक खतरों पर नए सिरे से शुरू हुई बहस के बीच ओलिविया शार्फमैन मानती हैं कि यह एच1एन1 जैसे मौजूदा रोगाणुओं सहित सभी जैविक खतरों से निपटने की तैयारी मजबूत करने का सही समय है। इसमें डीएनए सिंथेसिस तकनीक के आसपास कानूनी सुरक्षा प्रोटोकॉल कड़े करने जैसे नीतिगत कदम शामिल हो सकते हैं। इसके साथ ही वे इमारतों में एयर प्यूरिफिकेशन सिस्टम को आधुनिक बनाने जैसे बुनियादी व्यावहारिक बदलावों पर जोर देती हैं, जिससे सभी तरह के वायरस का फैलाव रोका जा सके।
पॉलिसी थिंक टैंक रैंड कॉरपोरेशन में एआई और बायो विभाग की प्रमुख स्टीफ गुएरा का कहना है कि एआई वास्तव में जैविक हथियारों के जोखिम को किस हद तक बढ़ाता है, यह तय करना जटिल प्रश्न है। एआई विभिन्न बिखरी हुई जानकारियों को एक सूत्र में पिरोने और लोगों को अच्छे या बुरे काम करने के लिए प्रेरित करने में बेहद सक्षम साबित हुआ है।
स्टीफ गुएरा के अनुसार जोखिम कम होने के बावजूद समाज कई स्तरों पर अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। सरकारें ऐसे कानून बना सकती हैं जिनके तहत सिंथेटिक डीएनए और आरएनए बेचने वाली कंपनियों के लिए अपने ग्राहकों और ऑर्डरों की अनिवार्य पृष्ठभूमि जांच करना जरूरी हो। हालांकि कई कंपनियां संदिग्ध आनुवंशिक अनुक्रमों की पहचान के लिए सॉफ्टवेयर का उपयोग पहले से कर रही हैं, लेकिन यह व्यवस्था अब तक सभी जगह अनिवार्य रूप से लागू नहीं है।
इसके अलावा किसी गलत तत्व के ऐसे उन्नत स्तर तक पहुंचने से पहले ही तकनीकी मॉडल्स के भीतर ठोस सुरक्षा दीवारें स्थापित की जानी चाहिए, ताकि वे किसी भी व्यक्ति को खतरनाक या नुकसानदेह जानकारियां प्रदान न करें। स्टीफ गुएरा बताती हैं कि वैश्विक स्तर पर रोग निगरानी प्रणालियों को मजबूत करना भी जरूरी है, ताकि नए संक्रमणों और फैल रहे रोगाणुओं का पता शोधकर्ताओं को शुरुआती चरण में ही चल सके। एआई कंपनियों, जीन सिंथेसिस फर्मों और सरकारों के बीच साझा डेटा प्रोटोकॉल विकसित करके भी इस दुरुपयोग को रोका जा सकता है।
बायोसिक्योरिटी नियंत्रणों को किसी न किसी तरह चकमा दिए जाने की आशंका हमेशा बनी रहती है। यही कारण है कि एक ऐसे बहुस्तरीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है जो किसी असामाजिक तत्व की पहली सोच और इरादे से लेकर जैविक हथियार के संभावित उपयोग तक के पूरे रास्ते में हर कदम पर रुकावटें पैदा करे।
इस पूरे विमर्श के बीच इम्यूनोलॉजिस्ट डेरिया उनुतमाज एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। उनका मानना है कि एआई से दुनिया खत्म होने की लगातार चर्चाएं उस सकारात्मक क्षमता से ध्यान भटका रही हैं, जिसके जरिए यह अत्याधुनिक तकनीक वैक्सीन विकास और अन्य अभूतपूर्व चिकित्सा अनुसंधानों में इंसानों की अभूतपूर्व मदद कर सकती है। वे जोर देते हैं कि दुनिया को इस तकनीक के सकारात्मक और जीवन रक्षक पहलुओं पर कहीं अधिक ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।



















