कैंसर के उपचार में सबसे जटिल बाधाओं में से एक ट्यूमर के आसपास का वातावरण होता है, जो अक्सर शरीर की प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को नाकाम कर देता है। कई मामलों में प्रतिरक्षा प्रणाली ट्यूमर पर हमला करने में पूरी तरह सक्षम होती है, मगर कैंसर जनित माहौल उन सुरक्षा कोशिकाओं को काम करने से रोक देता है। इस बाधा को दूर करने के लिए यूनिवर्सिटी ऑफ एडिलेड की प्रोफेसर चुनक्सिया झाओ के नेतृत्व में शोधकर्ताओं के एक दल ने विशेष नैनोकणों पर आधारित एक नई डिलीवरी तकनीक विकसित की है। यह तकनीक प्रतिरक्षा कोशिकाओं को दोबारा सक्रिय कर कैंसर से लड़ने के लिए तैयार करती है।
ट्यूमर से जुड़ी कोशिकाओं को पुनः सक्रिय करने की रणनीति
साइंस एडवांसेज में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, इस नए शोध का मुख्य केंद्र ट्यूमर से जुड़े मैक्रोफेज रहे। जब कैंसर के रासायनिक संकेत इन मैक्रोफेज को प्रभावित करते हैं, तो वे टी कोशिकाओं के पहुंचने और सक्रिय होने में रुकावट डालने लगते हैं, जबकि टी कोशिकाएं कैंसर से लड़ने वाले शरीर के सबसे प्रमुख हथियारों में से एक हैं। शोधकर्ताओं ने इस व्यवस्था को बदलने के लिए मैक्रोफेज के भीतर एमआरएनए थेरेपी पहुंचाने की तकनीक निकाली। यह एमआरएनए सीएक्ससीएल9 नामक रसायन के निर्माण का निर्देश ले जाता है, जो टी कोशिकाओं को ट्यूमर की ओर आकर्षित करने के लिए आवश्यक संकेत देता है।
कोविड के टीकों के बाद से एमआरएनए तकनीक तेजी से आगे बढ़ी है, विशेष रूप से ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में। हालांकि, शरीर के भीतर किसी भी इम्यून उत्प्रेरक संकेत को अनियंत्रित तरीके से कहीं भी जाने देना बेहद जोखिम भरा हो सकता है। यदि इम्यूनोथेरेपी के दौरान प्रतिरक्षा प्रणाली शरीर के अन्य हिस्सों में अत्यधिक उत्तेजित हो जाए, तो इससे जानलेवा और गंभीर दुष्प्रभाव पैदा हो सकते हैं। इसलिए ऐसी चिकित्सा प्रणाली की आवश्यकता थी जो केवल ट्यूमर वाले हिस्से में ही असर दिखाए।
स्मार्ट नैनोकणों की लक्षित डिलीवरी प्रणाली
एमआरएनए को केवल ट्यूमर वाली जगह पर भेजने और शरीर के सामान्य हिस्सों को सुरक्षित रखने के लिए शोधकर्ताओं ने स्मार्ट नैनोकण तैयार किए। आम तौर पर एमआरएनए उपचारों में आरएनए अणुओं को लिपिड आवरण यानी वसा की परतों वाले नैनोकणों में सुरक्षित रखा जाता है ताकि वे कोशिकाओं के अंदर प्रवेश कर सकें। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने इसी मूल लिपिड संरचना में एक विशेष लक्ष्यीकरण तंत्र जोड़ा, जिससे एमआरएनए सिर्फ सही कोशिकाओं में ही दाखिल हो सके।
इन स्मार्ट नैनोकणों की बाहरी सतह पर ऐसे एंटीबॉडी लगाए गए जो टीआरईएम2 नामक प्रोटीन से सीधे जुड़ जाते हैं। यह प्रोटीन ट्यूमर से जुड़े उन मैक्रोफेज की सतह पर पाया जाता है जो प्रतिरक्षा को दबाने का काम करते हैं। ट्यूमर का वातावरण कई तरह की कोशिकाओं से भरा एक जटिल क्षेत्र होता है, इसलिए यह तंत्र नैनोकणों को न केवल शरीर के सही हिस्से में पहुंचाता है, बल्कि उसी क्षेत्र के उन मैक्रोफेज में भी भेजता है जिन्हें रीप्रोग्राम करने की आवश्यकता होती है।
दवा संयोजन और प्रयोगशाला परीक्षण के परिणाम
नैनोकणों में केवल एमआरएनए ही नहीं, बल्कि रेसिमोड नामक एक दवा भी शामिल की गई, जो कुछ विशेष इम्यून मार्गों को सक्रिय करने की क्षमता रखती है। शुरुआती प्रयोगशाला परीक्षणों में बेहद सकारात्मक नतीजे देखे गए। जो मैक्रोफेज पहले पूरी तरह सुस्त थे, उन्होंने सीएक्ससीएल9 का उत्पादन शुरू कर दिया। इसके अतिरिक्त सक्रिय प्रतिरक्षा स्थिति के अन्य मार्करों में भी भारी उछाल आया, जहां एनओएस2 की अभिव्यक्ति 89.5 गुना तक बढ़ गई। साथ ही, प्रतिरक्षा को दबाने वाले संकेतों में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।
इसके बाद आक्रामक स्तन कैंसर से पीड़ित चूहों पर इन स्मार्ट नैनोकणों का परीक्षण किया गया। तीन खुराक दिए जाने के बाद ट्यूमर के बढ़ने की गति धीमी पड़ गई। इन चूहों में सीएक्ससीएल9 की सांद्रता नियंत्रण समूह की तुलना में लगभग चार गुना अधिक पाई गई, और शोधकर्ताओं ने सक्रिय टी कोशिकाओं की उपस्थिति भी दर्ज की। इस उपचार से इम्यूनोसप्रेसिव विशेषताओं वाले मैक्रोफेज के अनुपात में 63 प्रतिशत की कमी आई।
संयुक्त इम्यूनोथेरेपी और भविष्य की दिशा
कैंसर के उपचार में विभिन्न दिशाओं से ट्यूमर पर प्रहार करने के लिए अक्सर कई दवाओं का मेल किया जाता है। वैज्ञानिकों ने इस नई तकनीक का परीक्षण पहले से उपयोग की जा रही दो प्रकार की इम्यून चेकपॉइंट इनहिबिटर दवाओं के साथ भी किया। हालांकि इस संयुक्त विधि ने ट्यूमर के आकार को अतिरिक्त रूप से छोटा नहीं किया, लेकिन इसने प्रतिरक्षा प्रणाली में महत्वपूर्ण बदलाव जरूर पैदा किए। ट्यूमर और उसके पास के लिम्फ नोड्स के भीतर विभिन्न प्रकार की टी कोशिकाओं की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई, जिससे भविष्य में दीर्घकालिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया मिलने की संभावना मजबूत होती है।
इस पूरे प्रयोग के दौरान शोधकर्ताओं को चूहों के अन्य आंतरिक अंगों पर कोई नकारात्मक असर देखने को नहीं मिला। प्रोफेसर चुनक्सिया झाओ ने बताया कि यह एक महत्वपूर्ण प्रमाण है कि ट्यूमर के प्रतिरक्षा वातावरण को फिर से सक्रिय करने के लिए एमआरएनए और नैनोकण तकनीक का उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इंसानों पर इसका परीक्षण शुरू करने से पहले सुरक्षा की पूरी तरह जांच करने के लिए अभी काफी शोध की आवश्यकता है।



















