इंटरनेट के दौर में प्राचीन अवशेषों की अवैध खरीदारी ने एक भयानक स्वास्थ्य संकट को जन्म दे दिया है। प्राचीन मिस्र यानी इजिप्ट की ममी और सदियों पुराने इंसानी अवशेषों के साथ जुड़ा जानलेवा खतरा अब सीधे लोगों के घरों और डाक थैलों तक पहुंच रहा है। अंतरराष्ट्रीय अकादमिक शोध पत्रिका इंटरनेशनल जर्नल ऑफ Cultural Property में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन ने चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया नीलामी और ई-कॉमर्स साइटों पर बेचे जा रहे ममीकृत शरीर के हिस्से एक बहुत बड़े जैविक खतरे यानी बायोहाज़र्ड का रूप ले चुके हैं। साधारण पैकेजिंग में भेजे जा रहे ये पार्सल न केवल इन्हें खरीदने वाले शौकीनों बल्कि रास्ते में इन्हें पहुंचाने वाले कूरियर एजेंटों, डाक कर्मचारियों और कस्टम अधिकारियों के लिए भी सीधे तौर पर प्राणघातक साबित हो रहे हैं।
बिना ग्लव्स के हैंडलिंग और काले बाजार में धड़ल्ले से बिक्री
इस बहुराष्ट्रीय शोध में शामिल वैज्ञानिकों ने इंटरनेट पर मौजूद 128 ऐसी लिस्टिंग्स और ऑक्शन पोस्ट का बारीकी से अध्ययन किया, जिनमें इंसानी ममी और प्राचीन शरीर के अंगों को सरेआम बेचा जा रहा था। जांच के दौरान जो आंकड़े सामने आए, वे सुरक्षा मानकों की धज्जियां उड़ाने वाले हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि इंसानी शरीर के कटे हुए हाथ और पैर इस अवैध बाजार में सबसे ज्यादा खरीदे और बेचे जा रहे हैं। इसके अलावा कुल लिस्टिंग्स में से आधे से अधिक मामलों में सुखाकर या रासायनिक प्रक्रिया से संरक्षित की गई इंसानी खोपड़ियां और कटे हुए सिर शामिल थे।
सबसे गंभीर बात यह पाई गई कि इन अवशेषों को बेचने वाले तस्कर बिना किसी दस्ताने या पीपीई किट के नंगे हाथों से इन ममीकृत अंगों को छू रहे थे और तस्वीरें खींचकर ऑनलाइन पोस्ट कर रहे थे। वैज्ञानिकों का कहना है कि भले ही कोई इंसानी अवशेष बाहर से सूखा और साफ दिखाई दे, लेकिन उसके अंदर सूक्ष्म जीवाणु और जानलेवा फंगस बेहद सक्रिय अवस्था में छिपे हो सकते हैं। बिना किसी दृश्य लक्षण के भी यह प्राचीन अवशेष घर के अंदर जहरीली हवा फैलाकर इंसानी फेफड़ों को पूरी तरह तबाह कर सकता है।
डाक कर्मचारियों और कूरियर एजेंटों की सुरक्षा पर भारी संकट
शोध की मुख्य शोधकर्ता और स्टाफोर्डशायर यूनिवर्सिटी में ह्यूमन बायोआर्कियोलॉजी की प्रोफेसर डॉ कर्स्टी स्क्वायर्स ने बताया कि सोशल मीडिया की सुलभता के कारण ममीकृत अवशेषों का अंतरराष्ट्रीय काला बाजार बहुत तेजी से फैला है। विक्रेता केवल मुनाफा कमाने की होड़ में अंतरराष्ट्रीय पोस्मटल नियमों और जैविक सुरक्षा मानकों का पूरी तरह से उल्लंघन कर रहे हैं। इन संवेदनशील जैविक अवशेषों को किसी सीलबंद, वायुरोधी या विशेष बायोलॉजिकल सुरक्षा कंटेनर के बिना साधारण कागज और प्लास्टिक के डिब्बों में पैक करके देश-विदेश में भेजा जा रहा है।
प्रोफेसर डॉ कर्स्टी स्क्वायर्स के अनुसार जब इन अवशेषों को सामान्य पार्सल सेवा से भेजा जाता है, तो अनजाने में इन्हें उठाने वाले कूरियर बॉयज, डिलीवरी एजेंटों और सीमा पर तैनात कस्टम अधिकारियों की सुरक्षा गंभीर खतरे में पड़ जाती है। इन कर्मचारियों को इस बात का जरा भी अंदाजा नहीं होता कि जिस बक्से को वे छू रहे हैं या परिवहन में इस्तेमाल कर रहे हैं, उसमें से निकलने वाले सूक्ष्म फंगल बीजाणु उनकी सांसों के जरिए शरीर में प्रवेश कर उन्हें जानलेवा बीमारी का शिकार बना सकते हैं।
इतिहास में दर्ज ममी फंगस से हुई मौतों के भयानक उदाहरण
ममीकृत बॉडी पार्ट्स से निकलने वाले फंगल बीजाणु कितने घातक हो सकते हैं, इसका ऐतिहासिक प्रमाण पहले भी कई बार दर्ज किया जा चुका है। ममी और प्राचीन मकबरों को खोलने के बाद जान गंवाने वाले वैज्ञानिकों के कई मामले सामने आ चुके हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये फंगल बीजाणु जिन्हें एस्परजिलस कहा जाता है, बंद बक्सों या मिट्टी के नीचे सैकड़ों और हजारों सालों तक निष्क्रिय पड़े रह सकते हैं। जैसे ही इन अवशेषों को हिलाया-डुलाया या खोला जाता है, ये स्पोर्स तुरंत हवा में तैरने लगते हैं और फेफड़ों के अंदर जाकर गंभीर इंफेक्शन पैदा करते हैं।
- राजा कैसिमिर IV का मकबरा: वर्ष 1970 के दशक में पोलैंड के शहर क्राकोव में राजा कैसिमिर IV जेगियेलन के ऐतिहासिक मकबरे को शोध कार्य के लिए खोला गया था। उस समय मकबरे के भीतर जाकर अध्ययन करने वाले 12 प्रमुख वैज्ञानिकों में से 10 की कुछ ही समय में दर्दनाक मौत हो गई थी। बाद में जांच में पता चला कि उनकी मौत एस्परजिलस फंगस के बीजाणुओं को सांस के साथ अंदर खींचने से हुई थी।
- तुतनखामुन का मकबरा और लॉर्ड कार्नारवॉन: मिस्र के विश्व प्रसिद्ध राजा तुतनखामुन के मकबरे की खोज करने वाले लॉर्ड कार्नारवॉन की अचानक हुई रहस्यमयी मौत का कारण भी इसी एस्परजिलस फंगल संक्रमण को माना जाता है।
प्राचीन विषैले रसायन और अंतरराष्ट्रीय नियमों को सख्त करने की मांग
जैविक पैथोजन और घातक फंगस के अलावा इन प्राचीन अवशेषों में रासायनिक जहर भी भारी मात्रा में मौजूद होता है। प्राचीन मिस्र में शवों को सड़ने से बचाने और ममी बनाने के लिए आर्सेनिक, पारा (मरकरी) और लेड (शीशा) जैसे बेहद जहरीले भारी धातुओं और रसायनों का लेप किया जाता था। ये खतरनाक रसायन हजारों साल बीत जाने के बाद भी अवशेषों में पूरी तरह मौजूद रहते हैं और इन्हें नंगे हाथों से छूने या हवा में संपर्क में आने पर इंसानी शरीर में जहर घोल सकते हैं।
इस विस्तृत अध्ययन में स्टाफोर्डशायर यूनिवर्सिटी के साथ-साथ विल्नियस यूनिवर्सिटी, सालेन्टो यूनिवर्सिटी, मेसिना यूनिवर्सिटी और एडिलेड यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की टीम शामिल थी। वैज्ञानिकों के इस संयुक्त दल ने ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों, सोशल मीडिया कंपनियों, वैश्विक कूरियर प्रदाताओं और अंतरराष्ट्रीय कस्टम विभागों से इस अवैध और असुरक्षित बाजार पर तुरंत पूर्ण प्रतिबंध लगाने और सख्त निगरानी प्रणाली लागू करने का आग्रह किया है। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जब तक इस काले कारोबार पर कड़ी कानूनी नकेल नहीं कसी जाती, तब तक आम नागरिकों को भी सतर्क रहना होगा और इंटरनेट पर इंसानी अंगों की बिक्री दिखते ही तुरंत कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सूचित करना होगा।



















