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IIT गुवाहाटी का बड़ा आविष्कार, पानी से किफ़ायती ग्रीन हाइड्रोजन बनाने की तकनीक विकसितविज्ञान
14 अग॰ 2026, 6:26 pm (3 घंटे पहले)· 0

IIT गुवाहाटी का बड़ा आविष्कार, पानी से किफ़ायती ग्रीन हाइड्रोजन बनाने की तकनीक विकसित

IIT गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने निकल सॉल्ट का इस्तेमाल कर बेहद सस्ती और टिकाऊ कैटलिस्ट सामग्री बनाई है, जो पानी से ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की लागत को काफी कम कर सकती है।

IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने ऊर्जा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रगति करते हुए पानी से ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करने के लिए एक किफ़ायती और प्रभावी कैटलिस्ट विकसित किया है। वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई यह नई तकनीक पानी को बांटकर स्वच्छ हाइड्रोजन ईंधन बनाने की प्रक्रिया को आसान और किफ़ायती बना सकती है। यह उपलब्धि भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को नई गति देने के साथ वैश्विक स्तर पर पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा परिवर्तन को भी मजबूती प्रदान करेगी। जब हाइड्रोजन को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है तो उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी बाहर निकलता है, जिससे पारंपरिक पेट्रोलियम और जीवाश्म ईंधनों की तरह जहरीले उत्सर्जन और प्रदूषण का जोखिम पूरी तरह समाप्त हो जाता है। लंबे समय से वैज्ञानिक एक ऐसे सस्ते विकल्प की तलाश में थे जो व्यापक औद्योगिक पैमाने पर हाइड्रोजन उत्पादन को व्यावहारिक बना सके।

हाइड्रोजन की मांग और वर्तमान उत्पादन पद्धतियों की सीमाएं

वर्तमान समय में हाइड्रोजन का व्यापक उपयोग फ्यूल सेल्स में बिजली उत्पन्न करने तथा फर्टिलाइजर्स के निर्माण जैसे विभिन्न औद्योगिक कार्यों में किया जाता है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में लगभग 90 से 95 प्रतिशत हाइड्रोजन का उत्पादन जीवाश्म ईंधनों की सहायता से किया जाता है। प्राकृतिक गैस के जरिए ‘ग्रे’ और ‘ब्लू’ हाइड्रोजन का निर्माण होता है, जबकि कोयले की मदद से ‘ब्राउन’ और ‘ब्लैक’ हाइड्रोजन तैयार की जाती है। इन पारंपरिक प्रक्रियाओं के दौरान भारी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, जिससे हाइड्रोजन के इस्तेमाल से मिलने वाला पर्यावरणीय लाभ निष्प्रभावी हो जाता है।

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स्वच्छ हाइड्रोजन उत्पादन के लिए पानी सबसे उपयुक्त और प्राकृतिक स्रोत है। इलेक्ट्रोलिसिस विधि द्वारा पानी के अणुओं से हाइड्रोजन को अलग करने के लिए कुशल कैटलिस्ट की आवश्यकता होती है। अब तक उपलब्ध सबसे प्रभावी कैटलिस्ट इरिडियम और रुथेनियम जैसे अत्यंत महंगे नोबल मेटल्स से बनाए जाते हैं। इन धातुओं की अत्यधिक लागत और सीमित उपलब्धता के कारण बड़े पैमाने पर ग्रीन हाइड्रोजन का व्यावसायिक उत्पादन चुनौतीपूर्ण बना हुआ था।

निकल सॉल्ट और एन्थ्रेसीन मॉलिक्यूल का नवीन संयोजन

इस आर्थिक और तकनीकी चुनौती का समाधान निकालने के लिए IIT गुवाहाटी की टीम ने एक अनूठा तरीका अपनाया। शोधकर्ताओं ने महंगे नोबल मेटल्स के स्थान पर सस्ते और बाजार में आसानी से मिलने वाले निकल सॉल्ट का उपयोग किया। चूंकि केवल निकल सॉल्ट से हाइड्रोजन का उत्पादन पर्याप्त दक्षता और स्थिरता के साथ नहीं हो पाता, इसलिए टीम ने इसे एन्थ्रेसीन-बेस्ड ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल के साथ संयोजित किया।

इस वैज्ञानिक अध्ययन का नेतृत्व करने वाले एसोसिएट प्रोफेसर अक्शई कुमार ने जानकारी दी कि टीम ने कोऑर्डिनेशन पॉलीमर आधारित कैटलिस्ट को कमरे के तापमान पर ही सिंथेसाइज करने में सफलता प्राप्त की। इस प्रक्रिया को कुशलतापूर्वक संपन्न करने के लिए शोधकर्ताओं ने विशेष प्रकार की अल्ट्रासोनिक तरंगों का उपयोग किया।

3D नेटवर्क संरचना और 88 प्रतिशत ऊर्जा दक्षता

इस नवविकसित कैटलिस्ट सामग्री में धातु के परमाणु ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल्स के साथ मजबूती से जुड़कर एक विस्तृत त्रिविमीय (3D) नेटवर्क का निर्माण करते हैं। यह खास संरचना हाइड्रोजन इवोल्यूशन रिएक्शन के लिए उच्च घनत्व वाले सक्रिय स्थल प्रदान करती है और सामग्री के भीतर इलेक्ट्रॉन परिवहन को अत्यधिक तीव्र बनाती है। इस अध्ययन के निष्कर्ष प्रतिष्ठित वैज्ञानिक प्रकाशन ‘जर्नल ऑफ मटेरियल्स केमिस्ट्री ए’ में प्रकाशित हुए हैं।

प्रयोगशाला परीक्षणों के दौरान यह नया कैटलिस्ट दीर्घकालिक संचालन में भी असाधारण रूप से स्थिर साबित हुआ। शोधकर्ताओं के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि प्रक्रिया के दौरान आपूर्ति की गई इलेक्ट्रिकल एनर्जी का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा सीधे पानी के अणुओं को विभाजित करने में इस्तेमाल हुआ। इतनी न्यूनतम ऊर्जा बर्बादी बड़े पैमाने पर औद्योगिक हाइड्रोजन उत्पादन के लिए अनिवार्य मानी जाती है। रासायनिक विश्लेषण और गणितीय मॉडलिंग के माध्यम से शोधकर्ताओं ने पाया कि निकल परमाणुओं और एन्थ्रेसीन मोइटी के 3D नेटवर्क ने ही इस कैटलिस्ट को इतना प्रभावी और किफ़ायती बनाया है।

भारत के ग्रीन ऊर्जा लक्ष्यों पर दूरगामी प्रभाव

IIT गुवाहाटी की यह खोज देश को पारंपरिक पेट्रोलियम ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद करेगी। सस्ते कैटलिस्ट के आने से हरित हाइड्रोजन की उत्पादन लागत में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे भारी उद्योगों और भविष्य के परिवहन क्षेत्र के लिए ग्रीन हाइड्रोजन अपनाना आसान हो जाएगा। यह नवाचार वैश्विक ऊर्जा संकट से निपटने और स्वच्छ भविष्य की ओर बढ़ने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।

सवाल-जवाब

IIT गुवाहाटी ने क्या नई खोज की है?
IIT गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने निकल सॉल्ट और एन्थ्रेसीन ऑर्गेनिक मॉलिक्यूल से पानी से ग्रीन हाइड्रोजन बनाने वाला एक सस्ता और टिकाऊ कैटलिस्ट विकसित किया है।
वर्तमान में हाइड्रोजन बनाने में क्या मुख्य समस्या है?
वर्तमान में 90 से 95 प्रतिशत हाइड्रोजन का उत्पादन जीवाश्म ईंधनों (प्राकृतिक गैस और कोयला) से होता है, जिससे भारी प्रदूषण होता है और पानी से हाइड्रोजन बनाने वाले पुराने कैटलिस्ट अत्यधिक महंगे नोबल मेटल्स से बनते थे।
इस नए कैटलिस्ट की ऊर्जा दक्षता कितनी है?
इस नए कैटलिस्ट की प्रयोग में लगभग 88 प्रतिशत इलेक्ट्रिकल एनर्जी सीधे पानी को विभाजित करने में इस्तेमाल होती है, जिससे ऊर्जा की बर्बादी बहुत कम होती है।
इस शोध का नेतृत्व किसने किया है?
इस शोध का नेतृत्व IIT गुवाहाटी के एसोसिएट प्रोफेसर अक्शई कुमार और उनकी टीम ने किया है।
यह शोध किस जर्नल में प्रकाशित हुआ है?
यह अध्ययन प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका 'जर्नल ऑफ मटेरियल्स केमिस्ट्री ए' में प्रकाशित हुआ है।
ग्रीन हाइड्रोजन से पर्यावरण को क्या फायदा होता है?
ग्रीन हाइड्रोजन का इस्तेमाल जब ईंधन के रूप में होता है तो कोई हानिकारक गैस नहीं निकलती, उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी बाहर आता है।
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