जिस हफ्ते को लंदन ने जलवायु परिवर्तन पर मंथन करने के लिए तय किया था, वही हफ्ता खुद बेकाबू गर्मी की चपेट में आ गया। मंगलवार को मुख्य भाषण देते हुए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने तंज भरे अंदाज में कहा, “लंदन सिर्फ पुकार नहीं रहा, यह तो उबल रहा है।” उनकी यह बात मजाक नहीं, बल्कि हकीकत बनती जा रही है।
ब्रिटेन के मौसम विभाग का अनुमान है कि बुधवार को तापमान 39 डिग्री सेल्सियस (102 डिग्री फारेनहाइट) तक पहुंच सकता है। यह आंकड़ा जून के अब तक के रिकॉर्ड को तोड़ देगा और देश में अब तक दर्ज सबसे ज्यादा तापमान के बेहद करीब पहुंच जाएगा। यह संकट सिर्फ ब्रिटेन तक सीमित नहीं है। पूरे यूरोप में जानलेवा लू फैल चुकी है, कई देशों में स्कूल और परमाणु संयंत्र बंद किए जा रहे हैं, और रेल कंपनियां पटरियों को ज्यादा गर्म होने से बचाने के लिए ट्रेनों की रफ्तार और संख्या घटा रही हैं।
यूरोप पर मंडराता ‘हीट डोम’
इस वक्त पूरा यूरोप धीमी गति से चल रहे उच्च दबाव वाली हवा के एक बड़े दायरे में घिरा हुआ है। यह गर्म हवा को ऐसे कैद कर लेता है जैसे किसी बर्तन पर ढक्कन रख दिया गया हो, और एक ‘हीट डोम’ यानी गर्मी का गुंबद बना देता है। यह गुंबद बादल और बारिश जैसे दूसरे मौसमी सिस्टम को आगे बढ़ने से रोक देता है। हवा लगातार और गर्म होती जाती है, जमीन भी तपती है, उसकी नमी सूख जाती है और वह और जल्दी गर्म होने लगती है। ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से शुरुआती तापमान पहले से ही ऊंचा है, जिसने इस पूरे असर को और तीखा कर दिया है।
गर्मी से बचने पर हुई बैठकें, गर्मी ने ही रद्द कराईं
मंगलवार को लंदन में आयोजकों को भीषण गर्मी पर होने वाला एक कार्यक्रम इसलिए रद्द करना पड़ा क्योंकि जिस लाइब्रेरी में यह होना था, वहां एयर कंडीशनिंग ही नहीं है। मेजबान ज्यूरिख क्लाइमेट रेजिलिएंस अलायंस का कहना है कि अंदर का “बेहद असहज” माहौल और कार्यक्रम स्थल तक की गर्म यात्रा वक्ताओं और मेहमानों की सेहत के लिए खतरा बन सकती थी। उधर अर्थवॉच यूरोप ने हैमरस्मिथ पार्क में परिवारों के लिए स्थानीय वन्यजीवों को देखने वाले कार्यक्रम भी रद्द कर दिए। संस्था ने फेसबुक पर लिखा कि यह “ऐसा मोड़ है जो कोई नहीं चाहता था, लेकिन इसकी विडंबना हर कोई समझ सकता है।”
नौ दिन तक चलने वाले इस आयोजन में 1,000 से ज्यादा कार्यक्रमों के जरिए करीब 75,000 लोगों के जुटने की उम्मीद थी। लेकिन गर्मी से जुड़ी सेहत की चिंताओं की वजह से कई लोगों ने दूर रहने का फैसला किया। ज्यादातर शहरों की तरह लंदन भी ग्रामीण इलाकों के मुकाबले कहीं ज्यादा गर्मी सोखता है, क्योंकि यहां कंक्रीट और तारकोल जैसी गर्मी सोखने वाली चीजें बहुत ज्यादा हैं और ठंडक देने वाली हरियाली बहुत कम।
सेहत के डर से दूरी बना रहे लोग
क्लाइमेट मेजॉरिटी प्रोजेक्ट के सह-निदेशक रूपर्ट रीड ने इस आयोजन के लिए लंदन न जाने का फैसला किया, क्योंकि उन्हें दिल की बीमारी है जो गर्मी से और बिगड़ सकती है। उनकी संस्था ने अपने कार्यक्रम ऑनलाइन कर दिए। रीड कहते हैं, “यह यकीन करना मुश्किल है कि नौबत यहां तक आ गई है।” वे आगे जोड़ते हैं कि लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक “एक बहुत ही वास्तविक खतरे के साये में” आगे बढ़ेगा, “क्योंकि आज की सच्चाई यही है। यह जलवायु के टूटने का जीता-जागता उदाहरण है।”
ब्रिटेन सरकार ने चेतावनी दी है कि यह लू सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी बोझ डालेगी और बीमारी, यहां तक कि मौत का खतरा भी बढ़ाएगी। पिछले साल देशभर में गर्मी से जुड़ी 1,500 से ज्यादा मौतें दर्ज की गई थीं, जिनमें सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों पर रहा।
अपनी खुद की पर्यावरण और जन-स्वास्थ्य कंसल्टेंसी चलाने वालीं और लंदन के बाहर रहने वालीं शार्लोट बेकर ने भी इस हफ्ते शहरों को रहने लायक बनाने पर होने वाले एक सम्मेलन में जाने का इरादा छोड़ दिया। उन्हें गंभीर अस्थमा है, जो परागकणों और वायु प्रदूषण से भड़क उठता है। तीन साल पहले तेज गर्मी में अस्थमा के दौरे की वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था, और रुकी हुई गर्म हवा वायु प्रदूषण को कैद कर लेगी, ऐसे पूर्वानुमान के बीच वे वही हालात दोबारा नहीं झेलना चाहतीं। बेकर कहती हैं, “मुझे सचमुच बहुत दुख है। सेहत से जूझ रहे लोगों के लिए यह बेहद कठिन फैसला होता है, खासकर तब जब लगे कि आप नेटवर्किंग या काम के मौके गंवा रहे हैं।”
गर्मी के आगे लड़खड़ाता परिवहन
ट्रेन कंपनियों ने जरूरी यात्रा के अलावा बाकी सभी सफर टालने की सलाह दी है और बाधाओं की चेतावनी दी है, क्योंकि गर्मी से बिजली की ऊपरी लाइनें ढीली पड़ सकती हैं, स्टील की पटरियां मुड़ सकती हैं और सिग्नल सिस्टम ठप हो सकता है। मंगलवार सुबह ही लंदन की कई लाइनों पर रात भर हुई आंधी-तूफान के पानी से दिक्कतें आ रही थीं। यह तूफान भी उसी हीट डोम की देन था, जिसकी वजह से तापमान आसमान छू रहा है।
अपना संचार कारोबार चलाने वाले रस एवरी को याद है कि पिछली किसी लू के दौरान वे बिना चालू एयर कंडीशनिंग वाली खचाखच भरी ट्रेन में फंस गए थे। ब्लूमबर्ग के पिछले साल के एक विश्लेषण में पाया गया था कि लंदन की ट्यूब के डिब्बे बाहर की हवा से 5 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा गर्म हो सकते हैं। एवरी कहते हैं, “वह सचमुच बहुत डरावना था।” वही हालात दोबारा नहीं झेलना चाहते एवरी ने हफ्ते के सबसे बड़े कार्यक्रम में न जाने का फैसला किया, जबकि वहां नए ग्राहक बनाने और पुराने ग्राहकों से मिलने का मौका था जिनसे वे शायद ही कभी आमने-सामने मिल पाते हैं। वे कहते हैं, “सब जानते हैं कि इतने तापमान में ट्यूब कितनी भयानक हो जाती है और वहां कुछ भी गड़बड़ हो सकती है।”
अपनी गाड़ी वाले भी नहीं बच पा रहे
जिनके पास अपनी गाड़ी है, वे भी इस गर्मी में बुनियादी ढांचे के टिके रहने का भरोसा नहीं कर रहे। माय ग्रीन पेंशन की संस्थापक क्लेयर बिशप ने साउथ वेस्ट इंग्लैंड के ब्रिस्टल से अपनी इलेक्ट्रिक गाड़ी में ढाई घंटे का सफर तय कर आने की योजना बनाई थी, ताकि कारोबार के नए मौके मिल सकें। वे मुख्य आयोजन में बूथ, बैनर, पर्चे और पार्किंग की जगह तक के पैसे चुका चुकी थीं। लेकिन गर्मी में हाईवे पर फंसने और सड़कों की सतह के पिघलकर चिपचिपी हो जाने की आशंका से उन्होंने सब रद्द कर दिया। गर्मी के चलते स्कूल बंद होने से बिशप को बच्चों की देखभाल का इंतजाम भी देखना है। वे कहती हैं, “ये सारी अनिश्चितताएं ही थीं, जिनकी वजह से मुझे सोचना पड़ा कि क्या इतना जोखिम उठाना सही है।”
तेज चार्जिंग केंद्रों की कमी का मतलब है कि केटी ग्लेज़ अपनी इलेक्ट्रिक गाड़ी से लंदन तक कई बार रुके बिना नहीं पहुंच पातीं। वे कहती हैं, “हंसी आती है, बस।” बुनियादी ढांचा सलाहकार कंपनी ब्रूकबैंक्स में टिकाऊपन की निदेशक ग्लेज़ ने परिवहन की दिक्कतों के चलते इमारतों को अत्यधिक जलवायु के अनुकूल बनाने पर होने वाले करीब नौ सत्रों से खुद को अलग कर लिया। उनके लिए इस आयोजन से चूकने का मतलब “कमाई का नुकसान” है, क्योंकि उन्होंने डेवलपरों और एक ग्राहक के साथ बैठकें तय कर रखी थीं। वे कहती हैं, “विडंबना यह है कि जिन सम्मेलनों में मैं जाने वाली थी, उनमें चर्चा का विषय ठीक वही है जो अभी हो रहा है। यह सब भविष्य की सोच पर टिका है, लेकिन हालात तो अभी सामने हैं और हम उन्हें उतनी तेजी से नहीं संभाल पा रहे।” ग्लेज़ आखिर में कहती हैं, “हमने जलवायु परिवर्तन और उस पर कार्रवाई की बातें करने में बहुत वक्त गंवा दिया, लेकिन आज का दिन इसकी बेहतरीन मिसाल है कि हम कितनी बुरी तरह नाकाम रहे। हमने जलवायु परिवर्तन से वक्त रहते नहीं निपटा। सच्चाई सामने खड़ी है और हम तैयार नहीं हैं।”













