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काइंड्रेड कंपेनियन साइंसेस ने CRISPR तकनीक से बनाए दुनिया के पहले एलर्जी-फ्री बीगल कुत्तेविज्ञान
5 अग॰ 2026, 4:59 pm (2 दिन पहले)· 2

काइंड्रेड कंपेनियन साइंसेस ने CRISPR तकनीक से बनाए दुनिया के पहले एलर्जी-फ्री बीगल कुत्ते

बायोटेक फर्म काइंड्रेड कंपेनियन साइंसेस ने CRISPR जीन एडिटिंग और क्लोनिंग तकनीक का उपयोग करके बेली और एल्फी नाम के दो ऐसे बीगल पिल्ले तैयार किए हैं, जिनमें एलर्जी पैदा करने वाला प्रमुख कैन एफ 1 प्रोटीन पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।

कुत्तों की संगति का आनंद लेने की प्रबल इच्छा और खुद एलर्जी से पीड़ित होने की चुनौती ने एक वैज्ञानिक अनुसंधान को क्रांतिकारी मोड़ दे दिया। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में स्नातक और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में रिसर्च एसोसिएट के रूप में कार्य करते समय वॉकर ने नोबेल पुरस्कार विजेता CRISPR जीन एडिटिंग तकनीक का अध्ययन किया। उन्होंने विचार किया कि क्या जीन संपादन का उपयोग करके ऐसे कुत्ते तैयार किए जा सकते हैं जो मनुष्यों में किसी भी प्रकार की एलर्जी न फैलाएं। इसी सोच के परिणामस्वरूप दो बीगल पिल्लों का जन्म हुआ, जिनका नाम बेली और एल्फी रखा गया है। ये दोनों पिल्ले सामान्य कुत्तों की तरह ही चंचल और समझदार हैं, लेकिन उनके शरीर में वह प्रोटीन पूरी तरह गायब है जो इंसानों में छींक और एलर्जी का कारण बनता है। यह सफलता बायोटेक कंपनी काइंड्रेड कंपेनियन साइंसेस का परिणाम है, जिसकी स्थापना वॉकर ने वर्ष 2020 में की थी और हाल ही में कंपनी ने अपने इस नए शोध को सार्वजनिक किया है।

जीन एडिटिंग के जरिए एलर्जी पैदा करने वाले प्रोटीन को हटाया गया

बुधवार को द क्रिस्पर जर्नल में प्रकाशित एक वैज्ञानिक शोध पत्र में वॉकर और उनके सहयोगियों ने विस्तार से बताया कि उन्होंने किस प्रकार जीन एडिटिंग के माध्यम से कुत्तों से एलर्जी पैदा करने वाले मुख्य प्रोटीन को हटाया। कुत्तों से एलर्जी का शिकार होने वाले अधिकांश लोगों के लिए कैन एफ 1 नामक प्रोटीन जिम्मेदार होता है, जो जानवरों की रूसी, बालों और लार में पाया जाता है। यह प्रोटीन एलर्जी से ग्रस्त 50 प्रतिशत से अधिक लोगों में नकारात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यद्यपि कुत्तों में अन्य कैन एफ प्रोटीन भी मौजूद होते हैं, लेकिन कैन एफ 1 सबसे प्रमुख कारक है। पूर्व अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि जिन नस्लों को हाइपोएलर्जेनिक या एलर्जी-रहित माना जाता है, उनमें भी सामान्य कुत्तों की तुलना में कैन एफ 1 का स्तर बराबर या उससे भी अधिक होता है। इसी तथ्य ने शोधकर्ताओं को प्रेरित किया कि वे किसी बाहरी इलाज के बजाय सीधे स्रोत पर जाकर इस प्रोटीन का उत्पादन करने वाले जीन को ही समाप्त कर दें।

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CRISPR तकनीक और सोमेटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर की प्रक्रिया

काइंड्रेड कंपेनियन साइंसेस की टीम ने एक मादा बीगल की त्वचा कोशिकाओं से कैन एफ 1 प्रोटीन बनाने वाले जीन को हटाने के लिए CRISPR तकनीक का इस्तेमाल किया। इसके बाद उन्होंने क्लोनिंग की सोमेटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर पद्धति को अपनाया, जिसके तहत संपादित कोशिकाओं के नाभिक को दाता बीगल कुत्तों के अंडों में प्रत्यारोपित किया गया। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से कुल 25 जीन-संपादित भ्रूण तैयार किए गए, जिन्हें एक सरोगेट मादा कुत्ते के गर्भाशय में स्थानांतरित किया गया। इनमें से दो भ्रूण पूर्ण रूप से विकसित हुए, जिससे दो स्वस्थ पिल्लों बेली और एल्फी का जन्म हुआ।

कड़े प्रयोगशाला परीक्षण और 18 महीने का व्यावहारिक अनुभव

जन्म के समय दोनों पिल्लों का वजन सामान्य था और उनमें कोई जन्मजात शारीरिक असामान्यता नहीं पाई गई। हालांकि, वैज्ञानिकों के लिए यह सुनिश्चित करना आवश्यक था कि क्या एलर्जी पैदा करने वाला प्रोटीन वास्तव में समाप्त हो चुका है। इसके लिए सबसे पहले कुत्तों के डीएनए का अनुक्रमण यानी डीएनए सीक्वेंसिंग किया गया, जिससे यह पुष्टि हुई कि जीन में वांछित बदलाव सफलता पूर्वक हो चुका है। इसके पश्चात बेली और एल्फी की लार और डैंडर के नमूने एकत्र करके उनमें कैन एफ 1 प्रोटीन की जांच की गई। प्रयोगशाला परीक्षणों में किसी भी प्रकार के कैन एफ 1 प्रोटीन का पता नहीं चला, जबकि सामान्य बीगल, पूडल और गोल्डन डूडल जैसे बिना संपादन वाले कुत्तों के नमूनों में इस प्रोटीन के स्पष्ट संकेत मिले। इसके अतिरिक्त, मानव त्वचा पर इसका प्रभाव जांचने के लिए वॉकर ने स्वयं स्किन प्रिक टेस्ट करवाया। इस परीक्षण में जब बिना बदलाव वाले कुत्ते का तरल नमूना त्वचा पर लगाया गया तो प्रतिक्रिया हुई, जबकि संपादित कुत्ते के नमूनों से त्वचा पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा। वास्तविक जीवन में परीक्षण के तहत वॉकर पिछले डेढ़ वर्ष यानी 18 महीने से बेली के साथ रह रहे हैं और उन्हें कभी किसी प्रकार की एलर्जी या आंख से पानी आने जैसी समस्या नहीं हुई। दूसरा पिल्ला एल्फी कंपनी के सह-संस्थापक निक गेविन के साथ रहता है।

सुरक्षा निगरानी, ऑफ-टारगेट एडिट्स और भविष्य की योजनाएं

बेली और एल्फी के स्वास्थ्य की निरंतर निगरानी के लिए उनका नियमित पशुचिकित्सकीय परीक्षण किया जा रहा है और यह प्रक्रिया उनके पूरे जीवनकाल तक जारी रहेगी। अनुसंधान टीम ने जीनोम में अवांछित बदलावों यानी ऑफ-टारगेट एडिट्स की भी गहन जांच की और पाया कि किसी अन्य स्थान पर कोई अवांछित म्यूटेशन नहीं हुआ है। यह पूरा पशु अनुसंधान लाइसेंस प्राप्त प्रयोगशालाओं में पशुचिकित्सकों की देखरेख में आयोजित किया गया। कंपनी ने प्रारंभिक प्रयोगों के लिए बीगल नस्ल का चयन इसलिए किया क्योंकि वैज्ञानिक अध्ययनों में इस नस्ल का उपयोग मानक के रूप में होता है। हालांकि, भविष्य में कंपनी की योजना अन्य नस्लों के अलावा एलर्जी-फ्री सर्विस डॉग्स विकसित करने की है। क्लोनिंग तकनीक से ऐसे संस्थापक जानवर तैयार करने का लक्ष्य है जिनका आपस में प्रजनन कराने पर पैदा होने वाले सभी पिल्ले स्वाभाविक रूप से एलर्जी-रहित होंगे। वॉकर ने अभी इस बात की कोई निश्चित समयसीमा साझा नहीं की है कि ये एलर्जी-मुक्त पिल्ले व्यावसायिक रूप से कब उपलब्ध होंगे।

अन्य वैज्ञानिक प्रयास, विशेषज्ञों की राय और नैतिक सीमाएं

जीन एडिटिंग के जरिए एलर्जी-मुक्त पालतू जानवर बनाने का यह पहला प्रयास नहीं है। कुछ वर्ष पूर्व वर्जीनिया स्थित इनबायो के शोधकर्ताओं ने बिल्लियों की कोशिकाओं में मुख्य एलर्जी कारक फेल डी 1 प्रोटीन को हटाने के लिए CRISPR के उपयोग पर अध्ययन प्रकाशित किया था, हालांकि उन्होंने जीवित बिल्ली का निर्माण नहीं किया। वर्ष 2024 में दक्षिण कोरिया के एक वैज्ञानिक समूह ने अलसिक नाम की एक ऐसी बिल्ली तैयार की जिसमें फेल डी 1 का स्तर बेहद कम पाया गया। यूसी बर्कले के जीन एडिटिंग विशेषज्ञ फ्योडोर अर्नाव ने काइंड्रेड के इस कार्य का समर्थन करते हुए कहा कि इंसानों की वास्तविक समस्याओं के समाधान के लिए जीन संपादन तकनीक का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुत्तों की ब्रीडिंग के कारण उत्पन्न स्वास्थ्य समस्याओं को ठीक करने में भी यह तकनीक सहायक हो सकती है। दूसरी ओर, काइंड्रेड कंपेनियन साइंसेस ने स्पष्ट किया है कि वे केवल दिखावे या सजावटी प्रयोगों के लिए जीन एडिटिंग का समर्थन नहीं करते। इसके विपरीत, टेक्सस स्थित एम्ब्रियो कॉर्पोरेशन जैसी कंपनियां अंधेरे में चमकने वाले खरगोश और काल्पनिक गेंडे तैयार करने के प्रयासों में जुटी हैं। वॉकर का कहना है कि बेली के उनके जीवन में आने से उनके दिन-प्रतिदिन के अनुभव में अपार खुशियां जुड़ गई हैं।

सवाल-जवाब

इन बीगल पिल्लों को एलर्जी-फ्री कैसे बनाया गया?
शोधकर्ताओं ने बीगल की त्वचा कोशिकाओं से एलर्जी पैदा करने वाले कैन एफ 1 प्रोटीन वाले जीन को CRISPR तकनीक से हटाया और फिर सोमेटिक सेल न्यूक्लियर ट्रांसफर तकनीक से पिल्लों को जन्म दिया।
कुत्तों से एलर्जी का मुख्य कारण क्या होता है?
कुत्तों की लार, बालों और रूसी यानी डैंडर में पाया जाने वाला कैन एफ 1 प्रोटीन इंसानों में एलर्जी का मुख्य कारण होता है।
क्या ये एलर्जी-फ्री कुत्ते अभी बाजार में खरीदने के लिए उपलब्ध हैं?
नहीं, कंपनी ने अभी इनके व्यावसायिक रूप से बाजार में उपलब्ध होने की कोई निश्चित समयसीमा घोषित नहीं की है।
क्या इन जीन-संपादित पिल्लों में कोई स्वास्थ्य समस्या या अवांछित जेनेटिक म्यूटेशन मिला?
परीक्षणों में पिल्लों का वजन और स्वास्थ्य पूरी तरह सामान्य पाया गया और डीएनए जांच में किसी भी प्रकार का ऑफ-टारगेट एडिट नहीं मिला।
क्या हाइपोएलर्जेनिक कुत्ते वास्तव में एलर्जी से मुक्त होते हैं?
अध्ययनों के अनुसार, हाइपोएलर्जेनिक मानी जाने वाली नस्लों में भी सामान्य कुत्तों के बराबर या उससे अधिक कैन एफ 1 प्रोटीन पाया जाता है।
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