ज्योतिष के अनुसार महिलाओं की दाईं आंख फड़कना क्यों माना जाता है अशुभ, जानें पुरुषों के लिए इसका उल्टा अर्थपानी में फंसी गाड़ी को स्टार्ट करने की गलती से रिजेक्ट हो सकता है इंश्योरेंस क्लेम, जानें सही तरीकाअमेरिकी डॉलर के मुकाबले पाउंड की तेज उछाल थमी, अब सीमित दायरे में कारोबार के आसारपश्चिमी कानपुर को मिली एयरपोर्ट जैसी सुविधा, पनकी धाम स्टेशन का पीएम मोदी करेंगे लोकार्पणयूरोप में छाएगा अंधेरा, भारत में नहीं दिखेगा 12 अगस्त का सूर्य ग्रहणराम मंदिर चोरी के डर से मथुरा में भी दान पेटियों पर कड़ी नजर, जानें कितने कैमरे और कितने घंटे चलती है गिनतीसौ साल पुराने तालाब को मिलेगा नया रूप, चित्रकूट में सज रहा पर्यटकों का ठिकानाराशिफल 18 जुलाई 2026: वृषभ-कर्क को मिलेगा धन लाभ, जानिए हर राशि का पूरा हालमुंबई से अहमदाबाद बुलेट ट्रेन: 2027 में दौड़ेगी भारतीय हाई-स्पीड ट्रेन, जापान की E10 के लिए 2030 के बाद तक इंतजारक्यूबेक के एक शख्स ने मैप ऐप में कैंपिंग रूट देखते हुए ढूंढ निकाला विशाल क्रेटर, उम्र निकली 39 करोड़ साल
क्यूबेक के एक शख्स ने मैप ऐप में कैंपिंग रूट देखते हुए ढूंढ निकाला विशाल क्रेटर, उम्र निकली 39 करोड़ सालविज्ञान
1 घंटे पहले· 1

क्यूबेक के एक शख्स ने मैप ऐप में कैंपिंग रूट देखते हुए ढूंढ निकाला विशाल क्रेटर, उम्र निकली 39 करोड़ साल

कनाडा के क्यूबेक में एक शौकिया एस्ट्रोनॉमर को गूगल मैप्स पर कैंपिंग का रास्ता खोजते वक्त 25 किलोमीटर चौड़ा एक अजीब गड्ढा दिखा, जो जांच में 39 करोड़ साल पुराना उल्कापिंड क्रेटर निकला.

जो लापोइंटे कैंपिंग के लिए रास्ता ढूंढ रहे थे, तभी उनकी नजर स्क्रीन पर एक अजीब चीज पर पड़ी, क्यूबेक के कोत-नॉर इलाके में लेक मार्सल के पास करीब 25 किलोमीटर चौड़ा एक लगभग गोल गड्ढा. 2024 में हुई यह इत्तेफाकिया खोज अब वैज्ञानिकों की पुष्टि के बाद 39 करोड़ साल पुराने असली उल्कापिंड क्रेटर में बदल चुकी है, और यह कनाडा में अब तक मिले सबसे बड़े क्रेटरों में गिना जा रहा है.

मैप पर दिखी गोल आकृति ने खींचा ध्यान

2024 में जो लापोइंटे, जो कि एक शौकिया एस्ट्रोनॉमर हैं, क्यूबेक के दूरदराज कोत-नॉर इलाके में कैंपिंग के रास्ते तलाश रहे थे. गूगल मैप्स पर स्क्रॉल करते हुए उन्हें लेक मार्सल के पास जमीन पर एक बड़ा और लगभग गोल निशान दिखा. यह करीब 25 किलोमीटर यानी लगभग 15.5 मील में फैला हुआ था. इसकी बनावट किसी झील, खाई या सामान्य कटाव जैसी बिल्कुल नहीं लग रही थी, यह इतना गोल और इतना बड़ा था कि इसे महज इत्तेफाक मानना मुश्किल था.

ये भी पढ़ें

लापोइंटे ने इसे सिर्फ एक स्क्रीनशॉट में दबाकर नहीं छोड़ा. उन्होंने इस बारे में उन लोगों से संपर्क किया जो इसकी असली वजह समझा सकें. उन्होंने फ्रेंच जियोफिजिसिस्ट पियरे रोशेट से बात की. रोशेट ने उस जगह की बनावट का अध्ययन करने के बाद एक दिलचस्प संभावना जताई, यह गड्ढा किसी बहुत पुराने उल्कापिंड के टकराने का निशान हो सकता है. एक आम इंसान की इसी नजर ने प्रोफेशनल वैज्ञानिकों को इस जगह की तरफ खींच लिया.

सच जानने के लिए वैज्ञानिकों को तय करना पड़ा मुश्किल सफर

सैटेलाइट तस्वीर चाहे जितनी भी दिलचस्प लगे, वह अकेले यह साबित नहीं कर सकती कि कोई जगह असल में उल्कापिंड क्रेटर है. इसके लिए किसी को मौके पर जाकर चट्टानों की जांच करनी होती है और सैंपल लैब तक पहुंचाने होते हैं. यह जिम्मेदारी वेस्टर्न यूनिवर्सिटी में प्लैनेटरी जियोलॉजी पढ़ाने वाले प्रोफेसर गॉर्डन ओसिंस्की ने उठाई. उन्होंने जियोलॉजिस्ट्स की एक टीम बनाई और अक्टूबर 2025 में इस दूरदराज जगह का दौरा किया.

यह सफर आसान नहीं था. ओसिंस्की ने इस अभियान के बारे में बेबाकी से बताया, “यह मेरे अब तक के सबसे मुश्किल अभियानों में से एक था. मैंने आर्कटिक और 6 महाद्वीपों में 25 अभियान किए हैं.” लेक मार्सल के आसपास का इलाका बेहद उबड़-खाबड़ था, चलना मुश्किल था, और टीम को रास्ते भर कीड़े-मकौड़ों का भी सामना करना पड़ा. इतनी मुश्किलों के बावजूद टीम ने अपना सैंपलिंग का काम पूरा किया.

चट्टानों में छिपे वो सबूत जिन्होंने खोली टकराव की सच्चाई

क्रेटर की शुरुआती जांच में जिरकॉन नाम का मिनरल मिला था, जो अक्सर उल्कापिंड के टकराने के दौरान भारी गर्मी और दबाव से बनता है. लेकिन सिर्फ जिरकॉन का मिलना यह साबित करने के लिए काफी नहीं था कि यह गड्ढा किसी स्पेस रॉक की वजह से बना है, इसे किसी और वजह से भी बना माना जा सकता था. इसलिए टीम को और पक्के सबूत चाहिए थे.

ओसिंस्की की टीम असल में शॉक मेटामॉर्फिज्म के निशान ढूंढ रही थी, यानी चट्टान में वो बदलाव जो सिर्फ एस्टेरॉयड के टकराने या न्यूक्लियर धमाके जैसे भयंकर दबाव से ही आते हैं. उन्होंने बताया कि ऐसे ज्यादातर सबूत बेहद छोटे होते हैं, “इनमें से ज्यादातर चीजें माइक्रोस्कोपिक होती हैं. इसलिए आप इन्हें केवल लैब में सैंपल के साथ कन्फर्म कर सकते हैं.” लेकिन एक सबूत ऐसा भी था जिसे बिना किसी माइक्रोस्कोप के भी पहचाना जा सकता था.

टीम को वहां शैटर कोन्स मिले, यानी चट्टान की सतह पर बनी वो खास दरारें और पंखे जैसी रेखाएं जो सिर्फ भयंकर टकराव से बनती हैं. इस जगह से जुटाई गई तस्वीरों में, जिनका श्रेय गातासेका और उनके साथी रिसर्चर्स को दिया गया है, संरचना के ठीक बीचोंबीच एक शैटर कोन और केंद्र से करीब 4 किलोमीटर यानी 2.5 मील पश्चिम में पिघली हुई चट्टान दिखाई गई है. इसके साथ ही टीम को इम्पैक्ट मेल्ट रॉक की बड़ी-बड़ी चट्टानें भी मिलीं. ओसिंस्की ने बताया कि इतनी बड़ी चट्टान पिघलाने के लिए कितनी ताकत चाहिए होती है, “जब कोई बड़ा एस्टेरॉयड टकराता है तो आप सचमुच पृथ्वी की क्रस्ट के दसियों क्यूबिक किलोमीटर को पिघला सकते हैं.” इसी पिघली हुई चट्टान से लिए गए सैंपल्स की लैब में जांच हुई, और नतीजों में इस टकराव की उम्र 39 करोड़ साल निकली.

दुनिया में इतने कम क्रेटर क्यों मिलते हैं, यह खोज इतनी दुर्लभ क्यों है

ओसिंस्की इम्पैक्ट अर्थ नाम की एक वेबसाइट भी चलाते हैं, जो दुनिया भर से आने वाले क्रेटर होने के दावों की सच्चाई परखती है. उन्हें अक्सर लोगों से ईमेल आते हैं जो अजीबोगरीब सैटेलाइट तस्वीरें देखकर मान लेते हैं कि उन्होंने कोई क्रेटर खोज लिया है. उनके अपने अनुभव के मुताबिक ज्यादातर दावे गलत निकलते हैं, “मुझे लोगों से बहुत सारे मैसेज मिलते हैं. उन्हें लगता है कि उन्होंने एक क्रेटर ढूंढ लिया है और 100 में से 99 मामलों में ऐसा नहीं होता है.” उन्होंने लेक मार्सल की इस खोज को उन गिने-चुने उदाहरणों में गिनाया जो साबित करते हैं कि आम लोगों की ऐसी खोज सच भी निकल सकती है.

अब तक पृथ्वी पर करीब 200 इम्पैक्ट क्रेटर दर्ज किए जा चुके हैं, इनमें से अकेले 31 क्रेटर कनाडा में हैं. ओसिंस्की के मुताबिक दुनिया भर में हर साल आमतौर पर 1 या 2 नए क्रेटर खोजे जाते हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर का आकार 5 से 10 किलोमीटर से भी कम होता है. लेक मार्सल के पास मिला करीब 25 किलोमीटर चौड़ा यह क्रेटर इस लिहाज से बेहद दुर्लभ है. कनाडा में इससे पहले आखिरी बार कोई उल्कापिंड क्रेटर साल 2010 में कन्फर्म हुआ था, यानी पंद्रह साल बाद देश को यह नई पुष्टि मिली है.

नया नाम मिला उहाचाटिक क्रेटर, आगे क्या होगा

टकराव की पुष्टि होने के बाद टीम ने इस जगह का आधिकारिक नामकरण करने का फैसला किया. इसके लिए इलाके के मूल निवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाली इकुआनित्शित इनु काउंसिल से चर्चा की गई. इसके बाद इस विशाल गड्ढे को उहाचाटिक क्रेटर नाम दिया गया. रिसर्चर्स अब अगले महीने जर्मनी में होने वाली मौसम विज्ञान सोसायटी की वार्षिक बैठक में अपनी पूरी रिसर्च पेश करेंगे, जहां वैज्ञानिक समुदाय के सामने इस खोज की पूरी जानकारी रखी जाएगी.

जो लापोइंटे के लिए यह पूरा अनुभव बेहद संतोष देने वाला रहा है. एक आम नागरिक की नजर से शुरू हुई यह खोज आखिरकार वैज्ञानिक पुष्टि तक पहुंची, इस बारे में उन्होंने कहा कि ऐसा रोज नहीं होता कि कोई सामान्य व्यक्ति इतनी बड़ी खोज कर ले, और उन्होंने बाकी लोगों को भी अपने अंदाज पर भरोसा करने की सलाह दी, “ऐसा हर दिन नहीं होता कि कोई आम नागरिक 39 करोड़ साल पुराना क्रेटर खोज ले. मैं सभी को प्रोत्साहित करता हूं कि वे अपने इंट्यूशन या ऑब्जरवेशन को नजरअंदाज न करें.” ओसिंस्की और उनकी टीम अब अक्टूबर 2025 में जुटाए गए सैंपल्स पर अपनी लैब स्टडी जारी रखे हुए है, जिससे इस टकराव और उस प्राचीन एस्टेरॉयड के बारे में और जानकारी सामने आने की उम्मीद है.

सवाल-जवाब

यह क्रेटर सबसे पहले किसने और कब खोजा?
क्यूबेक के शौकिया एस्ट्रोनॉमर जो लापोइंटे ने 2024 में गूगल मैप्स पर कैंपिंग का रास्ता ढूंढते हुए इसे देखा था.
क्रेटर कितना पुराना और कितना बड़ा है?
वैज्ञानिकों के मुताबिक यह करीब 39 करोड़ साल पुराना और करीब 25 किलोमीटर यानी 15.5 मील चौड़ा है.
यह क्रेटर कहां स्थित है?
यह क्यूबेक के कोत-नॉर इलाके में लेक मार्सल के पास स्थित है.
इसे उल्कापिंड क्रेटर होने की पुष्टि कैसे हुई?
प्रोफेसर गॉर्डन ओसिंस्की की टीम ने अक्टूबर 2025 में साइट का दौरा किया और शैटर कोन्स तथा इम्पैक्ट मेल्ट रॉक जैसे सबूत जुटाकर लैब में इसकी पुष्टि की.
क्रेटर का आधिकारिक नाम क्या रखा गया?
इलाके की इकुआनित्शित इनु काउंसिल से चर्चा के बाद इसे उहाचाटिक क्रेटर नाम दिया गया.
अब तक दुनिया और कनाडा में कितने इम्पैक्ट क्रेटर मिल चुके हैं?
दुनिया भर में करीब 200 इम्पैक्ट क्रेटर दर्ज हैं, जिनमें से 31 कनाडा में हैं, और कनाडा में इससे पहले आखिरी क्रेटर 2010 में कन्फर्म हुआ था.
इस खोज को आगे कहां पेश किया जाएगा?
रिसर्चर्स अगले महीने जर्मनी में मौसम विज्ञान सोसायटी की वार्षिक बैठक में अपनी रिसर्च पेश करेंगे.
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR