अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी से एक दिलचस्प खोज सामने आई है। वैज्ञानिकों ने यहां मधुमक्खियों की दो ऐसी दुर्लभ प्रजातियां खोजी हैं, जिन्हें इससे पहले इस घाटी में कभी दर्ज नहीं किया गया था। ये मधुमक्खियां घाटी में खिलने वाले फूलों से पराग और रस जुटाती हैं और उसी से शहद तैयार करती हैं।
बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने की खोज
यह खोज बेंगलुरु स्थित 'अशोका ट्रस्ट फॉर रिसर्च इन इकोलॉजी एंड द एनवायरनमेंट' यानी एटरी के वैज्ञानिकों ने की है। सियांग घाटी में चलाए गए एक शोध अभियान के दौरान इन दोनों प्रजातियों का पता चला। इस खोज से जुड़ी पूरी जानकारी हाल ही में 'यूरोपियन जर्नल ऑफ टैक्सोनॉमी' में छापी गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज सिर्फ दो नई प्रजातियों की पहचान भर नहीं है, बल्कि इससे पूर्वी हिमालय क्षेत्र की जैव विविधता को समझने में भी काफी मदद मिलेगी।
त्रिकोण के निशान और आदि जनजाति के नाम पर पहचान
वैज्ञानिकों ने दोनों नई प्रजातियों को अब वैज्ञानिक नाम भी दे दिए हैं। पहली प्रजाति का नाम एलाफ्रोपोडा ट्रायएंगुलेटा रखा गया है। इस मधुमक्खी के पेट पर त्रिकोण जैसे निशान बने होते हैं, इसी वजह से इसे यह नाम मिला। दूसरी प्रजाति को हैब्रोपोडा आदी नाम दिया गया है। यह नाम अरुणाचल प्रदेश की आदि जनजाति के सम्मान में रखा गया है।
अकेले रहने वाली ये मधुमक्खियां क्यों हैं खास
आम शहद की मधुमक्खियों की तरह ये झुंड बनाकर नहीं रहतीं। वैज्ञानिक भाषा में इन्हें सॉलिटरी बी यानी अकेली रहने वाली मधुमक्खी कहा जाता है, जो अपना घोंसला भी अकेले ही बनाती हैं। खेती और जंगलों के लिहाज से इनकी अहमियत बहुत ज्यादा है, क्योंकि ये एक फूल से दूसरे फूल पर जाते हुए परागण करती हैं। यही परागण फलों, सब्जियों और तमाम दूसरे पौधों की पैदावार बढ़ाने में सीधी भूमिका निभाता है।
अभी सिर्फ नर मधुमक्खियां मिलीं, सर्वे जारी रहेगा
फिलहाल वैज्ञानिकों के हाथ दोनों नई प्रजातियों का सिर्फ एक-एक नर नमूना ही लगा है। मादा मधुमक्खी अभी तक कहीं दर्ज नहीं हुई है, इसलिए इनके जीवन चक्र, रहने की जगह, संख्या और व्यवहार को लेकर अभी बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। वैज्ञानिकों ने तय किया है कि वे अपना सर्वे आगे भी जारी रखेंगे, ताकि इन दोनों प्रजातियों को बेहतर तरीके से समझा जा सके।
जंगल कटाई और निर्माण गतिविधियां बन सकती हैं खतरा
वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि जंगलों की कटाई, सड़क निर्माण और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के चलते बढ़ती मानवीय गतिविधियां इन दुर्लभ मधुमक्खियों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती हैं। अगर आगे चलकर इनका प्राकृतिक आवास सुरक्षित नहीं रखा गया, तो इनका अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है।
अरुणाचल की जैव विविधता में जुड़ी नई कड़ी
अरुणाचल प्रदेश पहले से ही अपने घने जंगलों और समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता रहा है। बीते कुछ सालों में यहां वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की कई नई प्रजातियां खोजी जा चुकी हैं। अब मधुमक्खियों की इन दो नई प्रजातियों की खोज ने राज्य की इस सूची में एक और खास उपलब्धि जोड़ दी है।
अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चाउना मीन ने कहा कि यह खोज राज्य की असाधारण प्राकृतिक संपदा और इसके वैज्ञानिक महत्व को दुनिया के सामने लाती है। उन्होंने यह भी कहा कि यह इस बात की याद दिलाती है कि पूर्वी हिमालय के नाजुक पर्यावरण और वहां की जैव विविधता को बचाना कितना जरूरी है।











