एप्पल के फेसआईडी को बनाने वाली टीम में शामिल रहे एक इंजीनियर के स्टार्टअप ने 52 मिलियन डॉलर की फंडिंग जुटाई है। इस स्टार्टअप, हेमिस्फेरिक, ने 1,00,000 लोगों के दिमाग का डेटा इकट्ठा करके ऐसे डीप लर्निंग मॉडल तैयार किए हैं, जो बिना किसी सर्जरी या इनवेसिव प्रक्रिया के दिमाग की सेहत जांच सकते हैं। कंपनी का मकसद है कि आने वाले समय में डिप्रेशन, अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों की पहचान और निगरानी सिर्फ करीब 15 मिनट के लिए पहना जाने वाला एक हेडसेट कर सके।
फेसआईडी और विज़न प्रो से दिमाग के डेटा तक का सफर
गिडी लिटविन ने एप्पल में फेसआईडी बनाने में मदद की थी। 2020 में उन्होंने कुछ नया करने की तलाश में कंपनी छोड़ दी। उनकी यह तलाश तब पूरी हुई जब हागाई लालाज़ार ने लिंक्डइन पर उन्हें सीधा मैसेज भेजा। लालाज़ार तब तक बिना सर्जरी के दिमाग का अध्ययन करने वाली आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक पर काम शुरू कर चुके थे और उन्हें एक ऐसे साथी की तलाश थी जो कंपनी को कारोबारी नजरिए से आगे बढ़ा सके। लिटविन से बात करने से पहले लालाज़ार करीब 75 लोगों से मिल चुके थे।
एप्पल में रहते हुए लिटविन विज़न प्रो नाम के ऑगमेंटेड रियलिटी हेडसेट के लिए हैंड-ट्रैकिंग पर भी काम कर रहे थे। इस प्रोजेक्ट के लिए उन्हें अपने शब्दों में लाखों लोगों जितना डेटा जुटाना पड़ा था, ताकि इस फीचर को चलाने वाले डीप लर्निंग मॉडल को ट्रेन किया जा सके। यही अनुभव हेमिस्फेरिक बनाने के तरीके में भी काम आया। लिटविन कहते हैं, इन प्रोजेक्ट्स के पीछे बहुत बड़े पैमाने पर डेटा जुटाने का काम हुआ था और हमें पता था कि हेमिस्फेरिक के लिए भी हमें कुछ वैसा ही करना होगा, और हमने वह कर दिखाया है।
ढाई लाख घंटे का दिमाग डेटा
डिप्रेशन, अल्जाइमर और पार्किंसंस जैसी बीमारियों की पहचान के लिए डॉक्टर अब तक ज्यादातर मरीज से पूछे गए सवालों और उसके व्यवहार पर ध्यान देने पर निर्भर रहे हैं, क्योंकि हर इंसान के दिमाग की गतिविधि अलग दिखती है। इसे बदलने के लिए लिटविन और लालाज़ार ने अपनी सबसे कीमती चीज तैयार की, यानी एशिया के साथ-साथ तेल अवीव और बोस्टन के 1,00,000 भुगतान पाने वाले वॉलंटियर्स से जुटाया गया ढाई लाख घंटे का दिमाग डेटा। इन लोगों ने कई ऐसी गतिविधियां कीं जो देखने में गेम जैसी लगती थीं, लेकिन असल में हर गतिविधि दिमाग के किसी अलग हिस्से को सक्रिय करने के लिए बनाई गई थी।
बिजली के सिग्नल पढ़ना सीख रहा AI
इस डेटा से एक फ्रंटियर मॉडल तैयार किया गया, जो खोपड़ी के अंदर होने वाली बिजली की गतिविधि से दिमाग के काम करने के तरीके का अंदाजा लगाता है, ठीक वैसे ही जैसे बड़े लैंग्वेज मॉडल टेक्स्ट का सांख्यिकीय विश्लेषण करके उसका मतलब निकालते हैं। इसके बाद टीम ने इस सामान्य मॉडल को कुछ खास लोगों के समूहों पर परखा, जिनमें PTSD, शिज़ोफ्रेनिया और डिप्रेशन से जूझ रहे लोग भी शामिल थे। टीम का कहना है कि मॉडल ने इन लोगों की दिमागी सेहत को लेकर सटीक अंदाजे लगाए। फिलहाल हेमिस्फेरिक एक क्लिनिकल स्टडी पर काम कर रही है, यह जांचने के लिए कि क्या यही मॉडल अल्जाइमर की पहचान कर सकता है, या उसे पहले से भांप भी सकता है।
पहला लक्ष्य, PTSD टूल के लिए FDA की मंजूरी
कंपनी अगले साल की शुरुआत में अपने पहले प्रोडक्ट को FDA के पास मंजूरी के लिए भेजने की तैयारी में है। यह प्रोडक्ट खासतौर पर PTSD की जांच के लिए बनाया गया है। कंपनी को उम्मीद है कि इससे 2027 के आखिर तक इसे आम लोगों के लिए उपलब्ध कराया जा सकेगा। असल में किसी दिमागी बीमारी की जांच के दौरान मरीज करीब 15 मिनट के लिए एक हल्का EEG हेडसेट पहनता है, जो दिमाग की बिजली गतिविधि रिकॉर्ड करता है, और इसी दौरान वह टैबलेट पर मौजूद एक ऐप के साथ इंटरैक्ट करता है। हेमिस्फेरिक का कहना है कि उसका AI मॉडल इन सिग्नल को समझकर डॉक्टरों को बीमारी पहचानने, इलाज का सबसे कारगर तरीका चुनने और मरीज की प्रगति पर नजर रखने में मदद करता है।
ब्लड टेस्ट जैसा आसान
लालाज़ार इस टेक्नोलॉजी के भविष्य को आसान शब्दों में समझाते हैं। वे कहते हैं, हम जिस भविष्य की कल्पना करते हैं उसमें यह बिल्कुल ब्लड टेस्ट जैसा हो जाएगा। यह डिवाइस बहुत ही सस्ती होगी, इसे मेंटल हेल्थ क्लिनिक, अस्पतालों और यहां तक कि मनोवैज्ञानिकों के दफ्तरों तक में बेचा और पहुंचाया जा सकेगा।
बड़ी टेक कंपनियों से मुकाबला
हेमिस्फेरिक जिस क्षेत्र में उतरी है, वहां रफ्तार पहले से तेज है। फेफड़ों के कैंसर जैसी बीमारियों के लिए AI की मदद से जांच करने वाले टूल पहले से क्लिनिकल इस्तेमाल में हैं और यूरोप में इलाज तक पहुंच को तेज कर रहे हैं। इसी बीच ओपनएआई और एन्थ्रोपिक जैसी बड़ी AI कंपनियां भी हेल्थकेयर सेक्टर में कदम बढ़ा रही हैं, जिससे इस क्षेत्र में बढ़ते स्टार्टअप्स के लिए मुकाबला और कड़ा हो गया है।
पैसा कहां से आया, अब आगे क्या
हेमिस्फेरिक को मिले 52 मिलियन डॉलर की यह शुरुआती फंडिंग अमेरिकी और इसराइली वेंचर कैपिटल फर्मों के साथ-साथ कुछ निजी निवेशकों से आई है, जिनमें उबर के शुरुआती निवेशकों में शामिल हॉवर्ड मॉर्गन भी हैं। कंपनी इस पैसे का इस्तेमाल सरकारों, हेल्थकेयर संगठनों और फार्मास्युटिकल कंपनियों के साथ साझेदारी बढ़ाने, अमेरिका में और स्टाफ भर्ती करने और नियामकीय मंजूरी की प्रक्रिया आगे बढ़ाने में करेगी। इसके अलावा कंपनी अपने मॉडल को बेहतर बनाने के लिए लाखों और लोगों का दिमाग डेटा जुटाने की योजना भी बना रही है।
लिटविन और लालाज़ार अलग से अपने खुद के ब्रेन स्कैनर भी विकसित कर रहे हैं, जिनके बारे में उनका मानना है कि ये पारंपरिक EEG उपकरणों के मुकाबले उनके मॉडल के लिए ज्यादा काम का डेटा दे सकते हैं। लिटविन कहते हैं, ये डिवाइस कभी मशीन लर्निंग के लिए बनाए ही नहीं गए थे, और डीप लर्निंग के लिए तो बिल्कुल भी नहीं।











