ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने एक विशालकाय तिलचट्टे को ऐसा साइबोर्ग रोबोट बना दिया है जो मलबे में फंसे लोगों की तस्वीर ले सकता है और जरूरत पड़ने पर उन्हें इंजेक्शन के जरिए दवा भी दे सकता है। इसे भूकंप या किसी बड़ी आपदा के बाद बचाव अभियान की रफ्तार बढ़ाने के मकसद से तैयार किया गया है।
क्वींसलैंड के बड़े तिलचट्टे को क्यों चुना गया
यह प्रोजेक्ट क्वींसलैंड विश्वविद्यालय और न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की साझा टीम ने तैयार किया है। इसके लिए उत्तरी क्वींसलैंड में पाए जाने वाले विशालकाय बिल खोदने वाले तिलचट्टे का इस्तेमाल हुआ, जो लंबाई में 87 मिलीमीटर (3.5 इंच) तक और वजन में 40 ग्राम (1.4 औंस) तक हो सकता है। यही मजबूत कद-काठी इसे बाकी कीड़ों से अलग बनाती है, जिन्हें आमतौर पर ऐसे प्रयोगों में इस्तेमाल किया जाता है। क्वींसलैंड विश्वविद्यालय की बायो-रोबोटिक्स शोधकर्ता टैन वो डोन ने बताया कि पिछले करीब दो दशक से साइबोर्ग कीड़ों को सर्च और एक्सप्लोर मिशन के लिए तैयार किया जा रहा है, लेकिन उनकी टीम इससे एक कदम आगे बढ़कर पीड़ित को ढूंढने के साथ-साथ उसकी मदद भी करना चाहती थी। यह रिसर्च हाल ही में जर्नल एडवांस्ड साइंस में प्रकाशित हुई है।
दो तरह के तैयार किए गए ‘पैराबॉर्ग’
टीम ने इस तिलचट्टे के दो अलग-अलग वर्जन तैयार किए, जिन्हें पैराबॉर्ग नाम दिया गया है। पहले वर्जन में एक छोटा कैमरा लगा है जो आपदा में फंसे व्यक्ति की हालत की तस्वीर ले सकता है, ताकि बचाव दल के पहुंचने से पहले ही चोट का अंदाजा लगाया जा सके। दूसरे वर्जन में एक ऑटोमेटिक इंजेक्शन सिस्टम लगा है जो कमांड मिलते ही दवा दे सकता है। यह तिलचट्टा अपने शरीर के वजन का करीब 1.5 गुना तक भार उठा सकता है, इसलिए इतना अतिरिक्त उपकरण लादने में उसे खास दिक्कत नहीं होती। इंजेक्शन वाले पैराबॉर्ग में उपकरण लगने से उसकी ऊंचाई करीब 15 मिलीमीटर और वजन करीब 17 ग्राम बढ़ गया, लेकिन अध्ययन में पाया गया कि इससे तिलचट्टे की सामान्य चाल पर कोई खास असर नहीं पड़ा। इन्हें तैयार करने के लिए इलेक्ट्रोड और माइक्रोचिप लगाते वक्त तिलचट्टों को बेहोश किया गया, और उपकरण हटाने के बाद वे फिर से सामान्य तिलचट्टों की तरह जीवन जीने लगे।
एंटीना और सेर्काई से मिलती है दिशा और रफ्तार
इस तिलचट्टे को कंट्रोल करने के लिए इसके एंटीना और सेर्काई, यानी पेट के पिछले हिस्से में मौजूद संवेदी अंगों में इलेक्ट्रोड लगाए गए हैं। दोनों एंटीना को अलग-अलग इलेक्ट्रिक सिग्नल देकर शोधकर्ता तिलचट्टे की दिशा तय कर सकते हैं, जबकि दोनों सेर्काई को एक साथ उत्तेजित करने पर उसकी चलने की रफ्तार नियंत्रित होती है। टीम ने अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर टेस्ट किया और पाया कि 10 से 40 हर्ट्ज़ के बीच के सिग्नल असरदार रहते हैं, जबकि 50 हर्ट्ज़ से ज्यादा की फ्रीक्वेंसी कुछ समय बाद बेअसर होने लगती है।
सिरका-बेकिंग सोडा वाली रिएक्शन से चलता है इंजेक्शन
इंजेक्शन देने वाला यह उपकरण एक छोटी स्प्रिंग की मदद से सिरिंज को चलाता है। जैसे ही यह ट्रिगर होता है, इसके अंदर मौजूद दो चैंबर के बीच की सील टूट जाती है, एक चैंबर में साइट्रिक एसिड और दूसरे में बेकिंग सोडा भरा होता है। दोनों पदार्थ आपस में रिएक्ट करते हैं, ठीक उसी तरह जैसे बचपन में बेकिंग सोडा और सिरके से ज्वालामुखी वाला प्रयोग किया जाता था, और इससे बनने वाली कार्बन डाइऑक्साइड इतना दबाव बना देती है कि सिरिंज का प्लंजर दब जाता है और दवा शरीर में चली जाती है।
टेस्ट में सफलता की दर कितनी रही
इस सिस्टम को परखने के लिए शोधकर्ताओं ने एक तिलचट्टे को शुरुआती बिंदु से तीन चेकपॉइंट पार कराते हुए एक नकली लक्ष्य तक भेजा और वहां इंजेक्शन दिलवाया। जब तिलचट्टा लक्ष्य से 150 मिलीमीटर के दायरे में था, तब इंजेक्शन देने की सफलता दर करीब 95 प्रतिशत रही। लेकिन शुरुआत से लेकर इंजेक्शन पूरा होने तक के पूरे सफर को देखें तो कुल सफलता दर 72 प्रतिशत दर्ज की गई। एक अलग परीक्षण में टीम ने दो पैराबॉर्ग को साथ काम करते हुए भी दिखाया, जिसमें एक तिलचट्टे ने कैमरे से नकली लक्ष्य को ढूंढा और दूसरे ने वहां पहुंचकर इंजेक्शन दिया।
पहले भी बने थे साइबोर्ग भृंग, आगे की योजना
इसी टीम ने पहले सीधी दीवारों पर चढ़ सकने वाले साइबोर्ग भृंग (बीटल) भी तैयार किए थे, लेकिन शोधकर्ताओं का कहना है कि बचाव और मेडिकल जैसे भारी उपकरण ढोने के लिए बड़े आकार के तिलचट्टे ज्यादा उपयुक्त हैं। हालांकि अभी तक हुए सारे परीक्षण नियंत्रित माहौल में हुए हैं और इनमें असली आपदा स्थल जैसा मलबा, ऊबड़-खाबड़ जमीन और लगातार बदलता भूभाग शामिल नहीं किया गया। टैन वो डोन को उम्मीद है कि अगर रिसर्च और फील्ड टेस्टिंग तेज करने के लिए पर्याप्त संसाधन मिल जाएं, तो अगले पांच से दस साल में साइबोर्ग कीड़ों की एक पूरी बचाव टीम असली आपदा स्थलों पर भेजी जा सकती है। उन्होंने कहा, "हर काम के लिए एक ही रोबोट बनाने की बजाय, हम अलग-अलग कीड़ों की प्राकृतिक ताकत का फायदा उठाकर उन्हें अलग-अलग मिशन के लिए तैयार कर सकते हैं।"


















