भारत अब अंतरिक्ष की दुनिया में केवल नए मिशन भेजने की तैयारी तक सीमित नहीं है, बल्कि एक ऐसा विशाल स्पेस इकोसिस्टम तैयार कर रहा है जहाँ रॉकेट का निर्माण भी देश के भीतर ही होगा, उनकी लॉन्चिंग भी यही से होगी और दुनिया भर को अंतरिक्ष आधारित सेवाएँ भी भारत की धरती से ही प्रदान की जाएँगी। जाने-माने उद्योगपति पवन गोयनका ने अपने एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए भारत के इसी तेज़ी से बदलते हुए अंतरिक्ष क्षेत्र का विस्तृत खाका खींचा है।
EOS-05 मिशन और अंतरिक्ष यात्रा में आया बड़ा बदलाव
पवन गोयनका ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के EOS-05 मिशन की विशेष चर्चा करते हुए इसे भारत के अंतरिक्ष अभियान का एक मील का पत्थर बताया है। उनके अनुसार, पिछले पाँच वर्षों के दौरान भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में जो उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिले हैं, वे आने वाले दशक में देश को एक सर्वशक्तिमान वैश्विक स्पेस पावर के रूप में स्थापित करने की पूरी क्षमता रखते हैं।
पाँच साल पहले खुला निजी क्षेत्र का रास्ता और 450 से ज्यादा स्टार्टअप्स
भारत सरकार ने लगभग पाँच वर्ष पूर्व अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी उद्यमों और कंपनियों के लिए खोलने का एक ऐतिहासिक निर्णय लिया था। इस नीतिगत बदलाव का मुख्य उद्देश्य केवल वित्तीय निवेश को आकर्षित करना ही नहीं था, बल्कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की कार्यक्षमता को नई ऊँचाइयों पर पहुँचाना और अंतरिक्ष उद्योग के क्षेत्र में एक मजबूत निजी आधार तैयार करना था।
पवन गोयनका के आँकड़ों के मुताबिक, आज के समय में देश के भीतर 450 से अधिक सक्रिय स्पेस स्टार्टअप्स अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। भारत की निजी कंपनियाँ अब केवल अंतरिक्ष तकनीक के अनुसंधान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सफलतापूर्वक रॉकेट को निर्धारित कक्षा तक पहुँचाने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन भी कर चुकी हैं। जिस क्षेत्र की पूरी जिम्मेदारी पहले केवल सरकारी संस्थानों के कंधों पर हुआ करती थी, वहाँ अब निजी कंपनियाँ तेजी से अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।
2030 का महत्वाकांक्षी लक्ष्य: हर साल 50 लॉन्च
भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम ने भविष्य के लिए बेहद ऊंचा और महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित कर लिया है। इस योजना के तहत वर्ष 2030 तक भारत में प्रतिवर्ष 50 अंतरिक्ष लॉन्च करने की कुल क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। यह आंकड़ा इसलिए भी बेहद खास और चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर लॉन्चिंग का काम किसी एक संस्थान या एजेंसी के बूते का नहीं हो सकता।
इसके लिए सरकार, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, तमाम स्टार्टअप्स और बड़ी निजी औद्योगिक इकाइयों को एक मंच पर आकर मिलकर काम करना होगा। इसी आवश्यकता से भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र का एक बिल्कुल नया मॉडल सामने आता है, जहाँ अनुसंधान और उन्नत तकनीकों की कमान भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पास होगी, जबकि बड़े स्तर पर विनिर्माण और लॉन्चिंग की रफ्तार बढ़ाने की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र संभालेगा।
मेक इन इंडिया और लॉन्च फ्रॉम इंडिया का विजन
पवन गोयनका के संदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू भारत के भावी अंतरिक्ष मॉडल को रेखांकित करता है, जिसमें स्वदेश में निर्माण करने, देश की जमीन से ही लॉन्च करने और दुनिया भर को सेवाएँ देने की बात कही गई है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत केवल अपने स्वयं के उपग्रह अंतरिक्ष में भेजने वाला राष्ट्र नहीं बनना चाहता, बल्कि वह आने वाले समय में अन्य देशों तथा वैश्विक कंपनियों के लिए भी लॉन्चिंग और अंतरिक्ष सेवाओं का एक प्रमुख केंद्र बनने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।
यदि निर्धारित समय यानी 2030 तक हर साल 50 लॉन्च का यह बड़ा लक्ष्य सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया जाता है, तो देश की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को अभूतपूर्व गति मिल जाएगी। इससे रॉकेट के निर्माण से लेकर उपग्रहों, डेटा सेवाओं, संचार प्रणालियों, पृथ्वी अवलोकन और अंतरिक्ष आधारित तकनीकों से जुड़ा एक विशाल औद्योगिक नेटवर्क देश में पूरी तरह से विकसित हो जाएगा।


















