पिछले कुछ दिनों में सोशल मीडिया पर एक ऐसी अफवाह तेजी से फैली, जिसमें दावा किया गया कि भारत की सबसे बड़ी स्पेस एजेंसी इसरो को किसी निजी कंपनी को बेचा जा रहा है और आने वाले समय में इसकी भूमिका खत्म हो जाएगी। इस दावे ने लोगों के बीच खासा भ्रम पैदा कर दिया, लेकिन इसरो ने खुद आगे आकर इस पूरे मामले पर सफाई दे दी और साफ कह दिया कि ऐसी कोई भी बात सच नहीं है।
इसरो ने एक्स पर दी सफाई
इसरो ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट कर बताया कि निजीकरण से जुड़ी खबरें पूरी तरह बेबुनियाद और गलत हैं। एजेंसी ने कहा कि उसका न तो निजीकरण हो रहा है और न ही उसका दबदबा किसी तरह कम होने वाला है। भारत के अंतरिक्ष मिशनों की अगुवाई अब तक इसरो करता आया है और आगे भी करता रहेगा।
क्या है नेशनल स्पेस इकोसिस्टम की योजना
असल में केंद्र सरकार इसरो की अगुवाई में एक नेशनल स्पेस इकोसिस्टम खड़ा कर रही है। इसके तहत जो तकनीक इसरो पहले ही विकसित कर चुका है, जैसे रूटीन सैटेलाइट बनाना और पुराने लॉन्च व्हीकल तैयार करना, उनके बड़े पैमाने पर उत्पादन की जिम्मेदारी अब निजी कंपनियों, स्टार्ट-अप्स और सरकारी उपक्रमों यानी PSUs को सौंपी जाएगी। इसका मतलब यह नहीं कि इसरो इन प्रोजेक्ट्स से बाहर हो जाएगा, बल्कि रोजमर्रा के उत्पादन कार्य में उसकी सीधी भागीदारी घटेगी।
अब वैज्ञानिकों का ध्यान किन मिशनों पर
जब रूटीन उत्पादन का जिम्मा निजी क्षेत्र संभाल लेगा, तो इसरो के वैज्ञानिक अपनी ऊर्जा और समय अगली पीढ़ी की तकनीकों पर लगा सकेंगे। इस लिस्ट में साल 2035 तक भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन तैयार करना शामिल है। इसके अलावा 2040 तक किसी भारतीय एस्ट्रोनॉट को चांद की सतह पर उतारने का लक्ष्य भी रखा गया है। मंगल और शुक्र जैसे ग्रहों की तरफ डीप स्पेस मिशन भेजना और बार-बार इस्तेमाल किए जा सकने वाले यानी री-यूजेबल लॉन्च व्हीकल तैयार करना भी इसी अगली पीढ़ी की योजना का हिस्सा है।
44 बिलियन डॉलर की स्पेस इकोनॉमी का टारगेट
भारत की मौजूदा स्पेस इकोनॉमी करीब 8.4 बिलियन डॉलर की है। सरकार का लक्ष्य है कि साल 2033 तक इसे बढ़ाकर 44 बिलियन डॉलर तक पहुंचाया जाए। इतना बड़ा लक्ष्य अकेले इसरो के संसाधनों के दम पर हासिल करना मुमकिन नहीं है, इसीलिए निजी क्षेत्र की भागीदारी जरूरी मानी जा रही है। साल 2020 में भारत में गिनती के स्पेस स्टार्ट-अप्स हुआ करते थे, जबकि आज इनकी संख्या 450 से ज्यादा हो चुकी है। इससे साफ पता चलता है कि इस क्षेत्र में निजी निवेश और दिलचस्पी दोनों तेजी से बढ़ी हैं।
सुरक्षा से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर रहेगा पूरा सरकारी नियंत्रण
इसरो ने यह भी स्पष्ट किया है कि निजी कंपनियां किसी भी सूरत में इसरो की जगह नहीं ले रही हैं, बल्कि वे साथ मिलकर भारत को स्पेस के क्षेत्र में मजबूत बना रही हैं। जो भी प्रोजेक्ट क्रिटिकल या नेशनल सिक्योरिटी से जुड़े हैं, उनकी पूरी कमान सरकार और इसरो के ही हाथों में रहेगी। निजी कंपनियों और स्टार्ट-अप्स को सिर्फ उन कामों में शामिल किया जाएगा, जिनकी तकनीक पहले से परखी जा चुकी है।
कुल मिलाकर इसरो की यह सफाई बताती है कि यह घटनाक्रम सिकुड़ने की नहीं बल्कि विस्तार की कहानी है। रूटीन काम बाहर सौंपकर एजेंसी अगले डेढ़ दशक में कहीं बड़े और मुश्किल लक्ष्यों की तरफ बढ़ने की तैयारी में है।


















