राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत लंदन में एक कार्यक्रम में पहुंचे, जहां उन्होंने श्रोताओं के सामने हिंदू शब्द की परतें खोलकर रखीं। उनका कहना था कि इस शब्द को किसी एक पूजा पद्धति या नक्शे पर खींची गई सरहद तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, यह असल में एक व्यापक सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान है, जो जीवन, अस्तित्व और दुनिया के साथ हमारे रिश्ते को समझने का अपना खास तरीका रखती है।
विविधता और एकजुटता एक साथ कैसे टिकती है
भागवत ने अपनी बात में कहा कि भारतीय और हिंदू सोच की सबसे बड़ी खासियत यह मानना है कि अलग-अलग रंग-रूप के बीच भी भीतर से एक होने का भाव कायम रह सकता है। दुनिया भर में इंसानों के रहन-सहन, भाषा, सोच और परंपराओं में फर्क होना उन्होंने बेहद सामान्य बताया। उनके अनुसार, ये तमाम भिन्नताएं दरअसल एक ही मूल सच्चाई के अलग-अलग रूप और साज-सज्जा भर हैं। उन्होंने चेताया कि बाहर से दिखने वाली विविधता को अपनाते समय यह भूलना नहीं चाहिए कि भीतर से हम सब आपस में जुड़े हुए और एक हैं।
दुश्मनी की सोच हटते ही सुलझने लगते हैं विवाद
दुनिया में बढ़ती तनातनी और लड़ाई-झगड़ों का जिक्र करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि जिस पल इंसान दूसरे को अपना दुश्मन मानना छोड़ देता है, विवाद अपने आप हल्के पड़ने लगते हैं। किसी को दबाना, हराना या अपनी बात जबरन मनवाना समाधान नहीं है, बल्कि समाज को साथ मिलकर आगे का रास्ता तलाशना चाहिए। भागवत के मुताबिक हर इंसान की बुनियादी जरूरतें और आखिरी मंजिल लगभग एक जैसी होती है, इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सामने वाले को कैसे पीछे छोड़ा जाए, बल्कि यह होना चाहिए कि साझा लक्ष्यों तक सब मिलकर कैसे पहुंचें।
एक जैसा दिखना नहीं, साथ रहना है असली एकता
मोहन भागवत ने इस धारणा को भी सिरे से नकारा कि एकजुट रहने के लिए सबका सोचना और दिखना एक जैसा होना जरूरी है। उन्होंने समझाया कि हिंदू सभ्यता किसी को एक तय सांचे में ढालने की कोशिश नहीं करती, क्योंकि एकता के लिए एकरूपता की दरकार होती ही नहीं। खुले दिल से विविधता को गले लगाना ही हिंदू स्वभाव की सबसे बड़ी पहचान है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि हिंदू सोच किसी को एक ही रास्ते पर चलने पर मजबूर नहीं करती और न ही दूसरों की मान्यताएं बदलने की सलाह देती है। अलग-अलग परंपराओं का आदर करते हुए शांति के साथ एक-दूसरे के साथ रहना ही इस सोच की जड़ में है।
भागवत के इस भाषण को हिंदू सभ्यता की वैश्विक व्याख्या के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें विविधता को खतरे की तरह नहीं बल्कि एकता की बुनियाद के तौर पर पेश किया गया।


















