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मिनेसोटा के वैज्ञानिकों ने बनाई खुद बढ़ने और बंटने वाली कृत्रिम कोशिका, नाम रखा स्पडसेलविज्ञान
2 घंटे पहले· 2

मिनेसोटा के वैज्ञानिकों ने बनाई खुद बढ़ने और बंटने वाली कृत्रिम कोशिका, नाम रखा स्पडसेल

अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने लैब में एक ऐसी कृत्रिम कोशिका तैयार की है जो भोजन लेकर बढ़ सकती है और खुद को बांटकर नई कोशिकाएं बना सकती है, हालांकि इसे अभी पूरी तरह जीवित नहीं कहा जा सकता.

दिव्या रेड्डीदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता 4 मिनट पढ़ें AI के लिए
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क्या इंसान लैब में पूरी तरह से एक जीवित कोशिका तैयार कर सकता है? इस सवाल का जवाब खोजने में वैज्ञानिक दशकों से जुटे थे और अब अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी की टीम ने इस दिशा में एक बड़ी कामयाबी का दावा किया है. इन वैज्ञानिकों ने एक ऐसी कृत्रिम कोशिका तैयार की है जो भोजन लेकर बढ़ सकती है और खुद को दो हिस्सों में बांटकर अपनी संख्या भी बढ़ा सकती है. इस कोशिका को स्पडसेल नाम दिया गया है. वैज्ञानिक साफ कहते हैं कि यह अभी पूरी तरह जीवित कोशिका के दायरे में नहीं आती, लेकिन इसमें जीवन जैसी कई अहम खूबियां देखी गई हैं, इसी वजह से इसे बायोलॉजिकल इंजीनियरिंग की दुनिया में एक बड़ा पड़ाव माना जा रहा है.

अगर आने वाले सालों में यह तकनीक और परिपक्व होती है तो इसके सहारे जरूरत के मुताबिक जीवित कोशिकाएं, नई किस्म की दवाएं, बीमारियों का बेहतर इलाज और खास मकसद से काम करने वाले सूक्ष्म जीवित मशीन तैयार करना मुमकिन हो सकता है. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह उपलब्धि आगे चलकर चिकित्सा, जैव प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक शोध की दिशा ही बदल सकती है.

स्पडसेल आखिर है क्या चीज

स्पडसेल असल में एक सिंथेटिक यानी कृत्रिम कोशिका है, जिसे वैज्ञानिकों ने लैब में अलग अलग जैविक हिस्सों को आपस में जोड़कर तैयार किया है. इसे बनाने के पीछे मकसद यह था कि एक ऐसा सिस्टम खड़ा किया जाए जो प्राकृतिक कोशिका की तरह काम करे और जीवन की बुनियादी प्रक्रियाओं को पूरा कर सके. यह कोशिका भोजन ग्रहण करके आकार में बढ़ती है और बाद में खुद को दो हिस्सों में विभाजित कर नई कोशिकाएं भी बना लेती है.

अभी इसे पूरी तरह जीवित क्यों नहीं कहा जा रहा

वैज्ञानिकों का कहना है कि स्पडसेल को फिलहाल एक संपूर्ण जीवित कोशिका का दर्जा नहीं दिया जा सकता. इसे बाहर से लगातार पोषण और राइबोसोम मुहैया कराने पड़ते हैं. राइबोसोम वे सूक्ष्म संरचनाएं होती हैं जो कोशिका के भीतर प्रोटीन बनाने का काम करती हैं. इसके अलावा स्पडसेल में कचरा बाहर निकालने की मजबूत व्यवस्था और खुद को खतरों से बचाने की क्षमता भी अभी विकसित नहीं हो पाई है. यानी यह कोशिका फिलहाल अपने दम पर लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती.

यह उपलब्धि इतनी अहम क्यों मानी जा रही है

अब तक वैज्ञानिक समुदाय में यह धारणा रही है कि जीवन से जुड़ी सारी प्रक्रियाएं केवल प्राकृतिक कोशिकाओं में ही संभव हैं. लेकिन इस रिसर्च ने यह दिखा दिया है कि जीवन के कई बुनियादी काम रासायनिक स्तर पर भी दोहराए जा सकते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक इससे यह साबित होता है कि कोशिका के बढ़ने और अपनी संख्या बढ़ाने जैसी प्रक्रियाओं के पीछे किसी रहस्यमयी शक्ति की जरूरत नहीं होती, बल्कि यह रसायन विज्ञान के नियमों से भी संभव है.

कोशिका के बंटने का तरीका आम कोशिकाओं से अलग

सामान्य कोशिकाओं के अंदर साइटोस्केलेटन नाम का एक खास ढांचा होता है, जो कोशिका को विभाजित होने में मदद करता है. स्पडसेल में यह ढांचा सिरे से गायब है. इसकी जगह वैज्ञानिकों ने ऐसे प्रोटीन का इस्तेमाल किया, जो कोशिका की बाहरी परत पर जमा होकर दबाव बनाते हैं. यही दबाव आगे चलकर कोशिका को दो हिस्सों में बांट देता है और इस तरह एक नई कोशिका जन्म लेती है.

एक जीन में बदलाव से मिली तेज ग्रोथ

रिसर्च के दौरान वैज्ञानिकों ने कोशिका के जीन में एक फेरबदल किया, जिसकी वजह से एक खास फ्यूजन प्रोटीन पहले से ज्यादा मात्रा में बनने लगा. इसका नतीजा यह निकला कि कोशिकाएं पहले के मुकाबले तेज रफ्तार से बढ़ने लगीं और ज्यादा संख्या में नई कोशिकाएं बनाने लगीं. पांच पीढ़ियों के बाद यह नया संशोधित रूप पुरानी कोशिकाओं की तुलना में कहीं ज्यादा कामयाब साबित हुआ.

इंसानी कोशिका के मुकाबले कितनी छोटी है स्पडसेल

इंसान की कोशिकाओं का जीनोम करीब 30 लाख किलोबेस पेयर का होता है, जबकि स्पडसेल का जीनोम सिर्फ करीब 90 हजार बेस पेयर का है. एक और बड़ा अंतर यह है कि इसका डीएनए किसी एक क्रोमोसोम में नहीं बल्कि सात अलग अलग प्लाज्मिड में बंटा हुआ रखा गया है. इस बंटवारे की वजह से वैज्ञानिक जरूरत के मुताबिक अलग अलग जैविक कार्यों को अलग अलग तरीके से प्रोग्राम कर पाते हैं.

भविष्य में इससे क्या फायदे मिल सकते हैं

अगर यह तकनीक आगे चलकर और बेहतर होती है तो मरीज की जरूरत के मुताबिक खास किस्म की कोशिकाएं तैयार करना संभव हो सकता है. इससे नई दवाओं की जांच, दुर्लभ बीमारियों का इलाज, क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत और पर्यावरण की सफाई जैसे कई क्षेत्रों में मदद मिल सकती है. वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि आगे चलकर ऐसी जीवित सूक्ष्म मशीनें भी बनाई जा सकती हैं, जो शरीर के भीतर जाकर सीधे बीमारी वाली जगह पर काम करें.

अभी भी बाकी है लंबा सफर

यह उपलब्धि जितनी बड़ी है, वैज्ञानिक उतनी ही साफगोई से यह भी मानते हैं कि अभी सफर लंबा बाकी है. स्पडसेल फिलहाल अपने दम पर पूरी तरह जीवित नहीं रह सकती. इसमें खुद ऊर्जा बनाने, खुद को सुरक्षित रखने और अपशिष्ट बाहर निकालने जैसी कई जरूरी क्षमताएं अभी विकसित करनी बाकी हैं. इन सबको हासिल करने के लिए दुनिया भर के वैज्ञानिकों को मिलकर लंबे समय तक काम करना होगा.

इसका आप पर असर

यह खोज अभी शुरुआती रिसर्च स्टेज में है, इसलिए आम लोगों की रोजमर्रा जिंदगी पर इसका सीधा असर फिलहाल नहीं है, लेकिन जो लोग विज्ञान, मेडिकल रिसर्च या भविष्य के इलाज में दिलचस्पी रखते हैं, उनके लिए यह जरूर ध्यान देने वाली खबर है.

  • मरीजों और मेडिकल रिसर्चरों के लिए: भविष्य में इस तकनीक से मरीज की जरूरत के हिसाब से खास कोशिकाएं और दुर्लभ बीमारियों के इलाज विकसित हो सकते हैं.
  • छात्रों और विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए: यह दिखाता है कि बायोलॉजिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई और करियर आगे कितने नए मौके ला सकते हैं.

सवाल-जवाब

स्पडसेल क्या है?
स्पडसेल एक सिंथेटिक यानी कृत्रिम कोशिका है, जिसे लैब में अलग अलग जैविक हिस्सों को जोड़कर तैयार किया गया है और जो भोजन लेकर बढ़ सकती है और खुद को बांटकर नई कोशिकाएं बना सकती है.
इसे किसने और कहां बनाया?
इसे अमेरिका की मिनेसोटा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है.
क्या स्पडसेल पूरी तरह जीवित कोशिका है?
नहीं, वैज्ञानिक साफ कहते हैं कि इसे अभी पूरी तरह जीवित नहीं माना जा सकता क्योंकि इसे बाहर से लगातार पोषण और राइबोसोम देने पड़ते हैं और इसमें कचरा निकालने व खुद को बचाने की मजबूत व्यवस्था नहीं है.
यह कोशिका कैसे बढ़ती और बंटती है?
सामान्य कोशिकाओं जैसे साइटोस्केलेटन ढांचे की जगह स्पडसेल में ऐसे प्रोटीन इस्तेमाल किए गए हैं जो बाहरी परत पर दबाव बनाकर कोशिका को दो हिस्सों में बांट देते हैं.
इंसानी कोशिका के मुकाबले इसका जीनोम कितना अलग है?
इंसानी कोशिका का जीनोम करीब 30 लाख किलोबेस पेयर का होता है, जबकि स्पडसेल का जीनोम सिर्फ करीब 90 हजार बेस पेयर का है और सात अलग अलग प्लाज्मिड में बंटा है.
जीन में बदलाव से क्या फर्क पड़ा?
एक खास फ्यूजन प्रोटीन ज्यादा बनने लगा, जिससे कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगीं और पांच पीढ़ियों बाद यह रूप पुरानी कोशिकाओं से ज्यादा सफल साबित हुआ.
भविष्य में इसके क्या फायदे हो सकते हैं?
इससे मरीज की जरूरत के मुताबिक खास कोशिकाएं, नई दवाओं की जांच, दुर्लभ बीमारियों का इलाज, क्षतिग्रस्त ऊतकों की मरम्मत और पर्यावरण की सफाई जैसे क्षेत्रों में मदद मिल सकती है.
अभी इसकी सबसे बड़ी सीमाएं क्या हैं?
इसमें खुद ऊर्जा बनाने, खुद को सुरक्षित रखने और अपशिष्ट बाहर निकालने जैसी क्षमताएं अभी विकसित नहीं हो पाई हैं, इसलिए यह अपने दम पर लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकती.
दिव्या रेड्डी
लेखक के बारे मेंदिव्या रेड्डीशिक्षा संवाददाता आगरा
विशेषज्ञताशिक्षा समाचार, स्कूल, विश्वविद्यालय, शिक्षा नीति, परीक्षा, छात्रवृत्ति, छात्र मामले, शैक्षणिक रुझान, उच्च शिक्षा, कौशल विकास

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक रुझानों और छात्रों से जुड़ी ख़बरों को कवर करती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के अहम घटनाक्रमों पर स्पष्टता व अंतर्दृष्टि के साथ रिपोर्ट करती हैं।

दिव्या रेड्डी एक शिक्षा संवाददाता हैं जो शिक्षा पत्रकारिता — स्कूल व विश्वविद्यालय की ख़बरों, शिक्षा नीति, शैक्षणिक सुधारों, छात्र मामलों और कौशल विकास पहलों — में विशेषज्ञता रखती हैं। वे शिक्षा क्षेत्र के ब्रेकिंग घटनाक्रम, परीक्षा अपडेट, संस्थागत बदलाव, सरकारी शिक्षा कार्यक्रम और सीखने में नवाचार पर रिपोर्ट करती हैं। सटीक व सुलभ रिपोर्टिंग पर मज़बूत ज़ोर के साथ दिव्या छात्रों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने वाले मुद्दे कवर करती हैं। उनका काम पाठ्यक्रम में बदलाव, उच्च शिक्षा रुझानों, छात्रवृत्ति अवसरों, प्रतियोगी परीक्षाओं और शिक्षा में तकनीक की बदलती भूमिका को उजागर करता है।

पूरा प्रोफ़ाइल देखें ↗
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