अमेरिकी जांच एजेंसियों ने पूर्व सीएनएन प्रस्तोता डॉन लेमन के साथ एक विरोध प्रदर्शन की कवरेज में सहायता करने वाले इक्कीस वर्षीय कॉलेज छात्र को ढूंढने और हिरासत में लेने के लिए मोबाइल फोन सिग्नलों को इंटरसेप्ट करने वाले आधुनिक निगरानी उपकरणों के इस्तेमाल की अनुमति ली थी। अदालती दस्तावेजों में सामने आई इस जानकारी से यह स्पष्ट हुआ है कि जनवरी के महीने में मिनेसोटा के सेंट पॉल स्थित सिटीज चर्च में हुए प्रदर्शन के बाद शुरू हुई जांच के दौरान बेहद आक्रामक निगरानी तकनीकों का सहारा लिया गया था।
इस मामले के केंद्र में जेरोम रिचर्डसन हैं, जो उस समय टेंपल यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ छात्र थे और अब स्नातक हो चुके हैं। रिचर्डसन उन उनतालीस लोगों में शामिल हैं, जिन पर जनवरी में सिटीज चर्च में धार्मिक उपासना में बाधा डालने और श्रद्धालुओं के नागरिक अधिकारों के उल्लंघन की साजिश रचने के आरोप लगाए गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने अठारह जनवरी की प्रार्थना सभा को इसलिए निशाना बनाया था क्योंकि चर्च के पादरियों में से एक, डेविड ईस्टरवुड, अमेरिकी आव्रजन और सीमा शुल्क प्रवर्तन यानी ICE के सेंट पॉल क्षेत्रीय कार्यालय के प्रमुख भी थे। इस प्रदर्शन के सिलसिले में आरोपित किए गए लोगों में पत्रकार जॉर्जिया फोर्ट और डॉन लेमन भी शामिल हैं, जिनका कहना है कि वे दोनों केवल एक पत्रकार के रूप में वहां की घटनाओं को कवर करने पहुंचे थे।
सेल-साइट सिमुलेटर और निगरानी वारंट की पृष्ठभूमि
सिटीज चर्च में हुए विरोध प्रदर्शन के ठीक बारह दिन बाद दो अलग-अलग राज्यों के न्यायाधीशों ने जांचकर्ताओं को सेल-साइट सिमुलेटर के उपयोग की अनुमति देने वाले वारंट जारी करना शुरू कर दिया था। आम बोलचाल में इन उपकरणों को स्टिंगरे या आईएमएसआई कैचर के नाम से जाना जाता है। पहला वारंट तीस जनवरी को मिनेसोटा में मंजूर हुआ और इसके ठीक अगले दिन इकतीस जनवरी को पेंसिल्वेनिया में दूसरा वारंट स्वीकृत किया गया। इन दोनों वारंटों का सीधा लक्ष्य जेरोम रिचर्डसन का मोबाइल फोन था। रिचर्डसन के वकीलों ने बाद में इन ट्रैकिंग साक्ष्यों को मुकदमे से बाहर करने के लिए अदालत में याचिका दायर की, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि इस अत्यधिक आक्रामक निगरानी का एकमात्र उद्देश्य रिचर्डसन के सटीक स्थान का पता लगाना और उन्हें गिरफ्तार करना था।
संघीय जांचकर्ताओं ने केवल रिचर्डसन के फोन तक ही अपनी निगरानी सीमित नहीं रखी थी। दस्तावेजों के अनुसार, उन्होंने स्वतंत्र पत्रकार जॉर्जिया फोर्ट और उस समय मिनेसोटा स्टेट सीनेट के उम्मीदवार रहे जमेल लुंडी के फोन को भी सेल-साइट सिमुलेटर से ट्रैक करने के लिए अदालतों में आवेदन जमा किए थे। इसके अतिरिक्त, जांच अधिकारियों ने अलग से पेन रजिस्टर आदेश भी मांगे थे। पेन रजिस्टर एक ऐसी तकनीकी प्रणाली है जो किसी लक्षित फोन द्वारा डायल किए गए या उस पर आने वाले सभी नंबरों का विस्तृत रिकॉर्ड दर्ज कर सकती है। यह अर्जी फोर्ट के फोन के साथ-साथ लेमन से जुड़े एक फोन नंबर के लिए भी दी गई थी। हालांकि अदालती रिकॉर्ड से यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि किसी न्यायाधीश ने इन अतिरिक्त अर्जियों को स्वीकृति दी थी या नहीं।
स्टिंगरे तकनीक कैसे काम करती है और इस पर विवाद क्यों है
सेल-साइट सिमुलेटर तकनीक सामान्य मोबाइल नेटवर्क टावरों का रूप धारण करके काम करती है। यह उपकरण अपने आसपास मौजूद सभी मोबाइल फोनों को यह धोखा देता है कि वह असली सेलुलर टावर है, जिसके कारण लक्षित फोन और उसके आसपास के अन्य सभी उपकरण उससे कनेक्ट हो जाते हैं। एक बार जब फोन इस नकली टावर से जुड़ जाता है, तो उपकरण ऑपरेटर को उस फोन की सटीक लोकेशन और पहचान संख्या मिल जाती है। लेकिन इस प्रक्रिया की सबसे विवादास्पद बात यह है कि यह केवल संदिग्ध व्यक्ति के फोन का डेटा ही इकट्ठा नहीं करता, बल्कि आसपास मौजूद किसी भी निर्दोष नागरिक के मोबाइल की पहचान संबंधी जानकारी भी अपने सिस्टम में खींच लेता है।
गोपनीयता और नागरिक अधिकारों के समर्थकों ने इस अंधाधुंध डेटा संग्रह के कारण इन उपकरणों को व्यापक जाल बिछाकर जासूसी करने वाला औजार करार दिया है। इस तकनीक के उपयोग को हमेशा से अत्यधिक गोपनीयता के आवरण में रखा जाता रहा है। वर्ष 2023 में सार्वजनिक हुए एफबीआई के आधिकारिक रिकॉर्ड से पता चला था कि जो स्थानीय पुलिस बल एफबीआई से इन सिमुलेटरों को उधार लेते थे, उन्हें यह लिखित समझौता करना पड़ता था कि वे अदालत में भी इसके संचालन से जुड़ी बारीकियों का खुलासा नहीं करेंगे। डिजिटल अधिकारों के कार्यकर्ता लंबे समय से यह चेतावनी देते रहे हैं कि ऐसी उन्नत सैन्य-स्तरीय तकनीक का दुरुपयोग भविष्य में पत्रकारों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को दबाने के लिए किया जा सकता है।
डिजिटल अधिकारों की पैरोकारी करने वाले गैर-लाभकारी संगठन इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन के वरिष्ठ तकनीकी विशेषज्ञ कूपर क्विंटिन ने इस तरह की कार्रवाई पर गहरी चिंता व्यक्त की है। क्विंटिन ने इन उपकरणों की कार्यप्रणाली का अध्ययन करने और आम लोगों को इनकी मौजूदगी पहचानने में मदद करने वाले सॉफ्टवेयर तैयार करने में कई वर्ष बिताए हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि राष्ट्रपति के रुख के विपरीत खबरें दिखाने के कारण स्वतंत्र प्रेस के सदस्यों के खिलाफ सेल-साइट सिमुलेटर जैसी अत्यधिक उन्नत निगरानी क्षमता का उपयोग करना अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन के तहत मिले प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा हमला है।
हलफनामों में गलत दावे और कस्टम्स समन की आक्रामक रणनीति
निगरानी की यह कोशिश सिटीज चर्च प्रदर्शन से जुड़े लोगों के खिलाफ संघीय कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा चलाए गए बेहद आक्रामक और असामान्य जांच अभियान का हिस्सा थी। अदालती दस्तावेजों से पता चलता है कि गृह सुरक्षा विभाग यानी DHS ने एक ऐसे सीमा शुल्क अधिकार का इस्तेमाल करके पत्रकारों के फोन और यूट्यूब रिकॉर्ड की मांग की, जिसके लिए अदालत से किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। इतना ही नहीं, जांचकर्ताओं ने मिनियापोलिस और सेंट पॉल क्षेत्र में आरईआई नामक एक आउटडोर स्टोर से दो साल से अधिक समय के दौरान एक विशेष टोपी खरीदने वाले प्रत्येक ग्राहक की पूरी जानकारी जुटाने की कोशिश भी की थी। बचाव पक्ष के वकीलों ने अब तक बानवे ऐसे कस्टम्स समन की पहचान की है और वे अदालत में सरकार के इस मनमाने अधिकार को कानूनी चुनौती दे रहे हैं।
इसके अलावा, रिचर्डसन के फोन को ट्रैक करने की अनुमति प्राप्त करने के लिए न्यायाधीशों के समक्ष पेश किए गए हलफनामों की सच्चाई पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। जांच अधिकारियों ने अपने हलफनामे में दावा किया था कि घटना के वीडियो फुटेज में फोर्ट, लेमन, रिचर्डसन और अन्य लोग उपद्रवियों के साथ मिलकर नारेबाजी करते हुए दिखाई दे रहे हैं। बाद में अभियोजकों को खुद अदालत में यह स्वीकार करना पड़ा कि लेमन और फोर्ट ने कोई नारेबाजी नहीं की थी। फोर्ट के वकीलों के अनुसार, सरकारी पक्ष ने इस बात की पुष्टि की है कि यह झूठा दावा कम से कम पंद्रह अलग-अलग वारंट हलफनामों में दोहराया गया था।
सख्त निगरानी की जरूरत पर उठते सवाल
डीएचएस की अपनी आंतरिक नीति यह कहती है कि सेल-साइट सिमुलेटर केवल उन गिने-चुने मामलों में तैनात किए जाने चाहिए जहां सार्वजनिक सुरक्षा के विशिष्ट उद्देश्यों को पूरा करने के लिए यह तकनीक सबसे उपयुक्त हो। लेकिन इस मामले में यह समझना कठिन है कि एक इक्कीस वर्षीय छात्र को पकड़ने के लिए सार्वजनिक सुरक्षा का ऐसा कौन सा असाधारण संकट खड़ा हो गया था। रिचर्डसन के मामले में दूसरा निगरानी वारंट इकतीस जनवरी को जारी हुआ था, जबकि इसके ठीक दो दिन बाद वे स्वयं फिलाडेल्फिया की संघीय अदालत में पहुंचे और आत्मसमर्पण कर दिया। उस दोपहर अदालत ने उन्हें तुरंत जमानत पर रिहा भी कर दिया।
जिस दिन इकतीस जनवरी को इस वारंट पर हस्ताक्षर किए गए थे, उसी दिन रिचर्डसन ने यूट्यूब पर एक वीडियो भी जारी किया था जिसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे आने वाले दिनों में संघीय हिरासत में जाने की पूरी तैयारी कर रहे हैं। इस बयान से साफ था कि उनका भागने या छिपने का कोई इरादा नहीं था। आतंकवाद-रोधी मामलों में एक दशक तक काम कर चुके एक पूर्व संघीय अभियोजक ने इस मामले की आक्रामकता पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि किसी को खोजने के लिए सिमुलेटर का उपयोग सामान्य हो सकता है, लेकिन इस विशेष मामले के रिकॉर्ड को देखते हुए सरकार का रवैया जरूरत से ज्यादा कठोर था और यह समझ से परे है कि ऐसी आक्रामक तकनीक की यहां क्या आवश्यकता थी।
शुरुआती अदालती आपत्तियां और नाटकीय गिरफ्तारियां
सेंट पॉल के मूल निवासी रिचर्डसन मात्र सोलह वर्ष की आयु में एनएएसीपी की एक शाखा का नेतृत्व कर चुके थे और मिनेसोटा टीन एक्टिविस्ट्स के कार्यकारी निदेशक भी रहे थे। लेमन के लिए उन्होंने मुख्य रूप से यात्रा की व्यवस्था संभालने और स्थानीय संपर्कों से उन्हें मिलाने का काम किया था। वे ही पत्रकार लेमन को गाड़ी चलाकर सिटीज चर्च तक ले गए थे, जहां लेमन ने पूरे प्रदर्शन का सीधा प्रसारण किया और प्रदर्शनकारियों तथा चर्च आने वाले लोगों के साक्षात्कार लिए थे। अपने यूट्यूब वीडियो में रिचर्डसन ने अपने काम का बचाव करते हुए कहा था कि उन्हें लेमन के काम का समर्थन करने पर गर्व है और मानवता व ईसा मसीह के प्रेम के प्रति अडिग रहने की यही कीमत चुकानी पड़ती है।
इस पूरे मामले में सरकार को शुरुआत में ही कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ा था। एक मजिस्ट्रेट जज ने गिरफ्तारी के आठ में से पांच वारंट खारिज कर दिए थे। जब एक अपीलीय अदालत ने इस फैसले को पलटने की न्याय विभाग की याचिका ठुकरा दी, तो विभाग को अपना अनुरोध वापस लेना पड़ा था। मुख्य न्यायाधीश ने अपने आदेश में उल्लेख किया था कि जिन पांच लोगों के वारंट खारिज किए गए, उनमें से दो तो प्रदर्शनकारी थे ही नहीं, बल्कि वे एक पत्रकार और उनके निर्माता थे और उनके किसी आपराधिक व्यवहार में शामिल होने का कोई सबूत मौजूद नहीं था। हालांकि बाद में अभियोजकों ने उनतीस जनवरी को एक ग्रैंड जूरी से अभियोग पत्र हासिल कर लिया।
अभियुक्तों को गिरफ्तार करने के लिए अपनाए गए तरीकों पर भी बचाव पक्ष ने गहरी नाराजगी जताई है। लेमन के वकीलों ने अदालत को बताया कि अभियोजकों ने शांतिपूर्ण आत्मसमर्पण के उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया और इसके बजाय जांच अधिकारियों ने ग्रैमी पुरस्कारों की कवरेज कर रहे लेमन को बेवर्ली हिल्स के एक होटल से आधी रात के समय हिरासत में लिया। इसी प्रकार, फोर्ट के वकीलों का कहना है कि उन्हें भी आत्मसमर्पण की अनुमति देने के बजाय सीधे उनके घर से गिरफ्तार किया गया।
निष्कर्ष
इस अदालती विवाद ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिकी कानून प्रवर्तन एजेंसियां डिजिटल युग में सूचना जुटाने के लिए किस हद तक जा सकती हैं। सेल-साइट सिमुलेटर जैसी तकनीकों का अनियंत्रित इस्तेमाल न केवल किसी आरोपी के कानूनी अधिकारों को प्रभावित करता है, बल्कि यह प्रेस की आजादी और आम जनता की निजता के लिए भी एक गंभीर चुनौती पेश करता है। जब तक ऐसी उन्नत तकनीकों के इस्तेमाल पर कड़े न्यायिक और कानूनी अंकुश नहीं लगाए जाते, तब तक सत्ता द्वारा इनके दुरुपयोग की आशंका हमेशा बनी रहेगी।



















